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शादी के कुछ वर्षो बाद अक्सर पति-पत्नी के बीच एक पुरानापन आ जाता है। एक दूसरे की बाहों में समा जाने की पहले जैसी उमंग, दिन भर के तपते वियोग के बाद शाम के मिलन का वह गर्म इंतजार, हर बात में उनसे प्रशंसा पाने की ललक....। गृहस्थी का चक्कर कुछ ऐसा चलता है कि न जाने कहां चला जाता है सब कुछ, सारी उमंग जैसे ठंडी पड़ती जाती है।

संबंधों की महकती सारी उमंग जैसे ठंडी पड़ती जाती है। संबंधों की महकती उष्मा पर आदत और औपचारिक कर्त्तव्य की एक ठंडी परत सी जमने लगती है। कालान्तर में यह अन्तर कब, कैसे और क्यों बिगड़ जाता है, पता ही नहीं चल पाता, पर पति पत्नी का रिश्ता तो आखिर प्यार की बुनियाद पर ही कामयाब होता है और यह बुनियाद रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों से बनती है। चौबीस घंटे साथ रहने वाले पति-पत्नी सुबह शाम एक दूसरे का स्पर्श उनके दिल की धड़कन तेज करे या न करे, मन में एक दूसरे के प्रति बढ़ते या गहराते लगाव के एहसास में गर्मी तो होनी ही चाहिए।

वास्तव में वर्तमान परिवेश में विवाह का सबसे सरल अर्थ यह हो सकता है कि ‘विवाह स्त्री-पुरूष का ऐसा आत्मीय संबंध है, जो प्रेम और विश्वास पर आधारित है जो उनके जीवन को सुख एवं उमंग प्रदान करती है।‘ कहना न होगा कि पति पत्नी का संबंध आपसी सामंजस्य पर आधारित होता है। परिवार के स्थायित्व के लिये पति पत्नी में परस्पर विश्वास और सहयोग जरूरी है। दोनों एक दूसरे को समझते हुए अच्छे मित्र हो, हमदर्द हो और बेहतर जीवन जीने में मददगार हों तभी विवाह एक संवेदनात्मक और सार्थक रूप ग्रहण कर सकता है।

पति-पत्नी एक दूसरे के दोस्त और हम कदम हो जाएं तो कैसी भी कठिनाई क्यों न आए, उसे आसानी से हल किया जा सकता है, परंतु आज बहुत सी महिलाएं इस बात को न समझते हुये पति के दुःख और परेशानियों से अपरिचित रहती हैं। कुछ परिचित रहकर उसे नजर अंदाज कर देती हैं। ऐसी महिलाएं भौतिक सुखों की इच्छा, फैशन, गहनों और कपड़ों के शौक के अलावा कुछ सोच ही नहीं पाती, जिससे मन मुटाव बढ़ते जाता है और पति-पत्नी अजनबी जैसे रहने लगते हैं। इस स्थिति में जहां पत्नी केवल भौतिक सुख सुविधाओं के घेरे में कैद हो जाती है वहां पति भी पैसा कमाने की मशीन बनकर रह जाता है। इससे दोनों का परिवारिक जीवन यांत्रिक हो जाता है और दोनों के जीवन में कोई उमंग नहीं रह जाती। 

ऐसे घरों में आये दिन पति-पत्नी में झगड़ा सुनने और देखने को मिलता है। घर में मन मुताबिक काम नहीं होने से पति अपनी पत्नी के ऊपर बिगड़ जाता है, पत्नी भी ‘हम किसी से कम नहीं,‘ का नारा अख्तियार करके पति से झगड़ पड़ती हैं। फलस्वरूप आपसी मतभेद बढ़ने लगते हैं, और विवाह के सात वचन जिंदगी भर साथ निभाने की प्रतिज्ञा कोरी कल्पना की तरह बनकर तलाक की दरख्वास्त के रूप मं् न्यायालय में पहुंच जाते है। ऐसे में मान मनौवल का दौर भी काम नहीं आता, परिणाम स्वरूप साल दो साल पहले निर्मित परिवार में बसंत आने से पहले ही पतझड़ आ जाती है। कभी-कभी पति-पत्नी इतने निराश हो जाते हैं कि हत्या और आत्महत्या जैसा घिनौना रास्ता अख्तियार कर बैठते हैं, जो पूर्णतः असंगत है।

