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नये साल की शुरूआत के साथ-साथ आपके बच्चे के जीवन में एक चीज नयी आती है-स्कूल ! या तो स्कूल नया होता है या वह नयी कक्षा में जाता है। यही वक्त है जब आपको अपने बच्चे के तरफ ध्यान देना चाहिए- क्या वह स्कूल नहीं जाना चाहता या स्कूल जाने में टाल-मटोल करता है ?

बच्चों को स्कूल भेजने का सिलसिला इसी समस्या के साथ शुरू होता है। कई बच्चे स्कूल जाने से कतराते हैं। ज्यादा दबाव डालने पर घर से तो निकल जाते हैं। मगर या तो कहीं खेलने लगते हैं या फिर समय से पहले ही भाग कर आ जाते है। अभिभावक भी अक्सर यह शिकायत करते है कि ‘‘न जाने हमारे बच्चे को क्या हो गया है, स्कूल जाना ही नहीं चाहता! जब देखें, टाल-मटोल करता रहता है। चाहे डांटे या मारें उस पर कोई असर नहीं पड़ता। रोज नये बहाने बना कर स्कूल से छुट्टी पा जाता है।’’

लेकिन ऐसा कहने से पहले क्या आपने अपने बच्चे की मनः स्थिति का अध्ययन किया है ? क्या आपने यह जानने की कोशिश की है कि आखिर वह स्कूल जाने से भागता क्यों है ? पढ़ाई में रूचि क्यों नहीं लेता? आमतौर पर माता-पिता इसका दोष स्कूल के वातावरण और अध्यापक के सिर मढ़ देते हैं। मगर इसकी जड़ में उपेक्षा वृत्ति होती है। इसके अन्य कारण भी होते है, जैसे अधिक लाड़-प्यार, बच्चे की अस्वस्थता, आवश्यक सामानों का अभाव, कुसंगति का प्रभाव, शिक्षकों का भय, गलत विषय का चुनाव और मनोवैज्ञानिक दबाव आदि।

विनोद के साथ भी ऐसा कुछ हुआ है। उसके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी है, उसे तीन वर्ष की आयु में कान्वेंट स्कूल में भर्ती करा दिया गया। शुरू-शुरू में तो विनोद खुशी से स्कूल जाता, मगर धीरे-धीरे वह ठंडा पड़ गया, स्कूल जाने से कतराने लगा। कभी पेट दर्द का बहाना, तो कभी पुस्तक-कापी का अभाव बताता। कभी घर से स्कूल के लिए निकलता और कहीं और खेलने लगता। स्कूल के ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ पर स्वयं अपने पापा का हस्ताक्षर कर देता। धीरे-धीरे स्कूल से उसका मन उचट गया। उम्र बढ़ने लगी। वह स्कूल से भाग कर पिक्चर जाने लगा। गलत संगति मिलने के कारण नशे की ओर बढ़ गया। इसके लिए पैसों की चोरी करने लगा और आज स्थिति यह है कि विनोद एक नंबर का जुआरी, शराबी और असामाजिक व्यक्ति बन गया है।

अजय अपने मां-बाप का इकलौता लड़का है। बड़े शौक से उसके पापा ने उसे रायपुर के राजकुमार कालेज में भर्ती कराया था । उसके भविष्य के लिए न जाने कितने सपने देखे थे, मगर साल, दो साल बाद अजय फिर अपने शहर में वापस आ गया। पता चला कि पढ़ाई में अरूचि के कारण उसकी प्रगति नगण्य थी और स्कूल के नियमानुसार ऐसे बच्चों को स्कूल में ज्यादा दिन नहीं रखा जाता। आज उसने मेट्रिक भी पास नहीं की है। उसके मां-बाप बड़े दुखी है। जब भी मैं उनसे इसकी चर्चा करता हूँतो वे कहते है ‘‘भई, हमने तो उसके सुखद भविष्य के न जाने कितने सपने बुने थे। उसे अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाया था, मगर उसकी किस्मत में पढ़ाई नही था, तो हम क्या करें’’ मैंने कहा, ‘‘हो सकता है कि राजकुमार कालेज में पढ़ने का इच्छुक न रहा हो और अपने साथियों के साथ वह अपने ही नगर में पढ़ना चाहता हो ? उसकी परवाह किये बगैर आप लोगों ने उसे घर से बहुत दूर पढ़ने भेज दिया। इससे उसका बाल मन आहत हुआ होगा’’

‘‘इतने से बच्चे से हम उसके भविष्य के बारे में क्या पूछें, जिसे यह भी पता नहीं कि वह है क्या। यदि उसे ही अपना भविष्य तय करना है तो फिर हमारी आवश्यकता ही क्या है ?’’ उसके पापा का जवाब था।

