लीची की वैज्ञानिक खेती करने का तरीका Lichi ki vaigyanik kheti karne ka tarika

लीची की खेती हेतु गहरी दोमट मिट्टी को सबसे उत्तम कहा गया है। लीची की खेती करने के लिए खेत में जल-प्रणाली का management अच्छी होनी चाहिए। ध्यान रहे की खेती के समय ज़मीन कठिन परत (Hard layer) वाली या फिर चट्टान (rock) वाली ना हो साथ हीं मिट्टी में चूने की कमी भी ना हो ।

जलवायु - लीची की खेती के लिए may और june का time सही माना जाता है। लीची की सफल खेती के लिए december और january का minimum temperature लगभग 7°C और गर्मी में maximum temperature लगभग 36°C से ज्यादा नहीं होना चाहिए। अधिक पाला (ठंढ) पड़ने से लीची के छोटे पौधे को नुकसान पहुँच सकता है इसलिए इसकी देखभाल ज्यादा करने की जरूरत पड़ती है ।

लीची की किस्में - लीची की किस्में कुछ इस प्रकार से होते है :-

पुरवी लीची
शाही लीची,
अरली बेदाना लीची ,
कसबा लीची
चाइना लीची,
लाल मुम्बई आदि।

U.P और bengal में ज्यादातर बेदाना किस्म की लीची उगाई जाती है । बेदाना किस्म की लीची का बीज बहुत हीं छोटा होता है साथ हीं इसके गुद्दे बहुत हीं ज्यादा होते है । अन्य सभी किस्मो के litchi में चीनी की मात्रा 10-11 % होती है वहीँ बेदाना किस्म की litchi में चीनी की मात्रा 14% होती है ।

पौधे का रोपण - Litchi के पौधों का रोपण July से October month तक के बीच में कर देना चाहिए। litchi के पौधे का रोपण के लिए गड्ढो की खोदाई का काम और फिर उसकी भराई का काम आम के पौधों के रोपण जैसा हीं होता है। गड्ढे को भरते समय उसकी सबसे ऊपरी भाग में मिट्टी के साथ लगभग 25 kg गोबर की सड़ी हुए खाद, 2 kg हड्डी का चूरा और  300 kg म्यूरेट आफ पौटाश को अच्छे से mix कर के डालना चाहिए। लीची के पौधे को रोपते समय पौधों की दूरी 10 m तक होनी चाहिए ।

खाद प्रबंधन - कृषि वैज्ञानिको के मुताबिक कहा गया है की लगभग 450 kg लीची के ताजे फलो के विकास हेतु 1.36 kg potash, 455 g phosphorus, 455 g nitrogen, 342g चूना(Lime) और 228 g magnesium का use खाद के रूप में किया जाना चाहिए ।

सिंचाई - ग्रीष्म ऋतु में litchi के छोटे पौधों की सिंचाई week में एक बार जरूर से करना चाहिए। जब फल में वृद्धि होने लगे तो हर 10 से 15 दिनों के interval में regular सिंचाई करते रहना चाहिए ।

खरपतवार - litchi की खेती में खरपतवार को साफ़ करने के लिए खेतो की गहरी जुताई ना करे क्योंकि लीची के पेड़ की जड़े भूमि तल से सटा हुआ हीं रहता है इसलिए ज्यादा गहरी जुताई से लीची के जड़ो को नुकसान पहुँच सकता है ।

रोग व कीट प्रबंधन - आमतौर पर लीची में बहुत हीं कम रोग व कीट का प्रकोप दिखता है। कुछ हीं कीट ऐसे है जो की लीची के पौधों को प्रभावित करते है जैसे की :-

लीची माइट : लीची माइट एक प्रकार का कीट होता है जो की पत्तो के निचे के part पर देखने को मिलता है। यह कीट पत्तो में से उसका रस चूस लेता है जिसके कारण पत्ते brown color के दिखने लगते है और फिर धीरे धीरे मुड़ जाते है। इस कीट का प्रकोप जब बढ़ जाता है तो लीची के पत्ते पूरी तरह से मुड़ कर गोल होने लगते है और फिर सूख कर ज़मीन पर गीर जाते है । यह कीट ज्यादातर march से july तक देखने को मिलता है ।

बचाव :- इस कीट से बचने के लिए कीट से प्रभावित पत्तो को पौधों से तोड़ कर और जो पत्ते ज़मीन पर गीरे हुए है उसे भी एकत्रित कर के एक साथ जला देना चाहिए। इसके अलावा लीची के पौधों पर 0.05% पैराथियान का छिड़काव करते रहना चाहिए ।
मीलीबग कीट :  जिस खेत में लीची व आम के पेड़ एक साथ होते है उस जगह पर इस कीट का प्रकोप ज्यादा होता है। यह किट फूलों में से और नई कोपलों में से भी रस चूस लेते है ।

बचाव :- इस कीट से बचने हेतु 0.05% पैराथियान का छिड़काव पौधों पर किया जाना चाहिए साथ हीं किसी भी पक्षी या फिर चमगादड़ को पौधों के पास आने से रोकने का अच्छा बंदोबस्त करना  चाहिए ।
फलों की कटाई व भंडारण - जब लीची के फल पक कर ready हो जाये तो उसे तोड़ते time उसके गुच्छे सहित टहनी वाला भाग से हीं काट लिया जाता है ताकि अगले साल फिर से शाखाओं के बढ़ने के साथ उस पर फल लग सके।

फलों को तोड़ लेने के बाद उसे किसी ठंडे व हवादार स्थान पर रख कर उसका packing करना चाहिए।  packing के लिए लीची को किसी बांस की बनी टोकरी या फिर लकड़ी के box में pack किया जाना चाहिए और लीची को box या टोकरी में रखते समय उसके चारों side और ऊपर से  लीची की हरी पत्तियों को रखना चाहिए ।

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