मनौवैज्ञानिक अध्ययन करने से पता चलता है कि ऐसा आपसी समझ नहीं होने के कारण होता है। मान लीजिये, आप दोनों कोई चीज खरीदने बाजार जाते हैं और दाम सुनकर आप सोचने लगते हैं कि इसे खरीदे या न खरीदे। तभी आपकी पत्नी आपके उपर इल्जाम लगाती है कि आप जल्दी फैसला नहीं कर पाते और बाजार से बैरंग वापस आना पड़ता है तब बहुत बुरा लगता है ? तब आप उसे खर्चीली होने का आरोप लगाते हैं। आपका कहना होता है कि जितनी बड़ी चादर, उतना ही पैर पसारो। वह इसे नजर अंदाज कर देती है। बात पर बात बढ़ते जाती है और अंत में काबू से बाहर हो जाती है। तब आप दोनों को एक दूसरे के ऊपर गुस्सा आता है। दोनों को लगता है कि हमेशा हमें ही गलत समझा जाता है, हम बार बार उसी पचड़े में क्यों पड़ जाते हैं ? 

विवाहित लोगों की बातचीत के ढंग का अनुसंधान करने पर तीन सामान्य कारण पाये गए हैं- पहला अहम् के रक्षा की जरूरत, दूसरा-उल्टा अर्थ लेना और, तीसरा-झगड़े का ऊपर से दिखाई देने वाला कारण शायद ही कभी वास्तविक होता है। कनेटिक्ट विश्वविद्यालय में पारिवारिक अध्ययन के सहायक प्रोफेसर लिंडा हैरिस का कहना है ‘आपको लगता है कि आपका अहं दांव पर है और उसकी रक्षा होनी चाहिये, हालांकि आप यह जानते हैं कि उसे बचा लेने पर भी बात नहीं बनेगी। लड़ाई झगड़े में पति, पत्नी पर भुनभुनाता है, तब पत्नी का अहंकार भी जाग उठता है और वह पति को निर्दयी कहती है। तब बात अपने विषय से हट जाती है। 

वास्तव में आत्म सम्मान पर हुआ हमला प्रायः स्पष्ट नहीं होता। पत्नी अपने पति के ऊपर इसलिए नाराज है, क्योंकि पति महोदय दर्जी की दुकान से बच्चों का कपड़ा लाना भूल गये। बात कुछ यूं होती है कि पति महोदय दर्जी की दुकान से कपड़े लाना, राशन की दुकान से समान लाना और बच्चों की देखभाल करना पत्नी का काम समझते हैं, इसमें हाथ बटाना याने हमेशा के लिए एक जहमत मोल लेना है। जबकि पत्नी सोचती है कि पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने में वह अकेली मरती खपती है, अगर इसमें पति की साझेदारी हो जाए तो क्या बुरा है ? और फिर परिवार पर पति-पत्नी की बराबर की साझेदारी होती है।

परिवार में आए दिन पति-पत्नी के अलावा अन्य लोगों के बीच झगड़े का मुख्य कारण बातों का गलत अर्थ लेना है। अक्सर जब कोई अच्छा लगता है तब उसकी सारी बातें, हरकतें अच्छी लगती है, और जब खराब लगने लगा तो उसकी हर बातों में बुराई दिखने लगती है। लिंडा हैरिस का कहना है कि ‘जो पति-पत्नी हमेशा लड़ते झगड़ते हैं, ये एक दूसरे की बातों का ऐसे अर्थ निकालते रहते हैं, जो उसमें निहित नहीं होते या वे उस अर्थ को नहीं निकाल पाते जो उसमें निहित होता है। झगड़े की जड़ व्यक्तिगत दोष की अपेक्षा बात कहने के ढंग में निहित होती है, लेकिन दुर्भाग्य से बहस में फंसे दंपत्ति यह बात शायद ही समझ पाते हों, उल्टे अपनी समस्याओं के लिये एक दूसरे को दोष देते रहते हैं।‘

