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क्यों बढ़ते जा रहे है बाल मजदूर Kyo badhte ja rahe hai baal majdur - ek soch

आज विश्व में लगभग 11 करोड़ बाल मजदूर हैं जो अत्यंत भयावह परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार समिति द्वारा ऐसे बच्चों का सर्वेक्षण किया गया। इस रिर्पार्ट में यह बात सामने आई है कि किस प्रकार से विश्व के अविकसित राष्ट्रों में बच्चों का शोषण हो रहा है, और उन्हें अपना व अपने मां-बाप का पेट भरने के लिये जानवरों से भी बदतर जिन्दगी बसर करनी पड़ रही हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार 97 प्रतिशत बाल मजदूर तीसरे विश्व में अर्थात् अविकसित राष्ट्रों में है। इन देशों में बाल मजदूरों की संख्या सबसे अधिक है जहां पर कुपोषण और अशिक्षा अधिक है। जहां पर कुपोषण और अशिक्षा अधिक है। योजना आयोग के एक अनुमान के अनुसार भारत में 5 से 15 वर्ष की आयु के बाल मजदूरों की संख्या गत 3 वर्षों में 1 करोड़ 75 लाख से बढ़कर 2 करोड़ हो गई है। 1981 की जनगणना के अनुसार आंध्रप्रदेश में सबसे ज्यादा बाल मजदूर है। इसके बाद मध्यप्रदेश, महारष्ट्र, उत्तरप्रदेश, बिहार ओर कर्नाटक का नंबर आता है।

बंबई के बाल मजदूर जूते साफ करने, होटलों में बर्तन धोने, कार साफ करने, कूड़ा बीनने आदि का काम करते है। इनमें से 25 प्रतिशत बच्चे 6 से 8 वर्ष के होते हैं, 48 प्रतिशत बच्चे 10 से 12 वर्ष के होते हैं तथा 27 प्रतिशत बच्चे 13 से 15 प्रतिशत के होते है। यूनिसेफ के एक सर्वेक्षण के अनुसार अकेले भारत में लगभग 2 करोड़ बच्चों को अपने जीवन यापन करने के लिए दिन भर काम करना पड़ता है। ये बच्चे अव्यवस्थित व्यवसायों में लगे हुए हैं जहां इनके मालिक इनका शोषण करते है। ये बच्चे पूरी तरह से मालिकों की दया पर जीते हैं। अधिक शारीरिक श्रम और मार खाना इनकी नियति है।

कश्मीर के कालीन यूरोप में बहुत पसंद किए जाते हैं। इन्हें निर्यात करने वाले व्यापारी इन कालीनों में 200 से 300 प्रतिशत तक लाभांश लेते है। लेकिन इन्हें बनाने वालों के साथ गुलाम जैसा व्यवहार किया जाता है। कालीन बुनते समय उड़ने वाली धूल और देशों के कण सांसों के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते है जिससे इन बच्चों को फेफड़े की बीमारियां हो जाती है।

अफीम की मादकता से सराबोर मंदसौर जिले के स्लेट-पेंसिल उद्योग में दस हजार से भी अधिक मजदूर सिलिकोसिस रोग से पीड़ीत नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। देश के तीन चौथाई बच्चों को किसी भी भाषा की वर्णमाला सिखाने में इस उद्योग में काम करने वाले करीब पच्चीस हजार बच्चे आज स्कूल जाने को तरस रहे हैं। वे अपने माता-पिता का सहारा बनकर या तो स्लेट पत्थर ढो रहे हैं या स्लेट पैक कर रहे हैं, किन्तु कारखाना मालिकों की अधिक धन कमाओं वृत्ति के कारण मजदूरों के परिवारों की दुर्दशा हो रही है, इस जिले को जितना राजस्व धन अफीम से उपलब्ध होता है उससे कहीं अधिक स्लेट पेंसिल उद्योग से प्राप्त होता है। मंदसौर और मल्हारगढ़ तहसीलों में 60 प्रतिशत मजदूर हैं। कृषि एवं अन्य मजदूरों के बाद सबसे ज्यादा मजदूर इस उद्योग में है। स्लेट पेंसिल की खुदाई से लेकर उसकी कटाई करने तक से उड़ने वाली सिलिकान डाई आक्साइड फेफड़ों में प्रवेश करने के कारण मजदूरों को सिलिकोसिस रोग होता है।

