रथ जुड़ा कै चाल पड़ी कितै वर जोड़ी का पावै Rath juda ke chal padi jodi ka var pave

राजा अश्वपति को वरदान के रूप में पुत्री सावित्री प्राप्त होती है। जब सावित्री जवान होती है तो राजा को उसकी शादी की चिन्ता सताने लग जाती है। राजा अश्वपति उस लड़की के योग्य वर ढूंढ़ने के लिए बहुत घूमते हैं लेकिन उस लड़की योग्य वर सारे संसार में नहीं मिला। आखिरकार वह लड़की स्वयं अपनी जोड़ी का वर ढूंढ़ने निकल पड़ती है। सावित्री चलते चलते अपने मन में क्या विचार करती है....

रथ जुड़ा कै चाल पड़ी कितै वर जोड़ी का पावै
उस मालिक का भजन करुं जै म्हारी जोट मिलावै।

अवल तै मनै इतना हो ज्यूं रात भरी में तारा
दो चीज का गुण चाहूं सूं भूखा और मूजारा
सुन्दर शान पूरे ईमान कुछ हो हर का प्यारा
मै करमाँ नै ना रोती ना मिलता करम उधारा।
उस छैले की नार बणूं जो हंस कै लाड लडावै।

इसे पति तै मेल मिलै जिहनै ऊंच नीच का डर हो
सीधी डिगरी चालणियां हाजिर नाजिर नूर हो
महल हवेली ना चाहती चाहे टूट्या-फूट्या घर हो
दुःख त्रिया नै यो हो सै जो बिन सोधी का वर हो
सारी उमर ख्वार करै इसे मूरख तैं राम बचावै।

खोटा सत्संग बाली का था सतसंग ही मैं मरग्या
खोटा सतसंग रावण का था नास कुटुम्ब का करग्या
चन्द्रमा कै स्याही लागी सत्संग का डंड भरग्या।
खोटा सतसंग करने आळा बता कुणसा पार उतरग्या
खोटे का सतसंग करे तै धर्म नष्ट हो जावै।

पड्ढण मदरसै जाया करता उमर अवस्था याणी
मुंशी जी नै डंडा मारया आख्यां में भरग्या पाणी
फेर पिता नै न्यूं सोची चाहिए हळकी कार सिखाणी
सिर बदनामी टेक लई गया सीख रागणी गाणी
मेहर सिंह इस दुनियां में आकै क्यू लुच्चा ऊत कहवा वै।

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