कामवासना! दबाएं नहीं काबू में लाना सीखें - Kamvashna ko kaise kabu karen?

कामवासना का दमन नहीं काबू करना सिखाता है योग। योग और धर्म-अध्यात्म में अक्सर यह पढऩे और सुनने को मिलता कि मनुष्य को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। यानी काम-वासना और भोग-विलास से यथा संभव दूर रहना चाहिये। लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि जबरन काम की भावना को दबा दिया जाए।

 

योग के क्षेत्र में अष्टांग योग को सबसे ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है। अष्टांग योग की सिद्धियां प्राप्त करने के लिए यह अति आवश्यक है कि यम में बताए गए सभी चरणों का कड़ा पालन करें। यम का चतुर्थ चरण है ब्रह्मचर्य का पालन करना।

अष्टांग योग में यह चरण काफी महत्वपूर्ण है। क्योंकि जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं कर पाता वह कुण्डलिनी जागरण की अवस्था तक कतई नहीं पहुंच सकता।ब्रह्मचर्य का पालन करना सर्वाधिक कठिन माना गया है। काम भाव की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों का कहना है कि विपरित लिंग के आकर्षण की वजह से ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं हो पाता।

कुण्डलिनी जागरण की अवस्था प्राप्त करने के लिए यह अतिआवश्यक है कि हम हमारे मन में विपरिंग लिंग का स्मरण तक ना लाएं। क्योंकि यदि पुरुष किसी स्त्री का स्मरण काम की दृष्टि से करेगा या स्त्री किसी पुरुष का वैसा ही स्मरण करती है तो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर पाना असंभव सा ही है। अष्टांग योग में यह सबसे अहम चरण है इसका पालन करना अति आवश्यक है।

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