गीता पर कृपा करें Geeta par kripa karen

गीता पर कृपा करें Geeta par kripa karen, Have mercy on Gita.

श्रीमद्भगवद्गीता जिस तरह से अचानक राजनीतिक हलकों में बहस का विषय बन गई है, उस पर हैरानी ही जताई जा सकती है।
अपने देश की अदालतों में गीता पर हाथ रखकर कसम खिलाई जाती रही है। बौद्धिक बहसों में भी गीता को एक धर्मग्रंथ कहा और माना जाता रहा है। मगर, सचाई यह है कि गीता किसी पारंपरिक अर्थ में धर्मग्रंथ नहीं है। लोगों के लिए क्या करना और क्या नहीं करना जरूरी है, ऐसा कुछ बताने का आग्रह इस पुस्तक में नहीं है।

इसके बजाय गीता की पहचान एक ऐसी जीवनदृष्टि से जुड़ी है जो स्थान और समय की सीमाओं से ऊपर है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा पेश की गई इस ग्रंथ की व्याख्या ने आजादी की लड़ाई में शामिल हमारे नेताओं का मनोबल बढ़ाया। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के जो दो अहम औजार देशवासियों को थमाए, उसकी जमीन गीता के निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत द्वारा तैयार की गई थी, जो सदियों से यहां के आम जनमानस में घुला-मिला था।

तो जो ग्रंथ देशवासियों के दिलो-दिमाग में इस कदर रच-बस चुका हो, उसे राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की कवायद से भला देश का कौन सा हित सिद्ध होने वाला है? जो गीता सदियों से बिना किसी सरकारी मदद के इस भूखंड में रहने वाले लोगों की विवेकशीलता का आधार बनी हुई है, उसे क्या अब अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सरकारी संरक्षण की जरूरत पड़ गई है? जो लोग भी ऐसा समझ रहे हैं कि राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाने से देशवासियों का, या स्वयं गीता का कोई भला होगा, उन्हें इस दिशा में अब तक के तजुर्बों पर एक नजर डाल लेनी चाहिए। राष्ट्रीय पशु शेर आज इस देश में विलुप्त होते प्राणी के रूप में जाना जाता है।

राष्ट्रीय पक्षी मोर भी तेजी से उसी गति को प्राप्त हो रहा है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना व्यर्थ के झगड़ों की जड़ बना, जबकि इसे आगे बढ़ाया बॉलिवुड ने, जिसे कोसने का एक भी मौका राष्ट्रभाषावादी भूले से भी नहीं छोड़ते। गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना इस अनमोल किताब के प्रति समाज के एक हिस्से में दुराव पैदा करेगा। सरकार अगर इसका सरल-सुगम भाषाई रूपांतरण करने वालों की कुछ मदद कर सके तो करे, लेकिन फिजूल के विवादों से इसको दूर ही रखे।

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