धनिया की आधुनिक खेती करने की जानकारी Dhaniya ki aadhunik kheti karne ki jankari

किसी भी फसल के लिए ये बेहत important है की जलवायु और भूमि फसल के अनुकुल हो | धनिया शीतोष्ण जलवायु का फसल है, इसके उत्तम production के लिए शुष्क और ठंडा मौसम सबसे उचित माना गया है | प्रारंभिक समय में बीजो के अंकुरण के लिए 25-26oC तापमान की आवश्यकता होती है |

अगर आप धनिया के उच्च गुणवत्ता के लिये शुष्क और ठंडा मौसम, तेज धूप, समुद्रतल से अधिक ऊंचाई के साथ ऊंचहन भूमि की आवश्यकता होती है । धनिया की खेती आम तौर पर किसी भी मिट्टी में की जा सकती है, परन्तु धनिया की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी सर्वोत्तम माना गया है | साथ ही मिट्टी का Ph मान 6.5-7.5 होनी चाहिए |

भूमि की तैयारी - खेती करने के पूर्व हमे खेत को फसल के अनुरूप तैयार कर लेनी चाहिए | खेती से पहले खेतो में रसायनिक खाद के जगह जैविक खाद का इस्तेमाल करे तो ये फसल और खेत दोनों के लिए लाभकारी होता है | इसलिए खेतो में जैविक खाद (गोबर) का इस्तेमाल करना चाहिए | खेतो में फसल के पहले 4-5 जुटाई कर के मिट्टी को अच्छी से भुर-भुरी कर ले, अंतिम जुटाई से पहले खेतो में आवश्यकता नुसार गोबर या कम्पोस्ट खाद मिलकर एक और जुताई कर के पाटा चला लेना चाहिए |

धनिया के प्रजाती - अन्य फसलो के मुताबिक धनिया के भी कई प्रजातीय पाई जाती है | कृषक को खेती के लिए सही बीज का चुनाव करना आवश्यक है | इसकी किस्मे निम्नलिखित है:-

हिसार  सुगंध, आर सी आर, कुंभराज, आरसीआर435, आरसीआर 436, आरसीआर446, जी सी 2(गुजरात धनिया 2), आरसीआर684, पंत हरितमा, सिम्पो एस 33, जे डी-1, एसीआर1, सी एस 6, आर सी आर480, आर सी आर728 आदि

बीज की बुवाई का समय - धनिया रबी फसल होने के कारण इसकी बुवाई अक्टूबर और नवम्बर के मध्य करना सबसे अच्छा होता है | भारत के कई क्षेत्रो में इसकी बुवाई मई से अगस्त के मध्य भी करते है, परन्तु इसके बुवाई का उचित समय October से November के मध्य वाला समय उचित है |

बीज की बुवाई - बीज को बोने से पहले इसका उपचार करना बेहद अवश्यक है इसके उपचार से बिज में होने वाले बीमारी नहीं होगी और अंकुरण अच्छा होगा | साथ ही बीजोपचार फसल को कई रोगों और किट पतंगों से दूर रखता है | एक किलोग्राम बीज के उपचार के लिए कार्बेंन्डाजिम, थाइरम 2:1 की मात्र में 3 ग्रा. या कार्बोक्जिन और थाइरम 3 ग्रा. के साथ ट्राइकोडर्मा विरिडी 5 ग्रा. मिलाकर उपचार करे | बीज को जनित रोग से बचाने के लिए बीज को स्टे्रप्टोमाईसिन 500 पीपीएम से उपचारित करना फायदेमंद होता है | मुख्यतः धनिया की बुवाई दो प्रकार से होती है सिंचित और असिंचित |

सिंचित में हम बीज को एक पंक्ति में लगाते है जिसमे पंक्तियों को दुरी 20-30 cm और पौधो के आपस से दुरी 10-15 cm राखी जाती है | इस विधि में बीज की लागत 6-8 kg प्रति एक्कड़ होती है, जो असिंचित से कम है और साथ ही इसमे production भी ज्यादा होता है |

असिंचित खेती में बीज को किसी पंक्ति में नहीं लगाया जाता है, इसमे हम बीज को खेतो में छिडकाव करते है जिससे बीज सभी जगहों पर सामान्य अन्तराल पर न हो कर कही पर अधिक और कही कम होता है, जिसके कारण इस विधि में production अधिक नहीं होता है | इस विधि में बीज की खपत 10-12 kg प्रति एक्कड़ होता है |

खाद एवं रख-रखाव - जमीन में फसल के लिए पर्याप्त तत्व नहीं होने के कारण हम खेती से पहले खतो में अक्सर गोबर आदि का इस्तेमाल करते है | धनिया का फसल के 20 दिन के हो जाने के बाद हमे पौधो में जीवामर्त का छिडकाव करना चाहिए | साथ ही हमे समय समय पर दहनीय के पौधो के साथ निकलने वाले खरपतवार को निकाल कर हटा देना चाहिए | ये पौधे के विकास को रोकता है और साथ ही production को कम करता है |

किट नियंत्रण - अन्य फसलो के मुताबिक इस में भी किट का प्रकोप आप देख सकते है, परन्तु इस फसल में अन्य फसलो के मुताबिक किट कम पाए जाते है |

चैंपा – धनिया के खेती में आक्रमण करने वाला कीटो में से ये पहला किट है | मुख्यतः ये देखा गया है कीटो का आक्रमण पौधो पर पुष्प के आरम्भ होने पर होता है, परन्तु चैंपा धनिया के पौधे के आरंभ में आक्रमण करता है, और ये इसके कोमल अंगो से रस को चूसता है |

नियंत्रण – चैंपा को पौधो से दूर रखने के लिए नीम के तेल को गौ मूत्र में मिलाकर पौधो पर छिडकाव करना चाहिए |

रोग एवं रोकथाम :-

उकठा – उकठा धनिया में पाए जाने वाले रोगों में से सबसे खतरनाक है, इसके कारण पौधे मुरझा जाते है और इनका विकास रुक जाता है | इस बीमारी से बचने के लिए खेती से पहले खेत की अच्छी से गहरी जुताई करनी चाहिए | साथ ही खेत में उचित फसल चक्र का इस्तेमाल करना चाहिए और बीज लगाने से पहले बीजोपचार करना कभी नहीं भूलना चाहिए |
तना व्रण – तना व्रण को स्टेम गांल के नाम से जाना जाता है | इस बीमारी में पौधे के उपरी भाग संक्रमण के कारण सुख जाते है | इससे बचने के लिए बीज को बोने से पहले नीम के तेल या गौ मूत्र से अवश्य उपचारित करे |
पाला – ठण्ड के दिनों में फसल में अक्सर पाले का शिकायत सुनाने को मिलता है | फसल में पाला पड़ने के कारण भरी नुकसान पहुचता है | इसके असर को कम करने का सबसे आसन तरीका है गोबर के उपलों की रख, जी हा इस राख का छिडकाव कर आप पौधो को पाला से बचा सकते है |

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