बाल मजदूरों पर की जा रही ज्यादतियों का यह मर्ज सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फैला हुआ है। मोरक्को में 8 से 12 वर्ष तक के बच्चों को सप्ताह में 72 घंटे काम करना पड़ता है तथा उनके काम करने की परिस्थितियां बहुत खराब होती है। स्पेन के कालीन उद्योग में 2.5 लाख मजदूर 14 साल से कम आयु के हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार हमारे देश में परिवार की कुल आमदनी का 23 प्रतिशत हिस्सा बाल मजदूरों की कमाई से आता है। इसके बावजूद भी उन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जाती। ट्यूनीशिया, डकार, स्विस, काहिरा, आबिदजान आदि देशों में तो खुलेआम लड़कियों की भी बाल मजदूर के रूप में खरीद फरोख्त की जाती है। दिन में इन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और रात में अपने मालिक की वासना पूर्ति का शिकार बनना पड़ता है। कोलंबिया और बोलिविया में 3 वर्ष के बच्चों की बिक्री होती है। ब्राजील में भी गरीब मां-बाप अपना कर्ज चुकाने के लिये बच्चों को बेच देते हैं। थाइलैंड में भी यही हालत है। बच्चा बिक जोने के बाद कानूनी तौर पर अपने मालिक की संपत्ति हो जाती है और उसका मालिक मनमाने तरीके से उसका उपयोग करता है। बैंकाक का एक दुकानदार हर साल लगभग 20 हजार बच्चे खरीदता और बेचता है जो 7 से 15 वर्ष की आयु के होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार इन सब परिस्थितियों का बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों के उपर निर्भर करता है। हमारे देश में 30 करोड़ बच्चों में से 4 करोड़ 44 लाख बच्चे अब तक मजदूर बन चुके हैं और विभिन्न प्रकार के धंधों में लगे हुए हैं। दूसरे शब्दों में हमारे देश का हर सातवां बच्चा बाल मजदूरों की श्रेणी में आता है। केन्रीहैय श्रम मंत्रालय के अनुसार इस समय देश के सभी क्षेत्रों और सेवाओं में कार्यरत बाल मजदूरों में से 63 प्रतिशत किशोर, 22 प्रतिशत उससे कम आयु के और शेष मासूम बच्चे हैं। श्रमिक लड़कियों का अनुपात लड़कों से अधिक हैं।

बाल मजदूरों का शोषण प्रायः उन सभी देशों में हो रहा है जहां उनकी थोड़ी बहुत उपयोगिता की गुंजाइश है। शहरों और महानगरों में घरों से लकर छोटे-मोटे उद्योगों में जूता, माचिस, बीड़ी, दर्री, कालीन आदि उद्योगों में कपड़े की रंगाई-छपाई और बुनाई में, ईट-भट्ठा, पत्थर खदानों, भवन निर्माण, बर्तन उद्योग, होटलों, सामान उठाने और यहां तक कि भीख मांगने के काम में भी बच्चों को उपयोग किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, इण्डोनेशिया, थाइलैंड, मलेशिया, फिलीपीन्स आदि ऐसे एशियाई देश है जहां बाल मजदूर की संख्या अधिक होने के साथ-साथ उनका शोषण भी अधिक होता है।

