जानिये - बस्तों के बोझ तले कुंठित होता बचपन Padehen - Baston ke bojh tale kuthit hota bachpan

जुलाई माह के आते ही जहां बरसात होने लगती है और स्कूल खुल जाते हैं, वहीं अभिभावक गण अपने बच्चों को स्कूलों में भर्ती कराने के लिए चक्कर काटने लगते हैं। कभी कभी इसके लिए अभिभावक अपने बच्चों की उम्र घटा या बढ़ा देते हैं। वर्तमान परिवेश में लोगों में अंग्रेजी के प्रति कुछ ज्यादा मोह है।

कुछ अभिभावक अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टड एकाउंटेंट बनाना चाहते हैं, कुछ आई. ए. एस, आई. पी. एस. और आई एफ. एस. बनाना चाहते हैं। कुछ अभिभावक तो अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर अपने व्यवसाय में लगाना चाहते हैं। कुछ ऐसे अभिभावक भी मिल जायेंगे जो मजबूरी में अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं। क्योंकि उनके बच्चे घर में तंग करते हैं, उनके स्कूल चले जाने से राहत महसूस होती है। ऐसे अभिभावकों के बच्चे अक्सर असफल हो जाते हैं और ‘‘लौट के बुद्धू घर को आये..’’ वाली बात को चरितार्थ करते हैं।

मौजूदा शिक्षा प्रणाली लार्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली कहलाती है। इसने पूरे भारत में शिक्षा का विस्तार कराया और शिक्षण संस्थाएं खोलीं। भारतीय जनता इस शिक्षा नीति से शिक्षित तो होने लगी पर एक समय ऐसा आया जब हमारे यहां शिक्षित बेरोजगारों की भीढ़ बढ़ने लगी। पढ़े लिखे लोग शिक्षा को मात्र नौकरी पाने का लाइसेंस मानने लगे हैं। पढ़ लिखकर खेतों में काम करने को शर्मनाक मानना भी अंग्रेजी शिक्षा नीति का ही परिणाम है। मेरा ऐसा मानना है कि आज की शिक्षा नीति दोशपूर्ण है। आज शिक्षा का विस्तार गांव गांव तक अवश्य हो गया है और पूर्णतः कृशि में संलग्न किसान भी अपने बच्चों को अपना पेट काटकर पढ़ाता है। आज गांव के स्कूलों की दुर्दशा से कौन परिचित नहीं है ? ऐसे परिवेश में किसान का बच्चा तृतीय श्रेणी में परीक्षा पास कर भी लेता है। लेकिन इस श्रेणी में पास बच्चों को न तो आगे पढ़ने को मिलता है और न ही कहीं नौकरी मिलती है। ऐसे बच्चे खेतों में काम करना अपनी तौहीन समझते हैं। ऐसे बच्चे भूखा रहना पसंद करते हैं लेकिन खेतों में काम करके अपनी मेहनत की कमाई खाना पसंद नही करते। ऐसी पढ़ाई और शिक्षा का क्या महत्व जो किसान से उनका बेटा छिन लें। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहें ?

आज के संदर्भ में शिक्षा के महत्व को नकारा नहीं जा सकता । हमारी समझ को विस्तृत करने के लिये व भविष्य निर्माण के संदर्भ में शिक्षा बहुत जरूरी है। पर ऐसे बहुत कम अभिभावक मिलते हैं जो अपने बच्चों से यह जानने की कोशिश करते हैं कि भविष्य में उन्हें क्या बनाना है और वह कहां पढ़ाना चाहता है। वे तो बच्चों को कड़वी घुट्टी की तरह शिक्षा को पिलाना चाहते हंै। इससे न जाने कितने बच्चों का भविष्य/जीवन बरबाद हो जाता है।

हमारी शिक्षा का माध्यम क्या हो ? इस बारे में लोग तरह तरह की बातें करते हैं। आजादी के बाद से इस बारे में दो मत है। एक वर्ग सिर्फ अंग्रेजी को बेहतर शिक्षा का माध्यम बनाना चाहता है और अंग्रेजी को ही प्रगति का मूलमंत्र मानता है। जबकि अंग्रेजी शिक्षा नीति का विरोध करने वालों का तर्क है कि अंग्रेजी शिक्षा नीति भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और राष्ट्रीय जीवन के सर्वथा विपरीत है। इस संस्कृति की छाया में पनपे लोग नकलची और परंपराओं को भूलने वाले होते हैं। ऐसे पढ़े लिखे गंवारों की फेहरिस्त है जो अच्छे ओहदे में पहुंचने के बाद अपने रिश्तेदारों को पहचानने से इंकार कर देते हैं।

