जानिए - डांटने फटकारने से नही सुधरते हैं बच्चे Datne fatkarne se nahin sudhrate hai bachche

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एक नन्हें बच्चे के लिए माता-पिता की गोद ही सब कुछ होता है। ढाई-तीन साल के होते-होते वह संसार के विविध क्रिया कलापों से परिचित हो जाता है, लेकिन यह परिचय उसकी घबराहट को बढ़ाता है। मां का कोमल प्यार भरा स्पर्श, उसकी स्नेहिल दृष्टि, पिता की बांहों का घेरा उसे सुरक्षा का आश्वासन देता है।

मां कि देह की सुगंध, उसकी गोद की गर्माहट को वह अपना हिस्सा समझता है। उसे अपनी मां सबसे सुन्दर लगती है। उनकी बातें, चलना, फिरना उन्हें सबसे अच्छा लगता है। जब मम्मी मुस्कुराती है, तो उसकी नन्हीं सी एहसासों की दुनियां रंगीन हो जाती है और नाराज होने से अंधेरी हो जाती है। हमारी दुनिया उसके लिए एक बड़ा अज़ायबघर है। इस अजनबी दुनिया को जब वह मां के आंचल से झांककर या पिता के कंधों पर चढ़कर देखता है, तो वह उसे डरावनी, अनजानी, अपरिचित और अजेय लगती है। 

पिता की बांहो में वह अपने को भी उतना ही समर्थ और सुरक्षित समझता है जितना सिपाही किले में। जीवन के इस प्रारंभिक साल में उसे अपनी माता-पिता में कोई दुर्गुण दिखाई नहीं देता। उसके लिए दोनों किसी देवी-देवता से कम नहीं होते जिनको खुश करना सुखद है, तो नाराज करना खतरनाक साबित हो सकता है। जो भी सुख दुख उसके जीवन में आता है उससे निपटने की शक्ति वह माता-पिता के आश्वासनों, विश्वास और प्रशंसा से ही ग्रहण करता है। इसलिए आपने देखा होगा कि यदि किसी छोटे बच्चे को चोट लग जाए वह तब तक रोता है। जब तक मां का स्पर्श, पुचकार न पा लें।

बच्चों के जीवन के प्रारंभिक विकास के प्रक्रिया में माता-पिता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस सत्य को अधिकांश अभिभावक गंभीरता से ग्रहण भले ही न करें। मगर वास्तविकता यही है। नन्हें बच्चे की अनुभूतियां बहुत तेजी से विकसित होती है जिसके कई रंग और कई आयाम होते हैं। बाल मनोवैज्ञानिक का कहना है यदि वह दस बातें अपने माता-पिता के सिखाने से सीखता है, तो नब्बे बातें स्वतः उसके अवचेतन मन में स्थान पा लेती है। वैसे बच्चे अपनी अनुभूतियों को वयस्कों की भांति व्यक्त नहीं कर पाते। 

शायद इसलिए हम अपने बच्चों से वहीं व्यवहार करते हैं, जो उनको प्रिय हो। बाल मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि नन्हें बच्चों के सामने मां-बाप को सतर्क रहना चाहिए। कहीं उनकी छोटी सी गलती उनके मन में घाव न बना दें ? बच्चे अपने माता-पिता के बीच के तनाव को तुरंत महसूस करते हैं और उनके झगड़ो का प्रभाव उन पर अवश्य पड़ता है और अकारण डांट-पिटाई के वे शिकार हो जाते है। इससे उनका आत्म विश्वास खंडित हो जाता है। इससे उनका मानसिक ही नही शारीरिक विकास के कुंठित होने की संभावना रहती है।

घर के चार दीवारी से मिलकर बच्चे जब स्कूल जाने लगते है तो उसकी चाल-ढाल, बोलने और सोचने के ढंग में बहुत परिवर्तन आ जाता है। वहां बच्चों के बीच रहकर वह बहुत कुछ सीखता है। वह उनके माता-पिता से अपने माता-पिता की तुलना करने लगता है। तब वह अपना महत्व भी समझने लगता है। वह अपने माता-पिता को एक आदर्श बनाकर चलना चाहता है। किन्तु पनपते तर्क की क्षमता उसे विचलित कर देती है। फिर भी वह उन्हें ही अपना मार्गदर्शक मानकर उनकी हर बात की नकल उतारता है। दिन प्रतिदिन हमारे जीवन का पल-पल बच्चे किस तरह अपने मानस पटल पर अंकित करते है। यह जानने के लिए कभी छिपकर बच्चों को घर-आंगन और गुड़िया-गुड्डे का खेल खेलते देखिये। आपको अपनी अच्छाई और बुराई का प्रतिfबंब उनके खेल में दिखाई देगा। इससे आप अपने व्यवहार में परिवर्तन भी ला सकते हैं।

