शलजम की खेती की खेती करने का वैज्ञानिक तरीका Shalgam Ki Kheti karne ka vaigyanik tarika

शलजम भी एक जड़ वाली फसल है ठन्डे मौसम में हरी सब्जी के रूप में जड़ों व पत्तियों को प्रयोग किया जाता है। शलजम का अचार, सलाद तथा सब्जी के रूप में अधिक प्रयोग करते हैं। ठण्डे मौसम की फसल होने से कम तापमान पर अधिक स्वाद होता है। लेकिन मार्च व अधिक तापमान बढ़ने पर वृद्धि रुक कर स्वाद बदल जाता है। बुवाई से 20-25 दिन के बाद साग में प्रयोग अधिक करते हैं तथा व्यावसायिक रूप से बाजार मूल्य अधिक मिलता है।

शलजम की जड़ों व पत्तियों में अधिक पोषक-तत्व पाये जाते हैं। इससे अधिक मात्रा में कैल्शियम व विटामिन ‘सी’ प्राप्त होता है तथा अन्य पोषक तत्व कैलोरीज, फास्फोरस, कार्बोहाइड्रेटस आदि मिलते हैं।

शलजम की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु - शलजम की फसल को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। लेकिन सफल-उत्पादन प्राप्त करने के लिए हल्की चिकनी दोमट या बलुई दोमट भूमि अति उत्तम सिद्ध हुई है। भूमि में जल-निकास ठीक होना चाहिए व भूमि उपजाऊ होनी चाहिए।

शलजम शरद-ऋतु की फसल है। इसलिये ठण्डी जलवायु की आवश्यकता पड़ती है। यह अधिक ठन्ड व पाले को सहन कर लेती है। अच्छी वृद्धि के लिये ठन्ड व आर्द्रता वाली जलवायु सर्वोत्तम रहती है। पहाड़ी क्षेत्र में पैदावार अधिक मिलती है।

शलजम की खेती के लिए खेत की तैयारी - खेत जुताई में मूली की फसल की तरह करनी चाहिए तथा अन्य क्रियाएं, जैसे घास व ठूंठ आदि को बाहर निकाल कर जला दें तथा भूमि को बिल्कुल भुरभुरा करें तथा छोटी-छोटी क्यारियां बना लें।

शलजम की उन्नतशील किस्में:-

1. लाल-4 व सफेद-4- ये किस्म शीघ्र तैयार होने वाली है। लाल किस्म को अधिकतर शरद ऋतु में लगाते हैं। जड़ें गोल, लाल तथा मध्यम आकार की होती हैं जो 60 दिन में तैयार हो जाती है।

2. सफेद-4 को अधिकतर वर्षा ऋतु में लगाते हैं। यह शीघ्र तैयार होती है तथा इसकी जड़ों का रंग बर्फ जैसा सफेद होता है। गूदा चरपराहट वाला होता है। ये  50-55 दिन में तैयार हो जाती है। उपज 200 कु. प्रति हैक्टर मिलती है।

3. परपल-टोप - जड़ें बड़े आकार की, ऊपरी भाग बैंगनी, गूदा सफेद तथा कुरकुरा होता है। यह अधिक उपज देती है। इसका गूदा ठोस तथा ऊपर का भाग चिकना होता है।
4. पूसा-स्वर्णिमा - इस किस्म की जड़ें गोल, मध्य आकार वाली, चिकनी तथा हल्के पीले रंग की होती हैं। गूदा भी पीलापन लिये होता है। यह 65-70 दिन में तैयार हो जाती है। सब्जी के लिये उत्तम है।
5. पूसा-चन्द्रिमा - यह किस्म 55-60 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी जड़ें गोलाई लिये हुए होती है। यह अधिक उपज देती हैं। उपज 200-250 कु. प्रति हैक्टर देती है। जाड़ों के लिए उत्तम है।
6. पूसा-कंचन - यह किस्म रेड एसीयाटिक किस्म तथा गोल्डन-वाल के द्वारा तैयार की गयी है। छिलका ऊपर से लाल, पीले रंग का गूदा होता है। यह अगेती किस्म है जो शीघ्र तैयार होती है। जड़ें मीठी व सुगन्धित होती हैं।
7. पूसा-स्वेती - यह किस्म भी अगेती है। बुवाई अगस्त-सितम्बर में की जाती है। जड़ें काफी समय तक खेत में छोड़ सकते हैं। जड़ें चमकदार व सफेद होती हैं। 40-45 दिन में खाने लायक होती है।
8. स्नोवाल - अगेती किस्मों में से है। इसकी जड़ें मध्यम आकार की, चिकनी, सफेद एवं गोलाकार होती हैं। गूदा नरम, मीठा होता है।

