लाख चौरासी जीया जून मैं नाचै दुनिया सारी Lakh chorasi jiya jun me nache duniya sari

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नाचने-गाने का और लखमीचंद के सांगों का विरोध भी बहुत होता था, क्योंकि उन दिनों में आर्यसमाज का प्रभाव बहुत बढ़ गया था । आत्मविश्वासी पंडित जी ने विरोधों का जमकर मुकाबला किया । पुरुषों द्वारा स्त्रियों का भेष धारण करने की सफाई देते थे : इन मर्दों का के दोष भला धारण में भेष जनाना । इस बारे में उनकी यह रागनी पेश है....

लाख चौरासी जीया जून मैं नाचै दुनिया सारी
नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी...

सब तै पहलम विष्णु नाच्या पृथ्वी ऊपर आकै
फिर दूजे भस्मासुर नाच्या सारा नाच नचा कै
गौरां आगै शिवजी नाच्या ल्या पार्वती नै ब्याह कै
जल के ऊपर ब्रह्मा नाच्या कमल फूल के म्हा कै
ब्रह्मा जी नै नाच-नाच कै रची सृष्टि सारी...
नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी...

गोपनियां मैं कृष्ण नाच्या करकै भेष जनाना
विराट देश मैं अर्जुन नाच्या करया नाचना गाणा
इन्द्रपुरी मैं इन्द्र नाचै जब हो मींह बरसाणा
गढ़ माण्डव मैं मलके नाच्या करया नटां का बाणा
मलके नै भी नाच-नाच कै ब्याहल्यी राजदुलारी...
नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी...

पवन चलै जब दरख्त नाचैं पेड़ पात हालैं सैं
लोरी दे- दे माता नाचैं बच्चे नै पाळैं सैं
रण के म्हां तलवार नाचती किसे हाथ चालैं सैं
सिर के ऊपर काळ नाचता नहीं घाट घालै सै
काल बली नै नाच खा लिए ऋषि-मुनि-ब्रह्मचारी...
नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी...

बण मैं केहरी शेर नाचता और नाचे सै हाथी
रीछ और बंदर दोनों नाचैं खोल दिखावैं छाती
गितवाड़े मैं मोर नाचता कैसी फांख फर्राती
ब्याह शादी मैं घोड़ी नाचैं जिस पै सजैं बराती
दूर दराज कबूतर नाचैं लगैं घुटरगूं प्यारी....
नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी...

दीपचन्द खाण्डे मैं नाच्या सदाव्रत खुलवाग्या
बाजे नाई नाच-नाच कै और भी भक्त कुहाग्या
हावळी मैं नत्थू ब्राह्ममण मन्दिर नया चिणाग्या
‘लखमीचन्द’ भी नाच-नाच कै नाम जगत मैं पाग्या
इसे-इसे भी नाच लिए तै कौण हकीकत म्हारी... 
नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी...

लाख चौरासी जीया जून मैं नाचै दुनिया सारी
नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी...

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