‘इंटरनेशनल कान्फेडरेशन ऑफ़ फी ट्रेड यूनियन’ की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछड़े और विकसशील देशों में भी बाल मजदूर की समस्या है जहां इनका शोषण बदस्तूर जारी है। विकसित राष्ट्रों में कृषि कार्यों में बाल मजदूरों का उपयोग किया जाता है। बावजूद इसके वहां उनको बहुत कम मजदूरी दी जाती है। उसे 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता है। राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि बंबई में कार्यरत बाल मजदूर अपनी कमाई का 23 प्रतिशत राशि अपने घर भेजते है। मुंबई में 68.2 प्रतिशत बाल मजदूरों को 100 रूपये मासिक, कलकता में 2.5 प्रतिशत बाल मजदूर ऐसे हैं जिनकी मासिक आय 50 से 100 रूपयों के बीच है। दिल्ली में 50 रूपए मासिक मिलता है। कलकता में 20.6 प्रतिशत बाल मजदूरों को कोई वेतन नहीं मिलता। इन्हें दो से पांच महीने तक प्रशिक्षणकाल मानकर सिर्फ भोजन दिया जाता है। यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि 73.13 प्रतिशत बाल मजदूरों को किसी प्रकार की छुट्टी नहीं मिलती और गलती हो जाने पर मार खानी पड़ती है। अधिक श्रम के कारण ये बच्चे मानसिक रूप से पिछड़ जाते है और अभाव व हीनता के कारण अपराधी प्रवृत्ति के हो जाते हैं।

सरकार ने बाल मजदूरों को शोषण रोकरने के लिये कई कानून बनाए हैं। जिसमें बच्चों से मजदूरी कराने पर पाबंदी लगाई गई है। लेकिन ये सब कानून महज कागजी प्रतीत होते हैं। क्योंकि बाल मजदूरों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। 1948 के भारतीय कारखाना अधिनियम के तहत 14 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों से काम नहीं लिया जा सकता और 1961 के प्रशिक्षार्थी अधिनियम के तहत् 14 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों को व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता लेकिन हाथ करघा और कुटीर उद्योगों में ऐसे बच्चे कार्यरत है।

बाल मजदूर को पूर्ण रूप से समाप्त करने का अर्थ होगा लाखों बच्चों से उनकी रोजी-रोटी को छिन लेना और ये तब अपराध से जुड़ने को मजदूर होंगे। यद्यपि इस समस्या को जड़ से समाप्त नहीं किया जा सकता लेकिन यदि प्रयास किये जाएं तो कुछ सीमा तक हम उन्हे राहत दिला सकते है। बाल मजदूर (निषेध और विनियमन) अधिनियम 1986 में प्रावधान हैं कि ऐसे बच्चों को उनके कार्यावधि को कम करके पढ़ने के लिए सुविधाएं तथा उचित मजदूरी दी जाए।

यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट ‘‘विश्व में बच्चों की स्थिति के अनुसार’’ विश्व में अस्त्रों और सैनिक व्यवस्था पर छः सप्ताह में जितना खर्च किया जा रहा है यदि उसे fस्त्रयों और बच्चों के समुचित आहार, बच्चे के जन्म से पूर्व मां की देखरेख, बच्चों की प्राथमिक शिक्षा, सफाई आदि पर खर्च किया जाए तो दुनिया के 50 करोड़ स्त्री-बच्चों को राहत मिल सकती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार भी इंसान के मस्तिस्क तथा शरीर का 50 प्रतिशत विकास पांच वर्ष की आयु में पूरा होता है। शेष 50 प्रतिशत विकास उसके 15-20 सालों में पूरा होता है। साथ में उसे भरपूर आहार और स्वस्थ वातावरण मिलता रहे। विकास और समृद्धि के लिये न केवल पूंजी और मशीनें चाहिए, न कच्चा माल और मंडियां चाहिए बल्कि चाहिए उसके लिए मजदूरों और कारीगरों के सबल और कुशल हाथ। इसलिए बच्चों के स्वास्थ तथा शिक्षण प्रशिक्षण पर कुछ वर्षो में खर्च किये गए रूपये आगे चलकर हजारों गुना ब्याज दे सकते हैं।

वस्तुतः मजदूरों के लिए जितने भी नियम कानून बनाए जाते हैं। उनसे मजदूरों का कुछ भला तो ही नहीं पाता बल्कि मालिक और मजदूरों के बीच के लोगों की कमाई अवश्य हो जाती है। जब तक सरकार और समाज के जागरूक लोग उन बुनियादी मसलों पर गौर करके उसका निराकरण नहीं करेंगे तो बच्चों का शोषण होता रहेगा। यह बात भी सही है कि इस देश में बाल मजदूरों की समस्या जड़ से समाप्त नहीं की जा सकती लेकिन सुविधाएं दी जा सकती है।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी
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