दो दिन का राजा - Do din ka raja

एक राजकुमार था। उसके दो खास दोस्त थे। एक दिन उसके दोस्तों ने उससे कहा – मित्र जब तुम राजा बन जाओगे तो हमें भुला दोगे या इसी तरह दोस्ती निभाओगे। राजकुमार बोले – नहीं मित्रो मैं तुमसे इसी तरह प्रेमपूर्वक व्यवहार रखूँगा। और ना ही तुम्हे भूलूंगा।


समय बीतता गया। अब राजकुमार बड़ा हो गया था। उसे राजगद्दी मिल गई। एक – दो वर्ष बीत जाने के बाद उसने दोनों दोस्तों में से एक को बुलाया और कहा – मित्र तुम्हे याद है की तुमने कहा था की राजा बन जाने के बाद मैं तुम्हे भूल जाऊँगा, लेकिन मैं तुम्हे अब तक नहीं भुला हूँ। और आज मैं तुम्हे ये साबित करके दिखाना भी चाहता हूँ इसलिए मैं तुम्हे दो दिन के लिए अपना राज्य देता हूँ।

वह मित्र बोला – नहीं महाराज ये बचपन की बात थी। मैं राज्य नहीं चाहता हूँ।

लेकिन राजकुमार के बार – बार अनुरोध करने पर वह दो दिन का राजा बनने के लिए तैयार हो गया। वह मित्र राजगद्दी पर बैठ गया और खान – पान और ऐश – आराम में मगन हो गया। दुसरे दिन सैर – सपाटा का आन्नद लेकर शाम को राजदरबार में वापिस आया। रात हुई तो बोला – हमारा राजमहल में जाने का प्रबंध किया जाएँ। सब लोग मुश्किल में पड़ गए। वह फिर बोला – मैं राजा हूँ तो राजमहल भी मेरा है और रानी भी मेरी है।

जब रानी को इस बात का पता चला तो उसने कुल गुरु को बुलाया। गुरु जी ने कहा – बेटी तुम्हे चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है, सब ठीक हो जाएगा।

गुरु जी उस राजा बने मित्र के पास गए और बोले – महाराज, राजमहल में जाने के लिए आपको राजा जैसा श्रृंगार करना होगा। गुरु जी ने श्रृगार करने वालो को बुलाने का आदेश दिया। और नाई को बुलाने के लिए भी आदेश दिया। नाइ और श्रृंगार करने वाले हाजिर हो गए।

3 – 4 घंटे बीत गए। राजा बना मित्र बोला – इतनी देर क्यों की जा रही है। नाई बोला महाराज आपकी हजामत आम आदमी की तरह कैसे होगी। नाई ने हजामत बनाने में बहुत समय बर्बाद कर दिया। इसके बाद पोशाक पहनाने वाला आदमी आया। उसने भी काफी देर लगा दी। उसके बाद इत्र – तेल – फुलेल आदि लगाने में काफी देर लगा दी गई। इस प्रकार सारी रात बीत गई। सुबह हो गई। राज्य अधिकारी बनने के दो दिन पुरे हो गए।

राजगद्दी वापिस राजकुमार को मिल गई। राजकुमार ने दुसरे मित्र को बुलावा भेजा। दूसरा मित्र भी राजदरबार में हाजिर हुआ। उससे भी राजकुमार ने दो दिन का राजा बनने का अनुरोध किया। लेकिन इस बार राजकुमार ने कहा की मेरी पत्नी और मेरा घर – ये सब मेरा ही रहेगा और मैं भी आपकी प्रजा में से एक हूँ। बाकि सारा राज्य आपका है। वह मित्र राजा के अनुरोध करने पर दो दिन का राजा बनने के लिए तैयार हो गया।

राज्य मिलते ही उसने मंत्री से पूछा – मेरा कितना अधिकार है।
मंत्री बोला – महाराज फ़ौज, पलटन, खजाना और इतनी धरती पर आपका अधिकार है।

राजा बने मित्र ने पंद्रह – बीस योग्य अधिकारीयों को बुलाया और कहा – हमारे राज्य में कहाँ – कहाँ किस – किस चीज की कमी है तुरन्त हमें सूचित किया जाएँ। कुछ ही घंटो में खबर मिल गई की किस –किस गाँव में क्या – क्या चीज की कमी है, जैसे पिने का पानी, तालाब, मकान, पाठशाला और धर्मशाला आदि।

उसने खजांची को आदेश दे दिया की जहाँ भी जितने भी धन की जरुरत हो तुरन्त दिया जाएँ। सभी अधिकारीयों को आदेश दिया की दो दिन के अन्दर ज्यादा से ज्यादा काम निपटा दिए जाएँ। सभी अपने – अपने कामो में लग गए। अगले ही दिन विभिन स्थानों से समाचार आने लगे की इतना काम हो गया और इतने से इतने लोगो को लाभ हुआ। सारी प्रजा राजा का गुणगान करने लगी।

दो दिन पुरे होने से पहले ही राजा बने मित्र ने आदेश दिया की जो काम बाकी रह गए है उन्हें भी पूरा किया जाएँ। और दो दिन पुरे होते ही राजकुमार को उसका राज्य वापिस दे दिया। इससे राजकुमार बहुत खुश हुए और अपने मित्र से बोले – हम तुम्हे ऐसे नहीं जाने देंगे, क्योंकि हम जो काम अब तक नहीं कर थे, तुमने एक दिन में ही कर दिया। इसलिए हम तुम्हे अपने राज्य का मंत्री बनाते है।

इस प्रकार वह मित्र राजा का विश्वासपात्र बन गया।

प्रिय मित्र हम बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक का सारा जीवन बर्बाद कर देते है, लेकिन कभी भी ऐसा कार्य नहीं करते की हम भगवान के विश्वासपात्र बन जाएँ।

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