आज गांव-गांव और शहरों की गली-मुहल्लों में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी माध्यमों के स्कूल खुल गये हैं, जो नवांकुर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है। इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता हैं कि हर मां-बाप अपने बच्चे को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना चाहता है। अंग्रेजी के प्रति अभिभावकों के मोह ने ही इस अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को व्यवसाय का रूप दे दिया है। हांलाकि इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना बहुत महंगा साबित हो रहा है, फिर भी लोग धड़ल्ले से उधर आकर्षित हो रहे है। कोरबा के एक व्यवसायी श्री विमल ने बताया कि निर्मला स्कूल में अपने बच्चों को के. जी. वन में प्रवेश दिलाने के लिये 1100 रू. दिया है। पत्रकार श्री मेमन ने बीकन स्कूल में नर्सरी में अपने बच्चे को प्रवेश दिलाने के लिये 1300 रू. दिया है। इसी प्रकार लायन्स और सरस्वती शिशु मंदिर में भी क्रमशः 500 से दो से पांच हजार रूपये विकास शुल्क के अलावा लगभग 200 रू. फीस लगती है जो सामान्य आदमियों के लिये असंभव है। मुझे याद आया कि इतनी फीस तो कालेजों में नहीं होती। इसी उधेड़बुन में मैं बिलासपुर जिले के अनेक प्राइवेट स्कूलों में घूमा और जो तथ्य सामने आये वे कम चौंकाने वाला नहीं है। जिले का एक भी प्राईवेट स्कूल इससे अछूता नही है। कुछ स्कूलों के तो कई ब्रांच भी खुल चुके हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि स्कूल खोलने से कितना फायदा होता है, बिfल्डंगें अलग खड़ी हो जाती है और सारी भौतिक सुख सुविधाएं अलग मिल जाती है।

अधिकांश स्कूलों में स्पोर्ट्स, लाइब्रेरी, फर्नीचर और बिfल्डंग के लिये फीस (डोनेशन) लिया जाता है। पिछले दिनों हाई कोर्ट द्वारा ऐसे संस्थानों द्वारा डोनेशन लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन इसके बाद भी क्या डोनेशन लेना बंद हुआ है ? जब मैं स्कूल का भ्रमण कर रहा था तब पता चला कि सभी प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में आज भी डोनेशन लिया जा रहा, लेकिन उसका स्वरूप बदल दिया गया है। ऐसे स्कूलों के व्यवस्थापकों का कहना है - ‘‘हम डोनेशन कहां ले रहे है। हम तो आपके बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधा देने का प्रयास कर रहें हैं। इसके लिये हमें कोई शासकीय अनुदान तो मिलता नही, ऐसे में अगर आप 500-1000 रू. देकर सहयोग (डोनेशन नहीं) करते हैं तो इसमें बुराई क्या है.....?’’

अभिभावकों के इस बारे में क्या विचार है ? यह जानने के लिये मैं कुछ अभिभावकों से इस संबंध में चर्चा किया। कुछ अभिभावक जो शुद्ध व्यवसायी है, का कहना है- ‘‘व्यवसाय तो बिना पढ़े भी किया जा सकता हैं और पढ़ लिखकर भी। मगर पढ़ा लिखा व्यक्ति अच्छे तरीके से और शासकीय उलझनों (शायद उनका आशय आयकर और विक्रयकर आदि की प्रक्रिया से है) से निबट सकता है। उनका किस्मत रहा तो अच्छा आफिसर भी बन जाये तो इसमें हर्ज ही क्या है ?’’ कुछ अभिभावक ऐसे भी मिलेंगे जो खुद तो नहीं पढ़ सके और इसका मलाल अपने मन में छुपाये अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के पक्ष में होते है। उन्हें इस बात की fचंता कम होती है कि उनके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। कहां जा रहे हैं और क्या कर रहे है ?

