आइये समझे - बच्चों की हरकतें और हमारा कर्तव्य Bachchon ki harkate aur hamara kartavya

पिछले दिनों जब मैं घर में चाय की चुस्की ले रहा था, तभी तृप्ति के अचानक रोने की आवाज आई। मैं दौड़कर कमरे में गया। वहां तृप्ति और टीसू आपस में लड़ रहे थे। टीसू, तृप्ति के बाल पकड़कर खींच रहा था और तृप्ति रोये जा रही थी। मैंने दोनों बच्चों को लड़ने से मना किया और तृप्ति के बाल का छुड़ा दिया।

फिर तो टीसू बिफर गया और उसने रेक में रखी पुस्तकें फेंक दी व पेपर फाड़ने लगा। मुझे गुस्सा आने लगा और न चाहते हुये भी मेरे मुंह से निकल गया- ‘बेवकूफ ऐसी हरकतें क्यों करता है। सब पुस्तक को फाड़ देगा तो मैं क्या पढूंगा ? मैं अवाक रह गया जब मैं दो साल के टीसू से सुना- ‘बेवकूफ कहते हो, और आता कुछ नहीं..?’ मुझे दो दिन पहले की एक घटना याद आ गई जिसमें मेरे एक मित्र ने मेरे बेवकूफ कहने पर उक्त बात कही थी। तृप्ति और टीसू वहीं खेल रहे थे। उनके इस प्रकार नकल करने से मुझे सतर्क रहना पड़ा। ऐसे कितने लोग होगें जो बच्चों की इस प्रकार किसी के नकल करने से सतर्क हो जाते हैं ? अधिकांश बच्चे अपने मां-बाप, भाई-बहन और टीचर की नकल करते हैं।

शारीरिक और मानसिक विकास की दृष्टि से बच्चों को पहले पांच वर्षो में अपने माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों के सक्रिय सहयोग और सही मार्ग दर्शन की आवश्यकता होती है। यह स्वाभाविक भी है कि माता-पिता अपने बच्चे को प्रसन्न, क्रियाशील, समझदार और समृद्धशाली व्यक्तियों के रूप में पनपता हुआ देखना चाहें किन्तु अधिकांश माता-पिता बच्चे की प्रक्रिया और उसमें उनके सहयोग से अनभिज्ञ होते है तथा कार्य व्यवस्तता के कारण समुचित ध्यान नहीं दे पाते। आज इन परिस्थितियों में वे रहकर जी रहे हैं, वे उनसे बहुत से भिन्न है जिनमें उनके माता-पिता का पालन पोषण हुआ था। आइये बच्चों के विकास की आवश्यकताओं और हमारे कत्तव्यों के ऊपर विचार करें।

बच्चे दो वर्ष की उम्र से चलना और बोलना प्रारंभ कर देते हैं। इस आयु से ही अपने चारों ओर की वस्तुओं और व्यक्तियों के बारे में बच्चे की उत्सुकता बढ़ जाती है। वह कूदता, पंजों के बल खड़ा होता, चिल्लाता और कागज फाड़ता है। इस तरह की हरकतें करके अपनी दक्षता का विकास करने का भी प्रयास करता है। वह कुछ शब्दों का उच्चारण करने का प्रयास करता है। उनका असम्बद्ध रूप से बोलना बड़ा अच्छा लगता है।

उस समय उसे अपने माता-पिता और अन्य लोगों को स्नेहमयी सद्भावना और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। जिस घर में प्रगतिशीलता नहीं होती, वहां बच्चों का विकास सही ढंग से नहीं हो पाता।

यदि बच्चा जल्दी-जल्दी सीखने लगे तो माता-पिता को अत्यधिक खुश नहीं होना चाहिये और यदि उसे सीखने में देर लगे तो अत्याधिक चिंतित नहीं होना चाहिये। क्योंकि प्रत्येक बच्चों की क्षमताओं का विकास भिन्न गति से, विभिन्न क्रम में होता है। अगर बच्चा असामान्य व्यवहार करने लगे तो उसके साथ कठोरता से व्यवहार न करके नरमी से पेश आयें।