बीज की मात्रा एवं बुवाई का समय - शलजम का बीज समय व किस्म 4 किलो बीज प्रति हैक्टर बोना चाहिए जिसमें अंकुरण की 90-95% क्षमता है। बुवाई का समय जुलाई-नवम्बर तक होता है। अगेती, मध्य तथा पिछेती किस्मों को आवश्यकतानुसार बोना चाहिए। बुवाई कतारों में 30 सेमी. की दूरी पर करें तथा पौधा 10-15 सेमी. पर रखें | बुवाई छिडक कर भी कर सकते हैं।

बगीचों के लिए बीज की मात्रा 8-10 ग्राम 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र के लिये पर्याप्त होता है जिसे उपरोक्त समय के अनुसार बोयें तथा गर्भ में 4-5 बीज बोयें।

खाद एंव उर्वरकों का प्रयोग - शलजम की फसल के लिए 20-25 ट्रैक्टर वाली ट्रौली सड़ी गोबर की खाद मिटटी में मिलायें तथा उर्वरक- 80 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस तथा 50 किलो पोटाश प्रति हैक्टर प्रयोग करना चाहिए | 325 किलो यूरिया में से 160 किलो यूरिया व 310 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा 82 किलो म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हैक्टर बुवाई से 15 दिन पहलें मिट्टी में भली-भांति मिलायें तथा शेष मात्रा को दो भागों में करके बुवाई से 15-20 दिन बाद पानी लगाने के 4-5 दिन बाद तथा दूसरी मात्रा को बोने से 35-40 दिन के बाद खड़ी फसल में छिड़क दें | इस प्रकार से फसल की वृद्धि अधिक होती है।

शलजम के पौधों की सिंचाई - बोते समय खेत में नमी अवश्य होनी चाहिए। यदि खेत सूखा हो तो हल्की पलेवा कर के बोयें। बोने से 15-18 दिन बाद प्रथम पानी दें। पलेवा ना करें तो 10-12 दिन के बाद हल्का पानी दें। अन्य सिंचाई नमी के अनुसार 1 2-15 दिन के बाद करते रहें। पहली सिंचाई के बाद थीनिंग का भी ध्यान रखें जिससे वृद्धि ठीक हो सके।

खरपतवार नियन्त्रण - शलजम की फसल में जाड़े वाले खरपतवार हो जाते हैं। इनके लिए निकाई-गुड़ाई करना जरूरी है। जड़ों के बढ़ने से पहले हल्की-हल्की मिट्‌टी चढ़ाये जिससे जड़ों का ठीक विकास हो सके तथा यूरिया की दूसरी मात्रा मिट्‌टी चढ़ने के बाद डालें।

फसल-सुरक्षा - शलजम की फसल पर अधिक कीट व रोग नहीं लगते। लेकिन पिछेती फसल में कीट व रोग लग जाते हैं।

कीट - जैसे- एफिडस व पत्ती काटने वाला कीड़ा। इन दोनों के लिए मेटासिस्टमस या मेलाथियान 2 मिली. दवा एक लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से आक्रमण नहीं होता। दवा के 10-12 दिन बाद पत्ती व जड़ों को धोकर प्रयोग करें।

रोगों से शलजम के पौधों की सुरक्षा कैसे करें - इसमें अधिकतर पाउडरी-मिल्डयू लगता है। यह भी पत्तियों को प्रभावित करता है। पत्तियां सफेद-सी हो जाती हैं। नियन्त्रण के लिए फंजीसाइड बेवस्टिन या डाईथेन एम-45 के 0.2% के घोल का प्रयोग करें। जड़ों को धोकर खाने में प्रयोग करें।

खुदाई - खुदाई या कटाई आवश्यकतानुसार समय-समय पर करते हैं। खुदाई करने की अलग-अलग अवस्थाएं हैं। 20-25 दिन की फसल की पत्तियों के लिए उखाड़ लेते हैं तथा जड़ों के लिये आकार बढ़ने पर खोदते हैं। जड़ों को समय से ही खोद लें जिससे स्वाद ना बदलें। खुदाई खुरपी या फावड़े से करें तथा जड़ें कट न पायें। जड़ों को धोकर तथा साफ करके बाजार ले जाना चाहिए।

उपज - शलजम की पत्तियों के अतिरिक्त जड़ें-कृषि-क्रियाएं समय से करने पर 500-600 क्विंटल प्रति हैक्टर आसानी से पैदा की जा सकती हैं।

बगीचों में 15-20 किलो 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र में जड़ें पैदा की जाती हैं तथा समय-समय पर खोद कर सब्जी में प्रयोग की जाती हैं।

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