बरसीम की आधुनिक खेती करने की जानकारी Barsim ki aadhunik kheti karne ki jankari

बरसीम हरे चारों में अपने गुणो द्वारा दुधारू पशुओ के लिए प्रसिद्ध है। उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्रों में मक्का या धान के बाद रबी की फसल में बरसीम की खेती की जाती है बरसीम की खेती हरे चारे हेतु लगभग पूरे भारतवर्ष में की जाती है। बरसीम चारे की बुआई अक्टूबर के पहले पखवारे में करने से पशुओं को हरा चारा दिसम्बर से मई तक मिलता रहता है।  वरसीम मक्का, धान, ज्वार या बाजरा के बाद आसानी से बोई जा सकती है।
 

खेत की तैयारी:- बरसीम की खेती सभी भूमियों में की जाती है, परन्तु सामान्यतः भारी दोमट मिट्टी जिसकी जलधारण क्षमता अधिक होती है।  इसकी खेती के लिए उपयुक्त है।  धान के खेत प्रायः वरसीम की बुआई के लिए ठीक रहते हैं।  भूमि का पी.एच. मान 6.0 या इससे  अधिक होना चाहिए।  दो-तीन बार हैरो चलाकर खेती की मिट्टी भुरभुरी कर लेना चाहिए।  खेत का समतल होना वरसीम की खेती के लिए अनिवार्य है।  बोने से पहले छोटी-छोटी क्यारियां बनाना चाहिए।  क्यारी की लम्बाई अधिक चैड़ाई 4-5 मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। 

बरसीम की प्रजातियां:- बरसीम की वरदान जे.वी.-1 तथा वी.एल.-1, वी.एल.-10, जे.एच.वी.-146 प्रमुख प्रजातियां  हैं। 

बीज दर एवं बीजोपचार:- 25-30 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता प्रति हेक्टेयर होती है।  यदि 1 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर चारे वाली सरसों मिलकार बुआई की जाय तो पहली कटाई में अच्छी मात्रा में चारा प्राप्त किया जा सकता है।  प्रायः वरसीम के बीज के साथ कासनी का बीज मिला रहता है।  अच्छे बीज उत्पादन के लिए यह आवश्यक है कि शुद्ध बीज बोया जाय।  यदि कासनी से मिश्रित बीज को 5-10 प्रतिशत नमक मिले घोल में डाला जाए तो कासनी के बीज पानी में तैरने लगते हैं और उन्हें सरलता से प्रथक किया जा सकता है।  यदि किसी खेत में पहली बार वरसीम बोई जा रही है तो बोने से पूर्व वरसीम कल्चर द्वारा बीज का उपचार करना अति आवश्यक है।

उर्वरक:- 30 कि.ग्रा. नत्राजन एवं 80 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से 175कि.ग्रा. डी.ए.पी. एवं पहली, दूसरी तथा तीसरी कटाई के बाद 100 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर देना चाहिए।

कटाई:- प्रथम कटाई 50-55 दिन बाद करना फिर 30 दिन के अन्तर पर कटाई की जा सकती है।  इस प्रकार 4-5 कटाई की जा सकती हैं।

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