दो और तीन वर्षों के आयु के बच्चे अपने कपड़े खुद पहनने और उतारने लगते हैं। इस कार्य से वे खुश होते हैं। माता-पिता को चाहिये कि बच्चों की छोटी-मोटी गलतियों की ओर ध्यान न दें बल्कि बच्चों की उपलब्धियों के लिये शाबासी अवश्य दें तथा उसकी सहायता करें। माता-पिता की सहायता और मार्गदर्शन के फलस्वरूप बच्चा कठिन समस्याओं को भी सहज रूप में लेने का प्रयास करेगा। इस अवस्था में बच्चा घर में चारों ओर घूमता और उछलता है। अतः खतरनाक चीजों को तथा जल्दी टूटने वाली सामग्रियों को ऐसे स्थानों पर रखें जहां बच्चे की पहुंच न हो, अन्यथा अहित होने की संभावना बढ़ जाती है।

चार से छः वर्षो के बच्चों में कल्पना शक्ति का विकास होने लगता है। वह माता-पिता तथा दूसरे लोगों की बातों की नकल करता है। इसमें कुछ बातें अच्छी होती है तथा कुछ अनुचित। उनकी उचित और अच्छी बातों की ओर ध्यान दें। आनंददायक प्रगति की इस अवधि में बच्चा आत्म निर्भर की ओर बढ़ने लगता है। माता-पिता को चाहिये कि वे बच्चे को आत्म निर्भर बनने के लिये प्रोत्साहित करें। कभी-कभी बच्चों में व्यर्थ का भय उत्पन्न हो जाता है जिसे दूर किया जाना अति आवश्यक है।

छः से आठ वर्ष की आयु का बच्चा बड़ी सरलता से अपने कार्य करने लगता हैं वह ठीक ढंग से बातें करने लगता है और जो कुछ वह करता है, उसे बताते जाता है। वह अपनी जिज्ञासा की संतुष्टि के लिये अपने सवाल करने लगता है। वह अपने अच्छे कार्यो पर गर्व का अनुभव करता है। वह अपनी मित्रता का विस्तार करने लगता है, मगर वह अस्थायी होता है। वह अनेक बातें सीखने का प्रयास करता है। वह न केवल बड़ों के हाव भाव और क्रिया कलापों की नकल करता है बल्कि जीवन के प्रति उनके रवैयों को भी अपनाने लगता है। यहां माता पिता को चाहिये कि अपने व्यवहार शिष्ट व मधुर रखें। यही अवस्था बच्चों में शारीरिक व मानसिक विकास की नींव डालने की अवस्था होती है।

बच्चों के समुचित शारीरिक, मानसिक और व्यावहारिक ज्ञान के विकास के लिये ऐसे संतुलित भोजन की आवश्यकता होती है जो विटामिन से भरपूर हो। बच्चा इसे सरलता से खाये। इसे खेल न समझें, इसका ध्यान रखें। बहुत आवश्यक नहीं है कि बच्चा प्रतिदिन थका होने पर भी पूरा भोजन करें।

बच्चों को लिये नियमित नींद लेना बहुत जरूरी है। रात्रि में बच्चे को जल्दी सुलायें। इस बात का ध्यान रखें कि सोते समय बच्चे को पानी न पिलायें क्योंकि इससे बिस्तर में पेशाब करने की पूरी संभावना रहती है।

सुखद पारिवारिक वातावरण तथा स्नेहमय व्यवहार, अन्य किसी भी सुविधा की अपेक्षा सबसे अधिक वांछनीय है। बच्चों को भरपूर प्यार दें, उसका खूब ध्यान रखें परन्तु उसके साथ अनुचित लाड़ प्यार न करें। बच्चा आपकी भावनाओं को समझता है अतः ऐसी बातें अथवा व्यवहार न करें जिससे बच्चों के मनोमस्तिष्क में गलत प्रभाव पड़े, इसका ख्याल जरूर रखें।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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