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अधिकार का सही उपयोग करें Adhikar ka sahi upyog kren

दोस्तों जितना भला हो सकें, उतना भला करो। अपनी तरफ से किसी का बुरा मत करो। किसी का दिल मत दुखाओं। सभी प्राणियों से प्यार करो। सबके साथ अच्छे से अच्छा बर्ताव करो।


एक बार एक हाथी मर गया। जब उसकी आत्मा धर्मराज के पास पहुंची तो धर्मराज बोले – क्यों रे तेरा इतना बड़ा शरीर होने के बाद भी तू तेरी एक टांग से भी छोटे शरीर वाले आदमी के वश में हो गया। हाथी बोला – महाराज, आदमी है ही ऐसा हर चीज को वश में कर लेता है। धर्मराज बोला - मेरे पास बहुत आदमी आते जाते रहते है मैं तो वश में नहीं हुआ। हाथी फिर बोला – महाराज आपके पास मुर्दे आते है, जिन्दा इन्सान नहीं।

धर्मराज ने एक जिन्दा इन्सान लेकर आने का आदेश दिया। एक आदमी छत पर सो रहा था। यमदूत उसे चारपाई समेत उठाकर यमलोक की ओर चल दिए। आदमी जाग गया। उसने यमदूत के बारे में सुना हुआ था। वह समझ गया की ये यमदूत है। वह आदमी एक लेखक था। उसने अपनी जेब से पान और कागज का एक टुकड़ा निकाला और उस पर कुछ लिखकर वापिस जेब में डाल लिया और वापिस सोए हुए की तरह लेट गया।

यमदूत ने चारपाई को यमराज के सामने रख दिया। और उस सोए हुए आदमी को जगा दिया। वह आदमी उठा और उसने जोर की अंगड़ाई ली। और पुरे होंसले के साथ धर्मराज के पास जाकर अपनी जेब से वह कागज निकालकर यमराज को दे दिया। यमराज ने कागज पर लिखे हुए को पढ़ा। उस कागज पर लिखा था। यह मेरा मुनीम है अब आगे का सारा काम काज इसकी मर्जी से होगा। और नीचे हस्ताक्षर थे :- नारायण, वैकुण्ठपूरी।

पत्र पढ़ कर धर्मराज ने गद्दी छोड़ दी और उस आदमी को पुरे स्वागत सहित गद्दी पर बैठाया।  अब दूत एक आदमी की आत्मा लेकर आए। आदमी ने पूछा – यह कौन है। यमदूत बोले - महाराज डाका डालने वाला है इसने बहुत लोगो को लुटा और मारा है। गद्दी पर बैठा आदमी बोला – इसे वैकुण्ठ में भेज दो। फिर एक दूध भेचने वाली को लाया गया। उसने पानी मिलाकर दूध बेचा था। उसे भी वैकुण्ठ भेज दिया। इस तरह झूठी गवाही देने वाला, पापी, चोर, जो भी आता गया सभी को वह वैकुण्ठ भेजता गया। वैकुण्ठ में बैठे भगवान ने देखा की इतने लोग यहाँ कैसे आ रहे है। क्या धरती पर महात्मा प्रकट हो गए है।

भगवान धर्म राज के यहाँ पहुंचे और बोले – आप सब को वैकुण्ठ भेज रहे हो क्या बात है। धर्मराज गद्दी पर बैठे आदमी की तरफ इशारा करते हुए बोले महाराज ये काम मैं नहीं आपका भेजा मुनीम कर रहा है। भगवान बोले – कौन मुनीम, किसका मुनीम, मैंने कोई मुनीम नहीं भेजा। धर्मराज ने वो कागज भगवान को दिया।

भगवान कागज पर लिखा पढने के बाद उस आदमी से बोले – तुम्हे किसने भेजा।

आदमी – आपने महाराज।
भगवान – मैंने कैसे भेजा।
आदमी – प्रभु, आपकी मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता फिर मेरी तो औकात ही क्या है जो मैं आपकी मर्जी के बिना यहाँ तक पहुँच पाता।
भगवान – मैंने ये कागज तुम्हे कब दिया।
आदमी – भगवन, आपका हर हृदय में निवास है, मेरे हृदय से आवाज आई, और मैंने इस कागज पर ये सब लिख दिया। हुक्म तो आपका ही हुआ।
भगवान – ठीक है, पर तूने इन सबको वैकुण्ठ क्यों भेजा।
आदमी - महाराज इन्सान केवल कर्म कर सकता है, फल देना तो आपके हाथ है, बड़े – बड़े महात्मा यही कहते है की अच्छे कर्म करो। तो फिर जब अधिकार मेरे हाथ में है तो मैं इन्हें दुःख पहुंचाकर बुरे कर्म क्यों करू। बताइए महाराज, क्या वो महात्मा असत्य कहते है।

भगवान ने धर्मराज से पूछा – इसे यहाँ कौन लाया है।
धर्मराज ने उन यमदूतो को बुलाया जो उसे लेकर आए थे।
यमदूतो के आने पर यमराज ने उनसे कहा – तुम इसे क्यों लेकर आए।
यमदूत बोले – महाराज आप ही ने तो एक जिन्दा आदमी लेकर आने को कहा था।
धर्मराज यमदूतो से बोला – तुमने इसको लेकर आते ही यह क्यों नहीं बताया।
यमदूत – महाराज आपने पूछा ही नहीं, इसने कागज आपके हाथ में दिया और आपने इसे गद्दी पर बैठा दिया। अब बीच में बोलने की हमारी हिम्मत नहीं है।

धर्म राज ने भगवान को हाथी वाली बात बताई।

भगवान आदमी से बोले – जो हुआ सो हुआ अब आप धरती पर वापिस जाओ।
आदमी बोला – भगवन जो आपके रूप के दर्शन कर लेता है उसके स्सरे पाप कट जाते है और वह हमेशा के लिए जन्म – मृत्यु के चक्कर से मुक्त हो जाता है।

भगवान बोले – ठीक है भाई अब तुम मेरे साथ वैकुण्ठ में चलो।
आदमी बोला – भगवन, इस हठी का क्या कसूर इसने भी तो आपके दर्शन कर लिए है, और मेरे यहाँ आने का कारण भी तो यहीं है इसे भी साथ ले चलो। और जो अन्य जीव इस समय यहाँ मौजूद है उन्हें भी ले चलो।
भगवान बोले – चलो सभी चलो।

इस प्रकार उस आदमी और हाथी सहित बहुत से लोगो का उद्धार हो गया। इसलिए दोस्तों जितना भला हो सकें, उतना भला करो। अपनी तरफ से किसी का बुरा मत करो। किसी का दिल मत दुखाओं। सभी प्राणियों से प्यार करो। सबके साथ अच्छे से अच्छा बर्ताव करो।
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