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एक शिक्षक की भूमिका - Ek shikshak ki bhumika.

शिक्षक वह पथ प्रदर्शक होता है जो हमें किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला सिखाता है। शिक्षकों का कार्य बहुत महत्वपूर्ण और कठिन है। एक अच्छे गुरू का मिलना बहुत दुर्लभ है। गुरू ही नई पीढ़ी को सही मार्गदर्शन देकर समाज और देश के लिये नई पीढ़ी तैयार करते हैं। उनका सम्मान करना हम सब के लिये गौरव की बात है।


भारतीय संस्कृति में शिक्षक को दो स्वरूपों में देखा जाता है। जिन्हें आध्यात्मिक गुरु और लौकिक गुरु के रूप में परिभाषित किया गया है। जीवन में शिक्षक नहीं हो तो 'शिक्षण' संभव नहीं है। शिक्षण का शाब्दिक अर्थ 'शिक्षा देने' से है लेकिन इसकी आधारशिला शिक्षक रखता है। शिक्षक का दर्जा समाज में हमेशा से ही पूज्यनीय रहा है क्योंकि उन्हें 'गुरु' कहा जाता है। जहाँ से हमें ज्ञान मिलता है, फिर चाहे वह लौकिक हो या आध्यात्मिक। हमें हमेशा ही उसका आदर करना चाहिए।

एक खुशहाल, स्वस्थ और सम्पन्न समाज और देश के निर्माण के लिए शिक्षा पहली आवश्यकता है। शिक्षा के अवसर उपलब्ध करवाना सभी माता-पिता के साथ-साथ समाज के हर जिम्मेदार संगठन और व्यक्ति का मूल दायित्व है। बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं। इसलिए शिक्षक, माता-पिता और अभिभावक बच्चों को शिक्षित करने का दायित्व पूरी ईमानदारी से अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए निभायें।
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