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स्नान करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए... - Snan karte samay rakhen in baton ka dhyan

 प्रिय दोस्त, आपने लोगों को अलग - अलग समय में और अलग - अलग तरीकों से स्नान करते हुए देखा होगा लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि स्नान कितने प्रकार के होते है और स्नान करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए...

स्नान के प्रकार -
  1. ब्रह्म स्नानः ब्राह्ममुहूर्त में ब्रह्म-परमात्मा का चिंतन करते हुए।
  2. देव स्नानः सूर्योदय के पूर्व देवनदियों में अथवा उनका स्मरण करते हुए।समयानुसार स्नानः
  3. ऋषि स्नानः आकाश में तारे दिखते हों तब ब्राह्ममुहूर्त में।
  4. मानव स्नानः सूर्योदय के पूर्व।
  5. दानव स्नानः सूर्योदय के बाद चाय-नाश्ता लेकर 8-9 बजे।
करने योग्य स्नानः ब्रह्म स्नान एवं देव स्नान युक्त ऋषि स्नान।

स्नान करते समय क्या सावधानियां रखें -
  1. रात्रि में या संध्या के समय स्नान न करें। ग्रहण के समय रात्रि में भी स्नान कर सकते हैं। स्नान के पश्चात तेल आदि की मालिश न करें। भीगे कपड़े न पहनें। (महाभारत, अनुशासन पर्व)
  2. दौड़कर आने पर, पसीना निकलने पर तथा भोजन के तुरंत पहले तथा बाद में स्नान नहीं करना चाहिए। भोजन के तीन घंटे बाद स्नान कर सकते हैं।
  3. बुखार में एवं अतिसार (बार-बार दस्त लगने की बीमारी) में स्नान नहीं करना चाहिए।बीमारी की हालत में सिर के नीचे से ही स्नान करना चाहिए. गीले कपड़े से शरीर पोंछ लेना भी एक तरह का स्नान ही कहा गया है.
  4. दूसरे के वस्त्र, तौलिये, साबुन और कंघी का उपयोग नहीं करना चाहिए।
  5. त्वचा की स्वच्छता के लिए साबुन की जगह उबटन का प्रयोग करें।
  6. सबसे सरल व सस्ता उबटनः आधी कटोरी बेसन, एक चम्मच तेल, आधा चम्मच पिसी हल्दी, एक चम्मच दूध और आधा चम्मच गुलाबजल लेकर इन सभी को मिश्रित कर लें। इसमें आवश्यक मात्रा में पानी मिलाकर गाढ़ा लेप बना लें। शरीर को गीला करके साबुन की जगह इस लेप को सारे शरीर पर मलें और स्नान कर लें। शीतकाल में सरसों का तेल और अन्य ऋतुओं में नारियल, मूँगफली या जैतून का तेल उबटन में डालें।
  7. मुलतानी मिट्टी लगाकर स्नान करना भी लाभदायक है।
  8. सप्तधान्य उबटनः सात प्रकार के धान्य (गेहूँ, जौ, चावल, चना, मूँग, उड़द और तिल) समान मात्रा में लेकर पीस लें। सुबह स्नान के समय थोड़ा-सा पानी में घोल लें। शरीर पर थोड़ा पानी डालकर शरीरशुद्धि के बाद घोल को पहले ललाट पर लगायें, फिर थोड़ा सिर पर, कंठ पर, छाती पर, नाभि पर, दोनों भुजाओं पर, जाँघों पर तथा पैरों पर लगाकर स्नान करें। ग्रहदशा खराब हो या चित्त विक्षिप्त रहता हो तो उपर्युक्त मिश्रण से स्नान करने पर बहुत लाभ होता है तथा पुण्य व आरोग्य की प्राप्ति भी होती है।
  9. स्नान करते समय कान में पानी न घुसे इसका ध्यान रखना चाहिए।
  10. स्नान के बाद मोटे तौलिये से पूरे शरीर को खूब रगड़-रगड़ कर पोंछना चाहिए तथा साफ, सूती, धुले हुए वस्त्र पहनने चाहिए। टेरीकॉट, पॉलिएस्टर आदि सिंथेटिक वस्त्र स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं हैं।
  11. जिन घाटों पर कपड़े धोए जाते हैं, वहां का जल अपवित्र माना गया है. इसलिए वहां से कुछ दूर हटकर ही नहाना चाहिए।
  12. नदी की धारा की ओर या सूर्य की ओर मुंह करके नहाना चाहिए. नदी में 3, 5, 7 या 12 डुब‍कियां लगाना अच्छा बताया गया है.
  13. किस स्रोत का पानी ज्यादा बढ़‍िया होता है, इस बारे में भी शास्त्रों में जिक्र मिलता है. कुएं की तुलना में झरने का पानी, झरने से ज्यादा नदी का पानी, नदी के पानी से किसी तीर्थ का जल, तीर्थ के जल से गंगाजल अधिक श्रेष्ठ माना गया है।
  14. तेल लगाकर और देह को मल-मलकर नदी में नहाना मना है. इसकी जगह नदी से बाहर निकलकर तट पर ही शरीर साफ करके तब नदी में डुबकी लगाना उचित है।
  15. सोमवती अमावस्या के पर्व में स्नान-दान का बड़ा महत्त्व है।इस दिन भी मौन रहकर स्नान करने से हजार गौदान का फल होता है।इस दिन पीपल और भगवान विष्णु का पूजन तथा उनकी 108 प्रदक्षिणा करने का विधान है। 108 में से 8 प्रदक्षिणा पीपल के वृक्ष को कच्चा सूत लपेटते हुए की जाती है। प्रदक्षिणा करते समय 108 फल पृथक रखे जाते हैं। बाद में वे भगवान का भजन करने वाले ब्राह्मणों या ब्राह्मणियों में वितरित कर दिये जाते हैं। ऐसा करने से संतान चिरंजीवी होती है।इस दिन तुलसी की 108 परिक्रमा करने से दरिद्रता मिटती है।