कच्ची मिट्टी सा मन होता है इस समय बच्चों का। हमारे व्यवहार की छाप उसके मन पर हमेशा के लिए अंकित हो जाती है। बच्चों को सबसे अधिक अनुशासित भी इसी समय किया जा सकता है। ..बच्चे ऐसा नही करते, बड़े वेवकूफ हो...और ज्यादा बोर मत करो भई...आदि बातें इस अवस्था में उचित नहीं है। अन्यथा बच्चे अपने आपको ऐसा ही महसूस करने लगते हैं। जिसे किसी भी मायने में सही नहीं कहा जा सकता।

आजकल टी.वी. की बाढ़ ने बच्चों का पढ़ाई के प्रति रूझान कम ही किया है। होता कुछ यूं है कि हम बच्चो को टी. वी. देखने को मना करते है और वे पढ़ने का ढोंग करते है पर उनका मन टी. वी. की ओर लगा रहता है। नतीजा यह होता है कि वह अपने मम्मी-पापा के प्रति दुर्भावना रखकर पढ़ाई से जी चुराने लगता है और गलत संगति में पड़ जाता है, और जब परीक्षाफल आता है तो पता चलता है कि वह सभी विषयों में फेल हो गया है। तो हमारी खीज ही बच्चों पर उतरती है। बच्चों का पढ़ाई के प्रति रूझान कम होना टी.वी. के बढ़ते प्रभाव और हमार दबाव नीति के कारण बच्चे अपने वास्तविक जीवन में एक कुंठा पाल लेते हैं।

किशोरावस्था तक पहुंचते ही बच्चों का अभिभावकों के प्रति दृश्टिकोण बदलने लगता है। बचपन की ममतामयी मां केवल जन्म देने वाली और कुछ पूंछने पर डांटने वाली मां लगने लगती है। पापा तो घर के दरोगा लगने लगते हैं। बच्चे अब पापा-मम्मी से डरने लगते हैं। उन्हें अपने क्रिया कलापों का पता चल जाने का भय रहता है। यही समय माता-पिता के परीक्षा का समय होता है। इस समय बच्चे जैसे माता-पिता के हर मूल्यों, हर व्यवहार को परखते हैं। इस क्रिया को वे जान बूझकर नहीं करते बल्कि यह तो समझदारी के दौर में सम्बंधों के बदलते स्वरूप को निर्धारित करने की प्रक्रिया है। 

बच्चों का अंतर्मन यही चाहता है कि वे अपने माता-पिता को ही अपना आदर्श मानें, fकंतु उनके मस्तिश्क में पनपती जागरूकता औ तर्क शक्ति उन्हें आंख मूंदकर चलने नहीं देती। यह नई जागरूकता अपने साथ एक दर्द भी लाती है। यदि बदलते सम्बंधों को समझकर माता-पिता स्वयं बच्चों से मित्रवत् व्यवहार करने लगते हैं। उन्हें अपने विश्वास में ले लेते हैं, तो वे तनाव, कुंठा और टूटने से बच जाते हैं। यह बड़ा ही नाजुक समय होता है। बच्चों के मन में आदर भाव बनाए रखने के लिए उन्हें समझना जरूरी है। बच्चों के बदलते भावों को स्वाभाविक क्रिया समझकर उसे स्वीकार करना होगा, तभी हम बच्चों को सही मार्गदर्शन दे सकेंगे।

अनेक सावधानी बरतने पर भी बच्चों में कुछ दोश आ ही जाते हैं। तो उसके कारणों को खोजकर उसकी समस्याओं को सहानुभूति पूर्वक सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। डांट फटकार से बच्चे की बुराई कुछ समय के लिए दब भले ही जाए, परन्तु उसका पूरा इलाज नहीं हो पाता और यही कारण है कि बड़े होने पर यह बढ़ता ही जाता है। बच्चे स्वयं एक खुली किताब है। आप इसमें दिलचस्पी लें। उनकी उलझनों को सहानुभूति पूर्वक सुनें और धीरे धीरे उनकी भावनाओं का विकास करते जाएं, तभी भविश्य में एक महान् प्रतिभा के रूप में उनका विकास हो सकेगा और आप भी सिर ऊंचा करके जी सकेंगे।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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