अमरुद की खेती करने का वैज्ञानिक तरीका Amrud ki kheti ka vaigyanik tarika

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अमरुद की सफल खेती करने के लिए आपको वैज्ञानिक पहलू को ध्यान में रखकर खेती करनी चाहिए। जिससे आपको अच्छी किस्म के पौधे कम उत्पादन लागत और ज्यादा मुनाफा प्राप्त हो सके। एक बात को हमेशा ध्यान में रखे की बाग की सफलता पौधों की अच्छी किस्म पर निर्भर होती है।

भारत में अमरुद के क्षेत्र में विस्तार की अपार सम्भावना है। अमरुद की खेती करके आप लाखों कमा सकते है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अन्तर्गत अमरुद के फलों के क्षेत्रफल में वर्ष भर वृद्धि हो रही है। और साथ ही साथ पौधों की की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान लखनऊ ने अमरुद में वेज कलम की तकनीक विकसित की है। जिससे आसानी से अमरुद का पौधा तैयार किया जा सकता है। आज के समय में पुरे देश में अमरुद का पौधा त्वरित प्रवर्धन (वेज कलम) द्वारा तैयार किया जा रहा है। 

वेज कलम से लाभ- वेज कलम पौध प्रवर्धन तकनीक की एक सरल विधि है। वेज कलम तकनीक द्वारा वर्ष भर पौधे तैयार किये जा सकते है। इस तकनीक की सफलता का प्रतिशत काफी अधिक रहता है। इससे पौधे 10 से 15 दिनों में फुटाव लेते हैं। तथा 4 से 5 माह तक विक्री के लिए तैयार हो जाते है। निम्न तापमान 12℃ (12 डिग्री सेल्सियस) से कम पर पालीथीन कैप की मदद से सफल तरीके से इस तकनीक द्वारा पौधे आसानी से तैयार किये जा सकते है। अगर देखा जाए तो यह तकनीक व्यावसायिक रूप से अधिक उपयोगी है।

पौधों का चयन- प्रवर्धन में सांकुर साखा लेने के लिए मातृ पौधे का उपयोग किया जाता है। अच्छे किस्म की बढ़िया पौधों से मातृ खण्ड की स्थापना की जानी चाहिए। अच्छी किस्म के नर्सरी के लिए यह जरुरी है की पैतृक वृक्ष जिनसे कलम या साखा नये पौधों को तैयार करने हेतु लेना है नर्सरी के अंदर ही हो।

बीजू पौधे (मूलवृन्त) तैयार करना- पालीथीन बैग में अमरुद के वेज कलम की तकनीक का मानकीकरण किया गया है। इस तकनीक में पॉलीथिन बैग में मूलवृन्त तैयार करना इसलिए सन्तुत किया गया है क्योकि जड़ों से छेड़छाड़ न होने के कारण पौधे अच्छे से लग सके। पालीथीन बैग में नर्सरी उगाने से खर पतवार उखाड़ने में श्रमिकों सिंचाई तथा पौधे को ले जाने आने में होने वाले व्यय की बचत होती है।

कलम के लिए पौधों का चयन- जहाँ तक पौधों की चयन की जब बात आती है तो सही मातृ वृक्षों का चयन करना चाहिये। क्योकि इन्हीं चयनित मातृ वृक्षों से 3 से 4 माह पुराने सांकुर का प्रयोग प्रवर्धन में किया जाता है। सांकुर की उम्र 3 से 4 माह की होनी चाहिए। प्रवर्धन के लिए इसपर 4 से 5 कली लगी होनी चाहिए। तथा सांकुर की लम्बाई 15 से 20 सेमी साथ ही साथ इसकी मोटाई 0.5 से 1.0 सेमी होनी चाहिए। प्रवर्धन के लिए उपयोग में लाने से 5 से 10 दिन पहले ही मातृवृक्ष पर सांकुर की पत्तियों को तोड़ कर उसी समय सांकुर के ऊपरी हिस्से को काट देना चाहिए जिससे सांकुर पर लगी कली फूल जाती है अथवा शीत ऋतू में प्रवर्धन हेतु उपयोग में लायी जाने वाली सांकुर साखा की पत्तियों को काट कर उसी दिन मूलवृन्त में प्रत्यारोपित कर पॉलीथिन कैप से ढकने से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

प्रवर्धन की तकनीक- जब आप सांकुर का चयन कर ले तो उसके बाद मूलवृन्त को पॉलीथिन बैग की सतह से 15 से 20 सेमी. की ऊंचाई से काटे देना चाहिये मूलवृन्त के शीर्ष पर कटे भाग से 4 से 5 सेमी का गहरा लम्बवत चीरा बीचोंबीच सावधानी से लगाया जाता है। पूर्व में तैयार सांकुर साख के आधार पर 4 से 5 सेमी दोनों तरफ से तिरछा नुकीला काटते हैं। उसके बाद सांकुर साखा को कटे हुए मूलवृन्त में डालकर तथा दबाकर प्लास्टिक स्ट्रिप से बांध दिया जाता है। प्रवर्धन के तुरंत बाद सांकुर को सफेद पॉलीथिन कैप को पहनाकर आधार को रबर बैंड से बांध दिया जाता है। जब 10 से 15 दिनों में कलिका का फुटाव होने लगे तो पॉलीथिन कैंप को हटा देना चाहिए ताकि जोड़ों पर गाठ न पड़े। पौधों की लंबाई 5 से 6 माह में 40 से 50 सेमी हो जाती है। और पौधे विक्री हेतु तैयार हो जाते है।

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