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एक बार संस्कृत के गुरूजी ने कक्षा में पूछा : “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”. इस श्लोक का अर्थ बताओ.

सभी बच्चे चुप बैठे रहे कुल्लू ने कहा - मैं बताऊ सर..

गुरूजी - शाबाश बेटा, बताओ..

कुल्लू - कभी भी रास्ते मे फल बेचने का काम नहीं करना चाहिए.
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एक बार संस्कृत के गुरूजी ने कक्षा में पूछा : “बहुनि मे व्यतीतानि, जन्मानि तव चार्जुन.”

सभी बच्चे चुप बैठे रहे चुल्लू ने कहा - मैं बताऊ सर..

गुरूजी - शाबाश बेटा, बताओ..

चुल्लू - मेरी बहू के कई बच्चे पैदा हो चुके हैं, सभी का जन्म चार जून को हुआ है.
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एक बार संस्कृत के गुरूजी ने कक्षा में पूछा : “तमसो मा ज्योतिर्गमय”

सभी बच्चे चुप बैठे रहे कुल्लू ने कहा - मैं बताऊ सर..

गुरूजी - शाबाश बेटा, बताओ..

कुल्लू - तुम सो जाओ माँ मैं ज्योति से मिलने जाता हुँ.
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एक बार संस्कृत के गुरूजी ने कक्षा में पूछा : “दक्षिणे लक्ष्मणोयस्य वामे तू जनकात्मजा.”
सभी बच्चे चुप बैठे रहे चुल्लू ने कहा - मैं बताऊ सर..

गुरूजी - शाबाश बेटा, बताओ..

चुल्लू - दक्षिण मे खडे होकर लक्ष्मण बोला जनक आजकल तो तू बहुत मजे मे है.
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एक बार संस्कृत के गुरूजी ने कक्षा में पूछा : हे पार्थ त्वया चापि मम चापि…….!
सभी बच्चे चुप बैठे रहे कुल्लू ने कहा - मैं बताऊ सर..

गुरूजी - शाबाश बेटा, बताओ..

कुल्लू - महाभारत के युद्ध मे श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन से कह रहे हैं कि अर्जुन तू भी चाय पी ले, मैं भी चाय पी लेता हूँ. फिर युद्ध करेंगे.

गुरूजी बेहोश…………..

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