बच्चे के स्कूल जाने से कतराने के कई कारण होते है। अनेक माता-पिता इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उनके बच्चे समय पर स्कूल पहुंचते हैं या नहीं। कुछ माताएं बच्चों को समय पर भोजन तैयार कर के नहीं देती। स्कूल ड्रेस साफ और इस्त्री नहीं होने से भी बच्चे अनमने हो उठते हैं और टीचर से मार खाने के भय से स्कूल नहीं जाना चाहते। कई माता-पिता अधिक लाड़-प्यार के कारण बच्चों की सभी जायज-नाजायज मांगे पूरी करते है। कभी बच्चा कहता है कि ‘मैं आज स्कूल नही जाऊंगा,’ तो माताएं झट से कह देती हैं- ‘कोई बात नही बेटा,’ आज स्कूल मत जाओ। एक दिन स्कूल नहीं जाने से कुछ नहीं बिगड़ जाता’ ऐसे माता-पिता का अनावश्यक लाड़-प्यार पढ़ने से बच्चे की अरूचि को बढ़ावा देता है।

कई बच्चे देखने में तो स्वस्थ लगते है, परन्तु उन्हें कोई न कोई अंदरूनी बीमारी होती है। बच्चा अपने आपको कमजोर और थका सा महसूस करता है। वह आराम करना चाहता है। वह जब अपने माता-पिता से शिकायत करता है। तो वे यह कह कर डांट देते कि वह स्कूल न जाने के लिए बहाना बना रहा है। यहां बच्चे को न डांट कर उनकी समस्याओं को सहानुभूति पूर्वक सुन कर उसे हल करने का प्रयास करना चाहिए। अगर वह अस्वस्थ महसूस करता है तो उसका इलाज कराना चाहिए। अक्सर देखा गया है कि माता-पिता अपने को व्यस्त मान कर बच्चों के स्वास्थ्य की ओर ध्यान नहीं देते। समय गुजर जाने के बाद जब बीमारी बढ़ जाती है तब बच्चे को कोसने लगते है, भला-बुरा कहते है।

यह बात विशेष ध्यान देने की है कि आप अपने बच्चे को किस स्कूल में भर्ती करने जा रहे है। उस स्कूल के नियमों से आपको भलीभांति परिचित होना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि नियम की अवहेलना अथवा पूर्ति के अभाव में स्कूल में बच्चे को टीचर से डांट खानी पड़े। ऐसे बच्चे टीचर की डांट से बचने के लिए स्कूल से भागने लगते हैं। विनोद और अजय के साथ ऐसा ही हुआ था। विनोद पढ़ाई में साधारण था। जबकि अजय अपने घर से दूर रहने के कारण पढ़ाई में मन नहीं लगा पाया। उनकी मन की स्थिति का विश्लेषण करने से पता चलता है कि दोनों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। पैसों की कोई कमी नहीं थी। ऐसे बच्चों में पैसों की अधिकता से अहम जन्म लेता है। चार संगी-साथी आगे-पीछे घूमने लगते है, और चार मत होने से चाल-चलन बदलने लगता है। इससे अच्छाइयां दबने लगती है और बुराइयां हावी होने लगती है। बच्चों के मन पर संगति का असर तेजी से होता है। उद्दंड बच्चों की संगति आपके बच्चे को आवारा बना सकती है। कुछ बच्चों को सिनेमा देखने की लत पड़ जाती है। वे स्कूल से भाग कर सिनेमा देखने लगते है। ऐसे बच्चे सिनेमा देखने के लिए पैसों की चोरी भी करने लगते हैं। इसे समय रहते रोकना चाहिए और यह तभी संभव है जब आपके पास अपने बच्चे के लिए वक्त हो।

मारने से बच्चे अकसर बिगड़ जाते है। अतः उन्हें मारने के बजाय समझाए। स्कूल के शिक्षकों से भी समय-समय पर संपर्क करते रहना चाहिए कि कहीं आपके बच्चे को स्कूल में कोई परेशानी तो नही हो रही है ?

स्कूल में सभी वर्ग के बच्चे पढ़ने आते है। संपन्न परिवारों के बच्चे, गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चों से अलग-थलग रहते है। ऐसे में बच्चे हीन भावना के शिकार हो जाते है और स्कूल जाने से कतराने लगते है। अतः बच्चों के स्कूल प्रवेश के समय इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि स्कूल में बहुलता किस वर्ग के बच्चों की है।

स्कूल न जाने अथवा स्कूल से भागने के लिए केवल बच्चे को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है। इसके लिए अभिभावक स्वयं दोषी है। अगर वे शुरू से ही बच्चों पर ध्यान दें, उनकी सुख-सुविधाओं का खयाल रखें एवं उन्हें स्वस्थ वातावरण उपलब्ध करायें। उनके उचित-अनुचित को प्यार से समझायें तो आपका बच्चा स्कूल से नही भागेगा, बल्कि उत्साह के साथ नियमित स्कूल जाने लगेगा।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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