डाकघर का स्वरूप भी बदल गया Dakghar ka swarup bhi badal gaya

डाकघर का स्वरूप भी बदल गया Dakghar ka swarup bhi badal gaya, Changed the nature of the post office

आधुनिक युग में डाकघर का विस्तार होने के साथ ही स्वरूप भी बदल गया है, लेकिन तकनीक के दौर में डाकघर पिछड़ रहा है ये कहना गलत है।


बदलते वक्त के साथ डाकघर सिर्फ चिट्ठियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें तमाम वो सुविधाएं मिल रही हैं जो आपको एक बैंक देता है। यही नहीं तकनीक के दौर में खुद को अपग्रेड रखने के लिए भी पोस्ट ऑफिस लगातार कुछ नया कर रहा है। आइये जानते हैं ऐसी ही कुछ स्कीम के बारे में, जिससे आम आदमी को बैंक की तरह यहां भी सुविधाएं मिल रही हैं: 
  • सेविंग अकाउंट (SA): पोस्ट ऑफिस सेविंग अकाउंट खुलवाने वाले कस्टमर्स को सालाना 4 फीसदी ब्याज मिलता है। 20 रुपए की नकद राशि से कोई भी व्यक्ति डाकघर में सेविंग अकाउंट खोल सकता है। वहीं, आवर्ती जमा खाते में ब्याज दर 8.4 फीसदी है, जो अप्रैल 2014 से ही लागू की गई है। इसके अलावा डाकघर में कई तरह के अकाउंट शामिल हैं। आवृती जमा योजना में हर माह जमा आधार न्यूनतम 10 रुपए है। अधिकतम कोई सीमा नहीं है। पांच वर्ष की परिपक्वता अवधि वाली इस योजना पर वार्षिक 8.4 फीसदी ब्याज देय है। अगले पांच वर्ष के लिए उसी ब्याज दर पर बढ़ने की सुविधा उपलब्ध है।  
  • मंथली इनकम स्कीम (MIS): रेगुलर मंथली इनकम स्कीम में कस्टमर को 8.40 प्रतिशत ब्याज मिलता है। ये ब्याज हर वित्तीय वर्ष के हिसाब से बदलता रहता है। स्कीम का लाभ लेने के लिए कस्टमर को मिनिमम 1500 रुपए तक अपने खाते में रखना होता है। जबकि अधिक से अधिक वो 4.5 लाख रुपए ही खाते में रख सकता है। हालांकि, ज्वाइंट अकाउंट में इसकी अधिकतम लिमिट 9 लाख रुपए है।  
  • सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम (SCSS): पोस्ट ऑफिस का सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम या POSCSS  वरिष्ठ नागरिकों के लिए पांच साल की एक योजना है जिस पर 9 प्रतिशत का ब्याज मिलता है। ब्याज से तिमाही आधार पर आय प्राप्त होती है। खाते खोलते वक्त ध्यान रखें कि व्यक्ति की उम्र उस तारीख तक 60 साल हो चुकी हो। इस योजना के तहत निवेश आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत लाभ प्राप्‍त करता है।  
  • नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (NSC): नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट बिल्कुल फिक्सड डिपोजिट की तरह है। पीपीएफ की तरह यहां भी ब्याज टैक्स फ्री होता है और रिटर्न लगभग उतना (8.5 फीसदी) मिलता है। ब्याज छमाही जुड़ता है। इस स्कीम में अब तक 5 साल के लॉक इन पीरियड के साथ 10 साल का एनएससी भी शुरू किया है, जिस पर ब्याज 8.8 फीसदी है।  
  • पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF): पब्लिक प्रोविडेंट फंड यानी पीपीएफ में निवेश करना सबसे फायदेमंद सौदा है। बच्चों से लेकर बड़ों तक इसका फायदा हर किसी को मिल रहा है। अकाउंट खुलवाने के बाद कम से कम 500 रुपए सालाना जमा करने होते हैं। जबकि, खाते में सालभर के अंदर 1.5 लाख रुपए से अधिक जमा नहीं किया जा सकता। पीपीएफ में हर वर्ष ब्याज दर बढ़ती रहती है। हालांकि, अकाउंट खुलवाते वक्त 8.70 प्रतिशत ब्याज मिलता है। लॉन्ग टाइम स्कीम के हिसाब से ये सुविधा सबसे बेहतर है। हालांकि, कुछ प्रमुख बैंकों में भी ये सुविधा उपलब्ध है।   
  • टाइम डिपोजिट स्कीम (TDS): टाइम डिपोजिट योजना पांच साल के लिए होती है। जिसे 200 रुपए से शुरू किया जाता है। पहले चार सालों तक ब्याज दर 8.4 प्रतिशत रहती है। जबकि पांचवें साल में ब्याज दर 8.5 प्रतिशत मिलती है। ब्याज वार्षिक रूप में मिलता है। लेकिन, तिमाही के आधार पर जोड़ा जाता है। योजना में मिलने वाला ब्याज बिल्कुल कर मुक्त है।
आगे क्या होने जा रहा है: 
  • कोर बैंकिंग सिस्टम (CBS): तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर पोस्ट ऑफिस भी बैंक की तर्ज पर देशभर में अपने नेटवर्क को कोर बैंकिंग सिस्टम से जोड़ रहा है। आप कहीं भी रहें अपने पोस्ट ऑफिस खाते में पैसा जमा कर सकते हैं और निकाल सकते हैं। फिलहाल ये सेवा मेट्रो शहरों में शुरू की जा रही है। जल्द ही इसे देशभर के पोस्ट ऑफिस में शुरू कर दिया जाएगा। पोस्ट ऑफिस में यह सिस्टम अक्टूबर माह तक शुरू होने की उम्मीद है। इसका काम अंतिम चरण में है। 
  • ऑनलाइन सर्विस: कोर बैंकिंग से जुड़े खाताधारकों के लिए डाकघर ने ई-सिस्टम यानी ऑनलाइन सुविधा भी शुरू की जा रही है। ये सुविधा सिर्फ उन्हीं कस्टमर्स के लिए होगी जो बैंकिंग सुविधा से जुड़े होंगे। यही नहीं ई-बैकिंग की तरह पोस्ट ऑफिस में भी इंटरनेट के जरिए भी कस्टमर विभिन्न सुविधाओं का लाभ ले सकेंगे।

