गर्भ में बच्चा और मां की भावनाए Garbh me bachcha aur maa ki bhavnaye

Android apps:- 9 Apps
बात तब की है जब तृप्ति पैदा नहीं हुई थी। उस दिन जब मैं दैनिक अखबार दुकान से मंगवाया तब चाचा जी ने अखबार भेज तो दिया मगर पहले पेज में एक सचित्र समाचार काट कर। इस समाचार में किसी विकलांग नवजात शिशु की तस्वीर छपी थीं जो कुछ देर बाद मर गया था।

चाचा जी से उस समाचार को काटने का कारण पूछने पर वे बोले कि ऐसे समाचार पढ़ने से गर्भवती महिला अक्सर डर जाती है और उल्टी सीधी बाते सोचने लगती है जिसका सीधा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। उस समय तो मैंने चाचा जी की बात को ज्यादा ध्यान नहीं दिया और बात आई गई हो गई। मगर मेरे एक मित्र के घर जब काले रंग का बच्चा पैदा हुआ तो मुझे ताज्जुब इस बात पर हो रहा था कि इस बच्चे के नाक नक्शे और रंग रूप जैसा कोई उसके परिवार में नहीं था। मां-बाप गोरे चिटटे थे।

परेशान मां-बाप से विस्तृत चर्चा करने पर पता चला कि मेरे उस मित्र ने शादी के तुरंत बाद हनीमून से लौटते समय दिल्ली में अपनी पत्नी से अपने एक अफ्रीकी मित्र से परिचय करवाया था, जिसे देखकर उसकी पत्नी बेहद डर गई थी, काफी दिनों तक वह इस मुलाकात और उस अफ्रीकी मित्र को भूल नहीं पायी थी। गर्भ धारण के बाद भी उस मित्र को याद करके वह भय खाती रही और परिणाम यह हुआ कि उनकी भावनायें बच्चों पर उतरती चली गई।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या भूण पर माता की भावनाओं, अनुभवों और मानसिक अवस्था का सीधा असर होता है ? क्या गर्भस्थ शिशु सुनता है, सोचता है ..और प्रतिक्रिया करता है ? पश्चिमी देशों के कई मनोचिकित्सकों की शुरू से मान्यता रही है कि सुन्दर, स्वस्थ विचारवान पुत्र के लिये गर्भवती महिला का भौतिक व मानसिक परिवेश भी वैसा ही होना चाहिए। इस लेख में महाभारत के उस घ् ाटना को उधृत करना समीचीन जान पड़ता है जब अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह तोड़ने की प्रक्रिया बता रहे थे, वह सातों दरवाजों पर विजय अभियान की बात सुनती रही मगर वापसी की बात सुनते सुनते वह सो गई। उसके सोते ही गर्भस्थ अभिमन्यु भी वापसी की बात सुन न सका और चक्रव्यूह भेदन (तोड़ने) के बाद वापस न हो सका और मारा गया।

सुप्रसिद्ध अमरीकी मनोचिकित्सक डा. थामस बर्नी अपनी पुस्तक ‘द सीक्रेट लाइफ आफ द अन्बोर्न चइल्ड‘ में एक गर्भवती महिला को सम्बोधित करते हुये कहती है कि केवल इससे मतलब नहीं है कि आप क्या खाती है, क्या पीती है लेकिन क्या सोचती है, क्या महसूस करती है, यह भी बेहद महत्वपूर्ण है यहां तक की जो संगीत आप सुनती है उसका असर भी भ्रूण पर पड़ता है।

‘द वर्ल्ड ऑफ द अन्बोर्ननर्चरिंग योर चाइल्ड बिफोर बर्थ‘ नामक पुस्तक में सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक डा. लेनी श्वार्टज अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं कि ‘गर्भ में शिशु का जागृत जीवन प्रारंभ हो जाता है इसलिये शिशु से सम्पर्क बनाने के लिये मां को सोच समझकर काम करना चाहिये।‘

प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ आर्थर जेनोव ने भी अपनी पुस्तक ‘प्राइमल स्कीम‘ में लिखते है कि ‘गर्भ में बिताये नौ माह शिशु के व्यक्त्वि पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं और अंततः वे ही निर्णय करते है कि वह अकर्मण्य, झगड़ालू या व्यसनी बनेगा। उनके अनुसार मानसिक विक्षिप्तता एक संक्रामक रोग है जो शिशु जन्म के बाद इसे नहीं पाता बल्कि जन्म से पहले ही भूण की अवस्था में यह उन्हें विरासत में मिलता है।‘

प्रसिद्ध डॉक्टर व मनोवैज्ञानिक चार्ल्स स्वेजेनो कहते हैं कि जब भूण माता के शरीर का एक अंग है तो माता की भावनात्मक अवस्था का उस पर असर क्यों न होगा ? डॉ लेस्टर सॉन्टेग तो चालीस वर्ष पहले ही इस पर खोज कर चुके हैं उनका विश्वास है कि गर्भ के वे नौ माह और उसका परिवेश बच्चे के पूरे जीवन के लिये बड़े महत्वपूर्ण होते हैं इस संबंध में आज विदेशी मनोचिकित्सक जो कुछ भी कर रहे हैं, उसका भारत में बहुत पहले ही खोज कर लिया गया था।

प्रत्येक भारतीय परिवार में कुछ विशिष्ट हिदायतें दी जाती है जैसे- गर्भवती महिला के कमरे में सुन्दर बच्चों और धार्मिक, ऐतिहासिक महापुरूषों चित्र होने चाहिए, उनको सुन्दर वस्तुएं देखनी चाहिए, सुन्दर विचार रखनी चाहिए, सुन्दर विचारों वाली पुस्तक पढ़नी चाहिए। गर्भवती महिला को हमेशा प्रसन्न रहना चाहिये और अच्छी अच्छी बाते सोचनी चाहिए। गर्भावस्था में उनको सुपाच्य, पौष्टिक भोजन और यथेष्ठ आराम मिलाना चाहिये। भारतीय परिवारों में आज भी ऐसी कोशिश की जाती है। उनकी मान्यता है कि यदि गर्भवती महिला की मानसिकता अच्छी रहेगी और उनको अच्छा महौल मिलेगा तो उसका बच्चा स्वाभाविक रूप से स्वस्थ, सुन्दर और विचारवान होगा।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

Download apps:- 9 Apps

एक टिप्पणी भेजें

© Copyright 2013-2016 Hindi Blog - ALL RIGHTS RESERVED - POWERED BY BLOGGER.COM