21 वर्षीया अनिता, विमल के ऊपर इसलिए बिगड़ती रहती है, क्योंकि न तो उन्हें घर की कमी के बारे में ख्याल रहता है, न ही वे अपने कपड़ों को सम्हाल कर रखते हैं और न ही घर की व्यवस्था में मेरा हाथ बंटाते हैं मेरी बातों को जवाब देने के बजाए अंतर्मुखी हो जाते हैं इससे मेरा मिजाज और खराब हो जाता है और मुझे लगने लगता है कि मैं चिड़चिड़ी होती जा रही हूँ।

बार-बार दुहराये जाने वाले तर्क कभी-कभी केवल झुंझलाहट से पैदा होती है, लेकिन वे कभी-कभी अस्वस्थ संबंधों में खतरनाक संकेत हैं। इलिनास विश्वविद्यालय के मनौविज्ञान के प्रोफेसर जान गोटमेन का कहना है कि ‘सीमित दायरों के बंद दम्पति शायद ही एक दूसरे के करीब होते हैं। दोेनों अपने आपको अनचाहा और तुच्छ समझते हैं, लेकिन जब वे अपनी समस्या का समाधान करते हैं तो उन्हें बहुत चैन मिलता है।‘ हैरिस का कहना है कि ‘न चाहते हुए भी आप संबंधों के हित में सहयोग देते हैं तो यह त्याग टूटते संबंधों को जोड़ने में आश्चर्यजनक काम करता है। मामूली से परिवर्तन का भी असर होता है।‘ मासाचुसेट्स विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्रो. हैराल्ड राउस का कहना है कि ‘अगर आप दोनों में से कोई बहस के दौरान नई दलील देता है तो दूसरा उसी तरह जवाब नहीं दे सकता।‘ इंद्राणी कहती है कि ‘जब कोई मेरी आलोचना करता है तो मै बदले में मुस्कुरा देती हूं। वास्तव में आलोचना करके कोई प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकता।‘

सम्प्रेषण के गुणों में सुनना बुनियादी गुण है। यह गुण सीखना भी बहुत आसान होता है और उससे विश्वास तथा आदर का वातावरण तैयार होता है। झगड़ा करने वाले जानते हैं कि झगड़ा समाप्त होने के बाद संबंधों में सुध् ाार होना चाहिए, मगर ऐसा नहीं होता अपने-अपने स्वत्व को बनाये रखते हुए वे ऐसे सुझाव देकर लक्ष्य प्राप्ति में सफल हो जाते हैं, जिनमें समझौता और रचनात्मकता के अंश होते हैं। वे यह भी जानते हैं कि परिवर्तन में समय लगता है। निःसंदेह बहुत से लड़ाकू दम्पत्ति कभी भी समस्या का निराकरण नहीं कर पाते। वे बहस करते हैं और बुरा मान जाते हैं या समझौते की महत्वपूर्ण मध्यम अवस्था में से बिना गुजरे बहस से एकदम समस्या के समाधान चाहते हैं। 

समझौते की अवस्था में आप एक दूसरे का दृष्टिकोण समझने की कोशिश करते हैं, अगर आप यह अवस्था छोड़ जाते हैं तो आप दोनों को लगेगा कि मांगें आप पर थोप दी गयी है। इसलिए आप फिर उसी बहस में उलझ जायेंगे, क्योंकि वह असल मंे खत्म तो नहीं हुई है। बेशक कुछ मतभेद आसानी से दूर नहीं होते। जब आपके सामने ऐसा गतिरोध आये तो समाधानों की सूची बनाइए। उनमें वे समाधान भी शामिल कीजिये जो जबरदस्ती से लगते हों। जब तक आप किसी एक समाधान के बारे में सहमत न हो जाएं तब तक आप दोनों इसका मूल्यांकन कीजिए। याद रखिये, आपको शांति संधि करनी हो या न करनी हो, लेकिन नियमित रूप से बात करते रहना है। जहां पति-पत्नी के संबंध अच्छे होते हैं, वहां भी कभी-कभी अहं टकराते हैं, लेकिन आप सम्प्रेषण का कोई सुविधाजनक या व्यावहारिक ढंग निकाल लेते हैं तो आपके संबंधों में वाक प्रहार के साथ साथ प्यार के दो मीठे बोलों की जगह अवश्य होगी।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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