महान शिक्षकों के बारे में Mahaan shikshko ke baare mein

नवंबर 13, 2014
महान शिक्षकों के बारे में Mahaan shikshko ke baare mein, About great teachers.

दुनिया के इतिहास में जितने भी लोग अपने-अपने क्षेत्र में सफल हुए, उन्होंने इसका श्रेय अपने शिक्षकों को ही दिया। इससे इतर, इतिहास में एकलव्य जैसे सीखने वाले भी हैं।


खासकर भारत में गुरु-शिष्य परंपरा संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा रही है, जिसके कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जो राजनीतिज्ञ, दार्शनिक और विचारक होने के साथ-साथ एक महान शिक्षक भी थे, उन्हीं के जन्मदिन यानी 5 सितंबर को प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1962 से इसकी शुरुआत हुई। हर साल इस दिन शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाले शिक्षकों को सम्मानित भी किया जाता है। आइए जानते हैं देश के कुछ महान शिक्षकों के बारे में जो एक श्रेष्ठ गुरु साबित हुए और शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया:

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन: 5 सितंबर 1888 को चेन्नई से 64 किलोमीटर दूर तिरुत्तनि में भारत के दूसरे राष्ट्रपति और पहले उपराष्ट्रपति का जन्म हुआ था। राजनीति में जाने से पहले वे एक जाने-माने शिक्षाविद् थे। एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाले राधाकृष्णन ने मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से बतौर शिक्षक अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वे मैसूर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बने। कलकत्ता यूनिवर्सिटी की ओर से उन्होंने यूके और यूएस में इंटरनेशनल कांग्रेस में प्रतिनिधित्व किया। यहां तक कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में तुलनात्मक धर्म पर विस्तार से चर्चा की। इसके अलावा, 'अर्ल ऑफ विलिंगडन' की उपाधि मिलने के बावजूद उन्होंने कभी इसका इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने सदैव 'डॉ.' ही लिखा।

रवींद्र नाथ टैगोर (नोबल विजेता): गुरुदेव को देश के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है। यही वजह है कि शांति निकेतन के रूप में टैगोर की विरासत शायद सबसे स्थायी है। भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ रूप से पश्चिमी देशों का परिचय और पश्चिमी देशों की संस्कृति से भारत का परिचय कराने में टैगोर की बड़ी भूमिका रही। आमतौर पर उन्हें आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी एक नई अलख जगाने में टैगोर का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने शिक्षा को चारदीवारी के दायरे से निकालकर दुनिया से जोड़ने का प्रयास किया। टैगोर ने राष्ट्र और भूगोल की सीमाओं से परे मानवता के अध्ययन पर जोर दिया। टैगोर ने अपने छात्रों को न सिर्फ एकेडमिक शिक्षा दी, बल्कि उन्हें भावनात्मक और धार्मिक तौर पर भी शिक्षित किया। इस कार्य के लिए उन्होंने नोबल पुरस्कार के तौर पर मिली राशि दान कर दी। टैगोर द्वारा स्थापित शांति निकेतन आगे चलकर विश्व भारती विश्वविद्यालय बन गया। गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रगान लिखने वाले टैगोर को गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था।  

सावित्रीबाई फुले (पहली महिला अध्यापिका): भारत के पहले महिला स्कूल की पहली महिला टीचर होने का गौरव इन्हें प्राप्त है, जो उस समय की स्थितियों के देखते हुए इतना आसान नहीं था। 1948 में इन्होंने पति के साथ मिलकर लड़कियों के लिए स्कूल की स्थापना की थी। उस समय ब्राह्मण बहुल पुणे में काफी हंगामा खड़ा हो गया था। यहां तक कि उन पर स्कूल जाते समय अंडे, गोबर, टमाटर और पत्थर फेंके जाते थे। फिर भी सावित्रीबाई ने अपना रास्ता नहीं बदला और साल के अंत तक उन्होंने लड़कियों के लिए पांच और स्कूलों की स्थापना की। 
सवाई गंधर्व (पं. भीमसेन जोशी के गुरु): सवाई गंधर्व को हिंदुस्तानी संगीत का गंधर्व कहें, तो गलत नहीं होगा। वे दुनियाभर में जाने जाते थे। पंडित भीमसेन जोशी और गंगूबाई हंगल के साथ उनका नाम आदर से लिया जाता है। किराना घराने से ताल्लुक रखने वाले सवाई को बचपन में गाते हुए एक बार अब्दुल करीम खान ने सुना था। जब उन्हें मालूम हुआ कि यह बच्चा (सवाई) उनसे संगीत की शिक्षा लेना चाहता है, तो खान ने उनसे वादा लिया कि उन्हें आठ साल शिक्षा लेनी होगी, लेकिन गुरु की इच्छा के विरुद्ध उन्होंने ड्रामा कंपनी ज्वाइन कर ली औऱ एक स्टेज सिंगर बन गए। 1936 में एक युवा उनसे संगीत सीखने के लिए पहुंचा। सवाई ने उससे कहा कि वह छोटे-मोटे काम के बीच में उसे संगीत सिखाएंगे। वह युवा और कोई नहीं, पंडित भीमसेन जोशी थे।
उस्ताद अल्लारक्खा खां: तबला के जादूगर उस्ताद अल्ला रक्खा खां कई छात्रों के पसंदीदा टीचर थे। उन्हें अब्बाजी के नाम से भी जाना जाता था। ऑल इंडिया रेडियो पर तबला बजाने वाले पहले सोलो आर्टिस्ट थे अल्ला रक्खा। वे हिंदुस्तानी और कर्नाटकी संगीत के अच्छे जानकार थे। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पं. रविशंकर ही एकमात्र वो शख्स हैं, जिन्होंने अल्ला रक्खा के साथ भारत और भारत के बाहर म्यूजिक कन्सर्ट में शिरकत की है। उस्ताद अल्ला रक्खा के बेटे उस्ताद जाकिर हुसैन आज मशहूर तबलावादक के रूप में जाने जाते हैं। नई पीढ़ी तक तबले को पहुंचाने में जाकिर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

