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हद होगी डेरूबाजी नै मूर्ख लोग भका राखे Us iswer ka naam chhodke pakhndo me fase

प्यारे दोस्तों, आज जो रागनी मैं आपके सामने लेकर आया हूँ इसे पढ़कर आपको मालूम हो जाएगा कि इस अनपढ़ समाज में मुर्ख लोग क्या - क्या आडम्बर करते है. आज समाज में बहुत लोग पढ़ें लिखें है लेकिन फिर भी उनका विश्वाश पाखंडों में ही रहता है, आइये इस रागनी से जानते है....

उस ईश्वर का नाम छोड़कै जित सेवादार धुका राखे
हद होगी डेरूबाजी नै, मूर्ख लोग भका राखे......

रैपा मांगै भेंट सूर की, बच्ची छोड़ मदानण की
होगे बिघन, कुणटगी माता, लिए बिना ना मनण की
शनिवार, बुधवार, चैत धुकती, शक्ति देख चुगानण की
पंडिताणी, ब्राह्मणी धुकै, अक्कल बिगड़गी जनानण की
जेठे बेटे पप्पू की गुद्दी मैं बाळ रखा राखे

गुड़गामा और धुकै पाथरी, सारी जात कुबूल रहे
गठ जोड़े की गांठ बांधकै, बूढ़ा-बुढ़िया टूल रहे
आगै बूढ़ा पाछै बुढ़िया, जात-पात मैं फूल रहे 
आगै बूढ़ा पाछै बुढ़िया, जात-पात मैं फूल रहे 
डोळी खेलै उन लोगां की, जिनके घर-घर भूत ढुका राखे

होक्का भरकै खबर पाड़ले, रेडियो, वायरलस साळे का
बावरी बणकै मीढा मांगै, बकरा बागड़ आळे का
पूरी भेंट बसंती मांगै, गहणा नारियल नाळे का
पक्के पुळां पै सैयद धुकता, नामी पीर मुंढाले का
सैयद पीर कड़ै रहगे, जो पाकिस्तान पहुंचा राखे

एक मुर्गा एक मींढा लेकै, मारै धोक मुकरबे पै
बुद्धिहीन पांच दस जुड़ज्यां, किसकी रोक मुकरबे पै
पीकै घूंट भगत नै सूझै, तीन लोक मुकरबे पै
दूर बीमारी होज्या सारी, जब आवै रोग मुकरबे पै
केसरमल के सोल्हे मांगै, जो लाकै ज्योत बुला राखे

संगत हो उसी सौभा लागै, रण मैं जूत मूरख़ां कै
दूर बीमारी शुद्ध हो सारी, जब आवै सूत मूरखां कै
अमीर आदमी सुख नै भोगै, चिपटै भूत मूरखां कै
दारू पी कै करै लड़ाई, बाजै जूत मूरखां कै
कह ‘दयाचंद’ हाम माड़े होगे, इस रंज फिकर नै खा राखे

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