शादी के तुरंत बाद ही मां बनने में जल्दी न करें Shadi ke turant baad hi maa banne ki koshish na kre

शादी के एक-दो माह बाद ही नव विवाहिताएं गर्भवती हो जाती है। यह स्थिति किसी भी दृष्टि से उचित नहीं हैं शादी के एक-दो साल बाद ही आपकों नए मेहमान के आगमन की बात सोचनी चाहिए, ताकि आप उसका स्वागत भली प्रकार से कर सकें। पिछली गर्मी की बात है, वार्षिक परीक्षाएं समाप्ति की ओर थीं।

मैं प्रायोगिक परीक्षा की तैयारी में लगा हुआ था। तभी एक नवदम्पत्ति मुझसे मिलने पहुंचा। थोड़ी देर के लिए मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया ध्यान देने पर ख्याल आया कि वह बी.एस-सी. की छात्रा थी, अपने पति को मुझसे मिलाने लायी थी। मुझे खुशी हुई कि चलो कोई विद्यार्थी अपने प्राध्यापक को याद तो किया। मगर मुझे यह जानकर अफसोस हुआ कि वह वार्षिक परीक्षा में नहीं बैठ सकी, क्योंकि उसी बीच उसकी शादी का लग्न था। लग्न तो परीक्षा के बाद भी हो सकता था.. ? मैंने कहा। तब उसने मुझे बताया कि ‘इसके लिए मेरे पापा-मम्मी सहमत नहीं हुए। उनकी नजर में लड़का बहुत अच्छा है, घर-परिवार भी अच्छा है, कहीं तुम्हारी पढ़ाई के चक्कर में यह रिश्ता भी हाथ से न निकल जाये ?’ 

मैने कहा-‘खैर, जो हुआ सो हुआ। तुम तो खुश हो न........?’ हां सर, मैं बहुत खुश हूं, उनका जवाब था। उनके पति भी बड़े प्रोग्रेसिव लगे। मेरे पूछने पर वे कहने लगे-‘मै इन्हें आगे पढ़ाऊंगा सर, इनकी हर इच्छा को पूरी करने की कोशिश करूंगा...।’ मगर क्या ऐसा हो सका...? वह लड़की जिसका नाम रंजना था, आगे नहीं पढ़ सकी। क्योंकि शादी के दो-चार माह बाद वह गर्भवती हो गई थी, और बच्चे के आगमन से जैसे पढ़ाई की बात वह भूल गई।

इस प्रकार का वाकिया श्रावणी के साथ भी हुआ था। पढ़ते-पढ़ते उसकी शादी हो गयी। तब वह ढेर सारे सपनों का ताना बाना बुनने लगी थी-‘शादी के बाद मैं साधारण लड़कियों की तरह घर-गृहस्थी में नहीं उलझूंगी, आगे ओर पढ़ाई करूंगी और फिर सर्विस करूंगी। इससे जहां मेरी पढ़ाई का सदुपयोग होगा, वहीं आज की महंगाई में अपने परिवार को आर्थिक सहयोग करके उबार सकूंगी।’ उनके पतिदेव किसी प्राइवेट फर्म में इंजीनियर थे। तब उन्होंने भी श्रावणी की बातों का समर्थन किया था। ‘...श्रावणी तुम जो कुछ भी करना चाहोगी करोगी, मेरी तरफ से कोई रोक टोक नहीं रहेगी।’ तब खुशी खुशी विदा हुई थी श्रावणी। मगर यह क्या, सारे सपने तितर बितर हो गये जब शादी के कुछ दिनों बाद उन्हें एहसास हुआ कि वह मां बनने वाली है। पढ़ाई-लिखाई नौकरी-चाकरी और घूमने-फिरने का सपना, सब धरा का धरा रह गया। वह मां बनीं और ऐसी उलझी कि दीन-दुनिया की खबर नहीं रही।

सचमुच शादी के बाद बच्चे का आगमन वैवाहिक जीवन को बिलकुल बदल देता है। शादी चाहे कम उम्र में की गई हो या अधिक उम्र में, यह समस्या बनी रहती है। पहले परिवार नियोजन की सुविधा नहीं थी, तो लोग हर साल एक बच्चे को जन्म देकर इसे भगवान की देन समझकर स्वीकार कर लेते थे, चाहे उसके दायित्व को वे पूरी तरह से भले ही न निभा सकें। आज तो परिवार नियोजन की हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध है, जिसकी सहायता से हम अपनी इच्छानुसार बच्चे के आगमन की तैयारी कर सकते हैं। मगर क्या व्यवहार में ऐसा हो पाता है ? मेरे एक मित्र हैं जिनके चार बच्चे हैं। लेकिन इसके बाद भी उन्हें बच्चे की पड़ी है। क्यांेकि चार में से तीन लड़की है। मुझे समझ में नही आता कि आज जब लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं किया जाता, तब यह सब क्यों ?