आरके नारायण: आपको मालगुडी डेज का स्वामी और उसके दोस्त की कहानियां याद हैं? जी हां, हमें, आपको और दुनिया को मालगुडी डेज के स्वामी की छोटी-छोटी कहानियां देने वाले और कोई नहीं, आरके नारायण ही थे। इन्होंने एक शिक्षक की नौकरी की थी और वही उनकी आखिरी नौकरी साबित हुई। आरके नारायण ने तीन साल की अपेक्षा चार साल में ग्रैजुएशन (बीए) पास किया। फुल टाइम जॉब में उनकी कभी भी रुचि नहीं रही। उनके छोटे भाई आरके रामचंद्रन के अनुसार, बीए पास करने के बाद उन्हें पिताजी ने नौकरी खोज लेने के लिए कहा, क्योंकि वे लेखन को सुरक्षित पेशा नहीं मानते थे। इसलिए अपने परिचितों का सहारा लेकर उन्होंने मैसूर के नजदीक चेन्ना चेन्नापाटना इलाके में शिक्षक की नौकरी प्राप्त कर ली। एक दिन प्रिंसिपल ने कहा कि उन्हें फिजिकल ट्रेनिंग क्लास भी लेनी होगी, लेकिन नारायण ने इसका विरोध किया। जब उन्हें रूल बुक दिखाई गई, जिसमें लिखा था कि उन्हें वो हर काम करना होगा जो कहा जाएगा, तो नारायण चुपचाप बाहर निकल गए। उधर, फिजिकल ट्रेनिंग क्लास में छात्र उनका इंतजार कर रहे थे, लेकिन नारायण नौकरी छोड़ वापस अपने घर मैसूर के लिए निकल चुके थे। यही उनकी पहली और आखिरी नौकरी रही। घर लौटने के बाद नारायण ने वर्षों तक शिक्षण कार्य किया। इसके साथ ही उन्होंने स्वामी का किरदार और मालगुडी डेज की कहानियां रचीं।  

डॉ. मनमोहन सिंह: राजनेता बनने से पहले 'मनमोहन जी' शिक्षक हुआ करते थे। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी,  दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के साथ कई अन्य शिक्षा संस्थानों में अध्यापन का कार्य किया। मृदुभाषी मनमोहन सिंह ने जिस तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों को हैंडल किया करते थे, लोग आश्चर्य जताते थे। राजनीतिक जीवन में भी उनके विरोधी भी उनके ज्ञान और मृदुभाषी व्यक्तित्व के मुरीद हैं।  
सीके प्रहलाद: प्रहलाद को बिजनेस क्षेत्र में कॉन्सेप्ट ऑफ कोर कंपीटेंसी और बॉटम ऑफ पिरामिड के लेखन के लिए मुख्य तौर पर जाना जाता है। प्रहलाद ने मिशिगन विश्वविद्यालय में स्टीफन एम रॉस स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रोफेसर के पद पर कार्य किया। यहां उनकी गिनती गणमाण्य प्रोफेसर के तौर पर की जाती रही है। उन्हें अपने जीवनकाल में एक अच्छे विचारक के तौर पर पहचान मिली थी। उनका निधन सैनडियागो में इसी साल हुआ। उन्हें फेफड़ों की बीमारी थी।

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