जानिए - क्या हमारी नवागत पीढ़ी दिशाहीन है Kya hamari navagat pidhi dishahin hai

पिछले दिनों मेरी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और किसी शासकीय महाविद्यालय में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनसे औपचारिक चर्चा के बाद बात आज की नवागत पीढ़ी की दिशाहीनता पर चल पड़ी। इस पर वे खीज भरे स्वर में कहने लगे-’कैसे समझाएं इस नवागत पीढ़ी को, ये तो हमारी कुछ सुनते ही नहीं। जब देखो, अपने मन की ही करते हैं।’


मुझे उनकी बातों में रस आने लगा। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए पूछा-’आखिर इसके लिए दोशी कौन हैं ?’ तब उनका जवाब था-’..वे स्वयं’ क्योंकि वे हमारी बातों को सुनते ही नहीं। बाद में मुझे पता चला कि उनके बच्चे जो कोरबा के किसी संस्थान में इंजीनियर हैं, उनसे नाराज होकर घर नहीं आते और उनसे बदतमीजी से पेश आते हैं। संभव है उनकी नवीन पीढ़ी के बारे में अच्छे ख्यालात् इसीलिए नहीं हैं। वे सबको एक ही नजरिये से देखते हैं।

इसी प्रकार का वाकया मेरे साथ ट्रेन में सफर करते समय हुई। मैं बिलासपुर से रायगढ़ जाने के लिए टेªन में चढ़ा तो टेªन चल पड़ी और मैं दरवाजे में लटक गया। उसी समय दरवाजे में खड़े एक सरदार जी ने मुझे अंदर खींच लिया। शुक्र था कि मैं बच गया अन्यथा किसी दुर्घटना से इंकार नहीं किया जा सकता था। टेªन में बहुत भीड़ थी। मेरे जैसे कई नवयुवक टेªन के दरवाजे से लटक कर प्रायः सफर करते हैं। थोड़ी देर तक मैं सकते में आ गया था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। सरदार जी के ढाढस बंधाने पर मैं सामान्य हुआ। थोड़ी औपचारिक चर्चा के बाद उनसे मेरा परिचय हुआ। 

वे कलकत्ता के किसी फर्म में वरिश्ठ इंजीनियर हैं। उनका परिवार देहरादून में और पत्नी अहमदाबाद में रहती है, जिनसे मिलकर वे वापस जा रहे थे। वे भारत के गिने चुने इंजीनियरों में से हैं जो अपने कार्य में एक्सपर्ट हैं। किसी बात पर अपने डायरेक्टर से मतभेद हो जाने के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी और अपने घर-परिवार से बहुत दूर कलकत्ता में नौकरी करनी पड़ी। उनसे मेरी चर्चा होने लगी ‘आज की नवयुवकों की अनुशासन हीनता पर’। सरदार जी कहने लगे-’आज की युवा पीढ़ी अनुशासनहीन होती जा रही है, वे हमारी कुछ सुनते ही नहीं, कुछ कहो तो उल्टा जवाब मिलता है।’ मैंने तो अपने बच्चों को भी समझाना छोड़ दिया है। वे हमारी कुछ सुनते ही नहीं।

मैंने कहा-’हो सकता है कि आपके समझाने का रूख कुछ कड़ा हो ?’ उन्होंने जवाब दिया-’नहीं, न मैं पुरातन पंथी हूँ और न ही मेरे समझाने का रूख कड़ा है। ये जो तुम्हारी पीढ़ी है न, ये वास्तव में दिशाहीन हो गयी है। न इनमें लिहाज है, न सलीका। मैं अपने बच्चों के लिए जब भी कपड़ा खरीदने जाने की बात करता हूँ तो वे कहते हैं कि हमें आपके साथ बाजार नहीं जाना, हम अपना कपड़ा खुद खरीद लेंगे। बताओ ऐसे बच्चों से क्या उम्मीद करें ?