एक लड़की जो नई-नई शादी करके एक घर छोड़कर दूसरे घर में आती है, वहां के रहन-सहन और व्यवहार से पूरी तरह से परिचित भी नहीं हो पाती और तीसरे के आगमन की सूचना मिल जाती है। कभी बच्चे के होने में देर हो जाये तो सास-ससुर और पड़ोसियों में कानाफूसी होने लगती है और कभी-कभी तो ऐसे ताने दिये जाते हैं कि उसे सहन करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। खुदा न खास्ता पहला बच्चा लड़की हो जाए, तब तो कष्टों का अंबार लग जाता है। एक तरफ घर परिवार को देखना और दूसरे तरफ बच्चे की जिम्मेदारी और पति की इच्छा पूर्ति। 

परिणाम यह होता है कि एक साथ इतनी जिम्मेदारी के आ जाने से वह किसी को पूर्णरूपेण संतुष्ट नहीं कर पाती। यहीं से शुरू होता है असहयोग, अविश्वास और वैमनस्य। कभी-कभी तो यह विकट स्थिति का रूप धारण कर लेती है। यदि एक के बाद दूसरा और तीसरे का आगमन हो जाये जैसा कि अक्सर होता है, तो फिर बच्चों के बीच पत्नी को इतना समय नहीं मिलता कि पति के लिए भी कुछ समय निकाल सके। इसका परिणाम यह होता है कि पति अपने को उपेक्षित महसूस करने लगता है और अपना अधिक समय घर से बाहर गुजारने लगता है। बच्चे का जल्दी-जल्दी आगमन कभी-कभी पति-पत्नि के बीच झगड़े के कारण बन जाता है और परिवार टूटने लगता है।

सुजाता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसके जिस व्यक्तित्व पर मुग्ध होकर प्रकाश ने उससे शादी की थी और जिंदगी भर साथ निभाने का वायदा किया था, शादी के बाद तीन साल में तीन बच्चों के आ जाने से सुजाता का आकर्षण कम हो गया और उसका ज्यादा समय बच्चों के बीच गुजरने लगा। बनने और संवरने का उसे समय ही नहीं मिला था। रसोई में भी वह भरपूर समय नहीं दे पाती थी। इससे घर में एक अघोषित तनाव बना रहता था। तीनों लड़की होने से वैसे भी घर में सभी उससे खिंचे-खिंचे रहते और ताने दिया करते थे। घर में सास-ससुर का व्यवहार तो बदला ही, प्रकाश भी ऐसे बदल गया जैसे लड़की होने का सारा दोष सुजाता का ही है? सुजाता अपनी झल्लाहट बच्चों पर उतारती और प्रकाश सुजाता के उपर। रोज इस प्रकार किसी न किसी बात को लेकर झगड़ा होता और बात न बने तो प्रकाश सुजाता को मारने लगता। इस तरह जिंदगी का जो समय मौज मस्ती में गुजरने वाला था, कलह में गुजरने लगा। इस परिवार में सुजाता का क्या हश्र हुआ यह बताने की जरूरत नही है क्योंकि अक्सर ऐसी घटनायें रोज देखने, सुनने और पढ़ने को
मिलती हैं।

मुझे अफसोस इस बात का होता है कि लड़के और लड़की के जन्म को लेकर इतना बखेड़ा क्यों ? क्या इसके लिए केवल पत्नी ही जिम्मेदार होती है ? वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चलता है कि लड़के और लड़की के जन्म के लिए पति-पत्नि में पाये जाने वाले क्रोमोजोम्स के युग्मन उतरदायी होते हैं। अतः बच्चे के जन्म के लिए पति-पत्नी दोनों बराबर के जिम्मेदार होते हैं। पति-पत्नि के क्रोमोजोम्स एक विशेष परिस्थिति में ही युग्मन होते हैं। अतः अगर किसी प्रकार क्रोमोजोम्स के युग्मन को रोक दिया जये तो बच्चे के आगमन को रोका जा सकता है। इसके लिए आजकल अनेक प्रकार की सामग्री तैयार हो चुकी है। शादी के बाद नवदम्पत्ति को पहले एक-दूसरे को भली-भांति समझ लेना चाहिए। उसके बाद बच्चे के आगमन की मनः स्थिति बन जाए तभी बच्चे का जन्म हो तो किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। इसी प्रकार दूसरे बच्चे के बीच कम से कम तीन साल का अंतराल होना चाहिए। यह अंतर बच्चे के विकास के लिए जरूरी है। सुखी परिवारिक जीवन के लिए दो या तीन बच्चे पर्याप्त होते हैं।

अगर कम समय में बच्चे जल्दी-जल्दी हों तो इसका बुरा असर बच्चे के विकास और मां के स्वास्थ्य के ऊपर पड़ता है। फिर आज की महंगाई में सभी बच्चों का समुचित पालन पोषण संभव नहीं है। इस प्रकार बच्चे के आगमन और उसके उचित पालन पोषण में कमी से उत्पन्न झल्लाहट पति-पत्नी में झगड़े की जड़ है और दोनों के झगड़े का बच्चों के ऊपर बहुत बुरा असर होता है। ऐसे कलहपूर्ण वातावरण में बच्चों का समुचित विकास नहीं हो पाता और वे दब्बू प्रकृति के हो जाते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि बच्चे ही परिवार की कलह और मन मुटाव के लिए दोषी होते हैं। बल्कि सच्चाई तो यह है कि बच्चे के आगमन से जिंदगी में तो एक सुखद बदलाव आता है। घर का आंगन खुशियों से भर उठता हैं माता-पिता के साथ दादा-दादी को एक खिलौना मिल जाता है। तो हॉ, बच्चे के आगमन के लिए एक योजना जरूर बना लें।

रचनाकार :- अश्विनी केशरवानी

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