आज दिल और दिमाग खामोश थे, मन का मीत जो मिल गया था

इस हफ्ते कार्य की अधिकता के कारण कुछ ज्यादा ही थकान महसूस कर रही थी दिव्या , इसलिए आफिस से कुछ पहले ही निकल गई। आज शुक्रवार है अब दो दिन घर में रहकर आराम मिलेगा। अपने फ्लेट की सीढ़ियां चढ़ते हुए उसे मां पिताजी के हंसने की आवाजें सुनाई दी। मन प्रफुल्लित हो गया कितने समय बाद उन्हें इस तरह हंसते सुना है।जब अंदर गई तो देखा दोनो सात आठ साल के किसी बच्चे के साथ लूडो खेल रहे थे।


वह लड़का आरोप लगा रहा था," दादी आप चीटिंग कर रही हों" दिव्या के पापा हंसते हुए बोले ," ये बुढ़िया तो हमेशा चीटिंग कर के ही जीतती है। तुम ध्यान रखना जब भी इसके पसंद के अंक नहीं आते यह पासा गिरा देती है। "

तभी मां की नजर दिव्या पर गईं," अरे बेटा तू कब आईं ? और इतनी जल्दी कैसे आ गई ,सब ठीक तो है न?"
दिव्या :" हां मां , जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे वह पूरा हो गया तो जल्दी निकल गई आज आफिस से।यह बच्चा कौन है?"

बच्चा :" मेरा नाम अंशुमान गोयल है,सब मुझे प्यार से अंशु बुलाते हैं। मैं आपका नया पड़ोसी हूं।"
दिव्या हंसते हुए :" और मैं दिव्या हूं, तुम मुझे दिव्या दी बुला सकते हो।हम आज से दोस्त हैं।"
मां :" चलो बेटा अब तुम घर जाकर होमवर्क करो ,दीदी थक गई है आराम करेंगी।"

अंशु तुरन्त अपनी लूडो समेट कर चला गया। दिव्या को समझ नहीं आया मां को अंशु को भगाने की इतनी जल्दी क्या हो रही थी। तीन चार दिन से कुछ नये व्यंजनों की फरमाइश उसे अब समझ आईं ये सब वे अपने नन्हे दोस्त के लिए कर रही थी। और दिव्या समझ रही थी मां पिताजी ने अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ अधिक खाना आरंभ कर दिया है। लेकिन अंशु की बारें में उन्होंने उसको कुछ बताया क्यों नहीं, क्या उन्हें लगता है वह मना कर देती उसके लिए कुछ बनाने से।वह तो ख़ुश होती अंशु के कारण वे इतने प्रसन्नचित लग रहें थे नहीं तो गुमसुम से घर में बैठे रहते हैं।

राकेश कुमार को हल्का सा लकवे का असर था, जिस कारण वे कहीं भी आते जाते नहीं थे,बस घर में ही अपने लायक काम कर पाते थे। सावित्री पति को बिल्कुल अकेले नहीं छोड़ती थी इसलिए घर से बंध गई थी। उम्र के साथ उसके हाथ कांपने लगे थे , रसोई का काम करने में असमर्थ सी थी ‌। दिव्या सुबह नाश्ता और दिन का खाना बनाकर ऐसे बर्तनों में रख कर जाती थी कि जब खाने का मन होता सावित्री ओवन में गरम कर लेती ‌।
दिव्या :" मां तुमने बताया नहीं हमारे सामने वाले फ्लेट में लोग रहने आ गये है और अंशु से तुम्हारी दोस्ती हो गई है।"

सावित्री :" क्या बताती कुछ जानती नहीं उन लोगों के बारे में, स्कूल से आने के बाद यह लड़का थोड़ी देर के लिए आ जाता है।अभी इसके दोस्त नहीं बनें है ।"
सावित्री उठकर अंदर जाने लगी तो दिव्या ने हाथ पकड़ कर बैठाते हुए कहा," क्या बात है मां दिन भर की छोटी-छोटी बातें बताती हो , अंशु के बारे में एक वाक्य भी नहीं बोला। ऐसा तो नहीं तुम मेरे सामने प्रसन्न होते हुए गिल्टी फील करती हो।भाई से भी फोन पर तब बात करती हो जब मैं आफिस चली जाती हूं। पूछती हूं उनके बारे में तो कहती हो कईं दिन से बात नहीं हुई।"

सावित्री की आंखों में परेशानी झलक रही थी ,वह इस तरह की बातों से स्वयं को  असहज महसूस कर रही थी।वह पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से बोली :" क्या फालतू बकवास कर रही है?"