पहले कैसा था पोस्ट ऑफिस का स्वरूप: कभी चिट्ठियों के लिए प्रसिद्ध डाकघर आज पोस्ट ऑफिस में तब्दील हो गया है। पश्चिमी सभ्यता के साथ आधुनिक युग में पोस्ट ऑफिस सिर्फ इतना ही नहीं बदला है। बल्कि, इसकी सुविधाएं और सेवाएं भी बदल गई हैं। कभी डाकिए के हाथों चिट्ठियां भेजने वाला डाकघर भी अब बैंक की तरह हाईटेक हो गया है। साधारण पोस्ट से ई-पोस्ट के युग में पहुंच गया। पोस्ट कार्ड 1879 में चलाया गया जबकि 'वैल्यू पेएबल पार्सल' (वीपीपी), पार्सल और बीमा पार्सल 1977 में शुरू किए गए। भारतीय पोस्टल आर्डर 1930 में शुरू हुआ। तेज डाक वितरण के लिए पोस्टल इंडेक्स नंबर (पिनकोड) 1972 में शुरू हुआ। तेजी से बदलते परिदृश्य और हालात को मद्दे नजर रखते हुए 1985 में डाक और दूरसंचार विभाग को अलग-अलग कर दिया गया। समय की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर 1986 में स्पीड पोस्ट शुरू हुई ओर 1994 में मेट्रो, राजधानी, व्यापार चैनल, ईपीएस और वीसैट के माध्यम से मनी ऑर्डर भेजा जाना शुरू किया गया। 
पहले डाक बंगलों का रख रखाव करता था डाकघर: आपको सुनकर हैरानी हो सकती है कि शुरूआती दिनों में डाकघर विभाग, डाक बंगलों और सरायों का रख रखाव भी करता था। 1830 से लगभग तीस सालों से भी ज्यादा तक यह विभाग यात्रियों के लिए सड़क यात्रा को भी सुविधाजनक बनाते थे। कोई भी यात्री एक निश्चित राशि के अग्रिम पर पालकी, नाव, घोड़े, घोड़ागाड़ी और डाक ले जाने वाली गाड़ी में अपनी जगह आरक्षित करवा सकता था। वह रास्ते में पड़ने वाली डाक चौकियों में आराम भी कर सकता था। यही डाक चौकियां बाद में डाक बंगला कहलाईं। 
भारत में सबसे बड़ा नेटवर्क: भारत का विश्व में 1,54,866 डाकघरों का सबसे बड़ा नेटवर्क है। जिसमें से 1,39,040(89.78%) ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। स्वतंत्रता के समय 23, 344 डाकघर थे जो मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में थे। इस प्रकार स्वतंत्रता के बाद इसमें 7% तक वृद्धि हुई है और यह विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ है। औसतन एक डाकघर 7,814 जनसंख्या को सेवा प्रदान करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका विस्तार होने के बावजूद प्राइवेट सेक्टर की कुरियर और पार्सल सेवा इससे आगे निकल गई है। यही वजह है कि डाक सेवा केवल चिट्ठियों तक ही सीमित नहीं रही है। इसमें तमाम ऐसी सेवाएं शुरू की जा चुकी हैं जिससे आम आदमी का जुड़ाव डाकघरों से बना रहे। आइये ऐसी ही कुछ स्कीम के बारे में जानते हैं। 

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