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समाज बेटियों की चिंता क्यों करता है - Samaaj betiyon ki chinta kyo karta hai

Why society does concern of daughters. समाज बेटियों की चिंता क्यों करता है - Samaaj betiyon ki chinta kyo karta hai.


एक बार एक संत कथा सुना रहे थे सभी लोग पुरे ध्यान और शांति से कथा सुन रहे थे. एक लड़की कथा के बीच में ही खड़ी हो गई। चेहरे पर गुस्सा झलक रहा था.

संत ने पूछा - क्या हुआ बेटी घबराओ मत मुझे बताओ. क्या बात है?
लड़की ने कहा - महाराज हमारे समाज में लड़कों को हर प्रकार की आजादी होती है। वो कुछ भी करे, कहीं भी जाए लेकिन उन्हें कोई ना रोकता है ना टोकता है लेकिन इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है। यह मत करो, यहाँ मत जाओ, घर जल्दी आ जाओ और भी बहुत कुछ। 

संत मुस्कुराए और कहा - बेटी तुमने कभी लोहे की दुकान के बाहर पड़े लोहे के गार्टर देखे हैं? ये गार्टर सर्दी, गर्मी, बरसात, रात में और दिन में इसी प्रकार पड़े रहते हैं। इनका कुछ नहीं बिगड़ता और इनकी कीमत पर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। लड़कों के लिए कुछ इसी प्रकार की सोच है समाज में। लेकिन अब तुम एक जौहरी की दुकान के बारे में सोचो जहाँ एक बड़ी तिजोरी होती है. उस बड़ी तिजोरी में एक छोटी तिजोरी है। उस छोटी तिजोरी में रखी छोटी सुन्दर सी डिब्बी में रेशम पर नज़ाकत से रखा चमचमाता हीरा होता है। वह जौहरी उस हीरे को इतना छिपाकर इसलिए रखता है क्योंकि वो जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी। समाज में बेटियों की अहमियत भी कुछ इसी प्रकार की है। पूरे घर को रोशन करते झिलमिलाते हीरे की तरह। जरा सी खरोंच से उसके और उसके परिवार के
पास कुछ नहीं बचता। बस यही अन्तर है लड़कियों और लड़कों में।

पूरी सभा में चुप्पी छा गई। उस बेटी के साथ पूरी सभा की आँखों में छाई नमी साफ-साफ बता रही थी लोहे और हीरे में फर्क।

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