मैंने कहा-’बुजुर्ग पीढ़ी हमारे सामने कितना आदर्श प्रस्तुत करती है ?’ मैं ऐसे कई उदाहरण पेश कर सकता हूँ जिसके घर के झगड़े इन्हीं बुजुर्गो के लकीर के फकीर होने के कारण होते हैं और फिर आप इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि बच्चे जितना समझाने से नहीं समझते उतना देखकर समझते हैं। आपकी ही बात लें, तो आपको अपने सिद्धांतों से क्या मिला ? आप पूरे देश के उन पांच इंजीनियरों में से हैं जो अच्छे कार्यो के लिए जाने जाते थे। मगर आप अपने सिद्धांतों पर अड़े रहे और आज स्थिति यह है कि आप कलकत्ता में हैं, आपके बच्चे देहरादून में और आपकी पत्नी अहमदाबाद में रहती है। क्या यही आपकी उपलब्धि है ? आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि आपने जिन बच्चों को इंजीनियfरंग और मेडिकल की परीक्षा पास करायी, उनकी आर्थिक स्थिति आपसे कहीं बेहतर है। उन्हें मेरी बातों से निराशा अवश्य हुई मगर वे मेरी बातों से सहमत थे।

फिर भी उनकी कुछ बातों ने मुझे इस विशय पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। क्या हमारी नवागत पीढ़ी दिशाहीन है, अनुशासनहीन है ? अगर हां, तो इन्हें दिशाहीन बनाने में किसका हाथ है ? इनकी दिशाहीनता क्या पैदाइशी है ? लेखन वृत्ति से जुड़े होने कारण मुझे अनेक घटनाएं स्मरण हो आयी। मेरे पड़ोस में एक परिवार में आये दिन झगड़ा होते रहता है। उस परिवार में सिवाय एक लड़के और उसकी पत्नी के अलावा लड़के की मां और बाप रहते हैं। उनके घर से आये दिन रोने चिल्लाने की आवाज आती हैं उसमें मां बाप का अपने बहू और बेटे की क्रियाकलापों से संबंधित कटाक्ष होता है। पता करने पर जो बातें समझ आयी उसमें मां बाप अपने लड़के को बहुत प्यार करते हैं। वे उन्हें अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देना चाहते। 

मगर उनका बेटा स्वतंत्र विचारों के कारण अपनी पत्नी को सहयोग करता है और यही बात लड़ाई की जड़ है। विचारणीय प्रश्न यह है कि शादी के बाद लड़का अपनी पत्नी को ज्यादा चाहने लगता है और अपनी मां बाप की ओर ध्यान क्यों नहीं देता ? नवागत पीढ़ी की इस पर दलील है कि हमार बुजुर्ग पीढ़ी हमें केवल नालायक और कामचोर कहकर अपने सिद्धांतों को पोशित करती रहती है। क्या उन्होंने कभी हमारे मनोभावों को समझने का प्रयास किया है ? नहीं, वे सिर्फ अपने सिद्धांतों को पकड़े कल्पना लोक में विचरण करते हैं। माना कि हम उनके जैसा काम नहीं कर सकते, मगर हमें हतोत्साहित करके हमसे अपने जैसे काम की अपेक्षा करना कितना उचित है ? वास्तविकता तो यह है कि आज की पीढ़ी नालायक नहीं है बल्कि लायक भी है बशर्ते उन्हें सही मार्गदर्शन और माहौल मिले।

नवागत पीढ़ी का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि उनके माता पिता का व्यक्तित्व किस स्तर का है और आरंभिक दिनों में उसे किस प्रकार का माहौल मिला है। आज अधिकांश परिवारों में ज्यादातर ध्यान भोजन और पहनावे तक ही सीमित होता है। उत्पादन कत्ताZ को अपनी कृतियों को सही ढांचे में ढालने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए अच्छा यही होगा कि ऊंचे आदर्शो की शिक्षा देते समय अपनी स्थिति को देख परख लिया जाये। नवागत पीढ़ी के अच्छाईयों के लिए सबसे पहले स्वयं को अच्छा बनना पड़ेगा, इस बात को हमेशा याद रखना चाहिये।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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