.... अधिकांश मां-बाप अपने ढाई-तीन साल के बच्चे से गुड मार्निग, गुड नाईट, टा-टा गुड बाय और एकाध पोयम सुनकर प्रसन्न होते है। वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भर्ती कराना ज्यादा उचित समझते है। ऐसे स्कूलों में 300 से 500 रू. प्रति मास खर्च अनुमानित है।

बच्चों की शिक्षा के बारे मे श्री चितरंजन सांवत ने कहा है-’’हम बच्चों की शिक्षा के बारे में लकीर के फकीर रहे हैं। कभी फ्राबेल के किंडर गार्टर माध्यम को अपनाया और कभी मदाम मांटेसरी के विचारों को अपने बच्चों पर थोप दिया। यूरोप की धरती पर उपजे पौधों को बिना कांट-छांट के हमने अपने देश की धरती पर रोप दिया। कभी किसी ने प्रयास नहीं किया कि उस पौधे के साथ यहां के किसी पौधे की शाखा को मिलाकर एक नई कलम लगाई जाये।’’ जाहिर है, भारत के बच्चों में भारतीय व्यक्तित्व को उभारने से रोकने के लिये जितनी बाधाएं हो सकती थी, वे सभी लाकर खड़ी कर दी गयी। सभी मंचों से राजनैतिक भाषणों के दौरान हम मैकाले की शिक्षा प्रणाली को दोष देते रहे। लेकिन शिक्षा जगत में पाठ्यक्रमों के निर्धारण संबंधी बहस में कान में तेल डाले बैठे रहे।

5 से 7 किलो वजन का बस्ता उठाये स्कूल से लौटते पांच वर्षीय शिशु को सड़क में गिरते देखकर मेरा मन कोफ्त से भर गया। और मैं सोचने पर मजबूर हो गया। मुझे अपना बचपन याद आने लगा, जब बच्चों को सिर के ऊपर से अपने हाथ से कान पकड़ पाने के बाद ही स्कूल भेजा जाता था, चाहे उम्र 6-7 साल की हो जाये। तब बहुत कम कापी किताब हुआ करता था, कोर्स भी बहुत कम बदलता था। एक बार पुस्तकें खरीदी तो उससे कई बच्चे पढ़ लिया करते थे। आज तो रोज पुस्तकें बदल जाती हैं। 

तब न टाई, जूता-मोजा पहनना पड़ता था, न होमवर्क का झंझट....लेकिन आज तो हालत यह है कि स्कूल के टीचर मौसम का ध्यान नहीं रखते और बच्चों को बरसात में भी मोजे-जूते पहनने और मजबूर करते हैं। यह तो बच्चों के लिये एक सजा है और जब बच्चा बस्ते का बोझ उठाये गिरते पड़ते हैं, दिन भर की थकान लिये घर पहुंचता है तो मम्मी की डांट-’’जल्दी करो, थोड़ी देर में होमवर्क पूरा करना है...?’’ से सहमा हुआ होता है। हर माह मंथली टेस्ट में बच्चे का प्रोगे्रस आंका जाता है और उसी तर्ज पर उसके ऊपर कड़ाई की जाती है।

आज गली और मुहल्लों में खुले कथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई नाम मात्र की होती है। हर साल ऐसे स्कूलों में टीचर बदल दिये जाते हैं। मात्र 500-1000 रूपये मासिक वेतन पर काम करने वाले टीचर से अच्छी शिक्षा की कैसे उम्मीद की जा सकती है। इन स्कूलों में हिन्दी माध्यम में पढ़े टीचर होते हैं जो बच्चों को ज्यादा होमवर्क देकर कोर्स पूरा कराना चाहते हैं और पाठ को रटाना उनकी आदत होती है। इस पर उनका जवाब होता है-’’इतने कम समय में हमें कोर्स पूरा करना है। तब हमें मजबूरी में होमवर्क ज्यादा देना पड़ता है।’’ इस पर स्कूल के प्राचार्य की प्रतिक्रिया होती है-’’इसीलिये तो हम अभिभावकों से स्पष्ट कह देते हैं कि आपको भी साल भर अपने बच्चे के ऊपर ध्यान देना पड़ेगा।

इसके लिये हो सकता है कि आपको एक अच्छी ट्यूटर भी रखनी पड़े...।’’ कोर्स पूरा करने के चक्कर में बच्चे कुछ खेल नहीं पाते, जो बच्चों के विकास के लिये अति आवश्यक होते हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों और डाक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास 3 से 4 वर्ष की आयु में होता है और इस कच्ची उम्र में हम अपने बच्चों को स्कूल भेजकर उसके ऊपर बस्ते का वजन, होमवर्क का बोझ और मार खाने का भय जाने अनजाने में लाद देते है। इससे बच्चा कुंठित हो जाता है। बहरहाल, बच्चों में यदि सचमुच में शिक्षा के प्रति रूचि जगाना है तो उसे प्राकृतिक रूप से प्रकृति के बीच पलने दीजिये। उसे स्कूल भेजने में जल्दी न करें। पुस्तक और कापी का वजन बढ़ा देने से बच्चा बुद्धिमान नही हो जायेगा। उन्हें खेलने दीजिये... और उसकी चंचलता को खत्म मत कीजिये....।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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