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खड़ी लुगाइयां के मांह सुथरी श्यान की बहू Khadi lugaiya ke mah suthri shan ki bahu

प्रिय दोस्त इस रागनी में कवि ने एक गरीब किसान की पत्नी की सुन्दरता और उसके चरित्र का वर्णन बहुत ही सहज और सरल शब्दों में किया है, इसमें कवि ने बताया है कि वह इतनी सुंदर है लेकिन फिर भी उसे अपनी सुन्दरता पर अभिमान नहीं है और वह अपने मायके और ससुराल दोनों घरों की शान है, आइये पढ़ें.....

खड़ी लुगाइयां के मांह सुथरी श्यान की बहू,
पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू...

गळ में सोने का पैंडल या हार चाहिए था,
बिन्दी सहार बोरळा सब शिंगार चाहिए था ...
सूट रेशमी चीर किनारीदार चाहिए था,
इसी इसी नै तो ठाडा घर बार चाहिए था...
रुक्का पड़ता जो होती धनवान की बहू....
पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू...

चारों तरफ लुगाइयां की पंचात कर रही थी,
सब की गेलां मीठी मीठी बात कर रही थी...
बात करण म्हं पढ़ी लिखी नै मात कर रही थी,
दीखै थी जणु सोलह पास जमात कर रही थी...
बैठी पुजती जो होती विद्वान की बहू.....
पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू...
 
मस्तानी आंख्यां म्हं मीठा प्यार दीखै था,
गोरे रंग रूप म्हं हुआ त्योहार दीखै था...
हट्टा कट्टा गात कसा एक सार दीखै था,
नखरा रोब गजब का बेशुमार दीखै था....
दबते माणस जो होती कप्तान की बहू...
पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू...
 
इज्जत आगै दौलत नै ठुकरावण वाळी थी,
टोटे म्हं भी अपनी लाज बचावण वाळी थी...
पतिव्रता नारा का फर्ज पुगावण वाळी थी,
पीहर और सासरे नै चमकावण वाळी थी...
“ज्ञानी राम “ जणु लिछमी थी भगवान की बहू...
पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू...

खड़ी लुगाइयां के मांह सुथरी श्यान की बहू,
पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू...

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