दिव्या :" नहीं मां मुझे लगता है मैं सही कह रही हूं। मेरी शादी न होने का कारण तुम अपने आप को मानती हो , तुमको लगता है मैं कुंवारी हूं इसलिए बहुत दुखी हूं और तुम को भी खुश होने का कोई अधिकार नहीं है।"

सावित्री एक लम्बी सांस छोड़ते हुए बोली :" तू सही कह रही है हमारे कारण ही तेरा विवाह नहीं हुआ अभी तक। तू इतनी सुन्दर है , इतनी अच्छी नौकरी कर रही हैं , तेरे लिए रिश्तो की लाइन लगी थी। लेकिन यह सुनते ही लड़की के माता-पिता भी दहेज में मिलेंगे ,सब पीछे हट गए। हमारे समाज ने इतनी उन्नति नहीं की है अभी की लड़के वाले लड़की के साथ साथ उसके मां-बाप की जिम्मेदारी भी अपने सिर पर ओढ़े।"

दिव्या :" जिम्मेदारी की बात कहां से उठती है मां, मैं अपने पति पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं रहुंगी। जैसे लड़की अपने पति की उसकी पारिवारिक स्थिति के अनुसार सहयोग देती है वैसे ही सहयोग की अपने लिए उम्मीद करना क्या ग़लत है? तुमने मेरे और भाई की परवरिश में कोई भेदभाव नहीं किया , हमें एक जैसा प्यार दिया।भाई की तरह मेरा भी कर्त्तव्य है तुम्हारी आवश्यकताओं का ध्यान रखना।जिस दिन मेरी जैसी सोच का इंसान मिल जाएगा मैं शादी कर लूंगी।"

सावित्री का दिल इन आदर्शवादी बातों से हल्का नहीं होता था , उसे दिव्या की बढ़ती उम्र के कारण चिंता लगी रहती थी।बेटे को कईं बार कहा भारत में ही नौकरी ढूंढ ले लेकिन इतनी आसानी से मनपसंद नौकरी मिलती कहां है। दुखी मन से उसने भगवान से गुहार लगाई कुछ तो हल निकालो  इस समस्या का।

अगले दिन जब दूध वाला आया सुबह छः बजे तब दिव्या उठी दूध लेने। सामने वाले फ्लेट से तीस बत्तीस साल का बहुत ही हेंडसम बन्दा निकला ,बाल बिखरे हुए थे आंखें खुल नहीं रही थी इस कदर नींद में था। पड़ोसी धर्म निभाते हुए दिव्या ने कहा ' हाय । दिव्या की तरफ देखते हुए , पता नहीं इतनी कम खुली आंखों से उसे कितना दिखा ,वह बोला ," अच्छा तुम हो जो उन बुड्ढा बुढ्..... आई मीन अंकल आंटी की देखभाल करती हो।"

दिव्या उसका यह वाक्य सुनकर सकते में आ गई और वह उत्तर की प्रतीक्षा करें बिना दरवाजा बन्द कर अंदर चला गया।

ऐसी स्थिति में उसके दिमाग और दिल में जंग छिड़ जाती है और उसकी देह बुत बनी दोनों की बहस सुनती है।
दिमाग :" देखा कितना बदतमीज है ,देखने में थोड़ा सही है तो पापा मम्मी को बुड्ढा बुड्ढी कहकर चला गया। घमंडी कहीं का।"

दिल :" हाय कितना हेंडसम बन्दा है ,एक गलती तो माफ़ की जा सकती हैं बेचारे की । नींद में था ज़बान फिसल गई होंगी , बाद में अंकल आंटी बोला न ।"

दिमाग :" नहीं नहीं ऐसे लोगों से बात नहीं करनी चाहिए , ब्लैक लिस्ट में डाल देना चाहिए। न जाने क्या समझते हैं अपने आप को।"

दिल :" नहीं उसको एक मौका और मिलना चाहिए ।"

ऐसे अवसरों पर उसके दिल की ही चलती थी वह दिल की ही ज्यादा सुनतीं थी।

एक हफ्ते से सफाई करने वाली नहीं आईं थीं , दिव्या ने सोचा डस्टिंग और सफाई करनी चाहिए। एक घंटे से वह सफाई करने में लगी थी , इतनी धूल मिट्टी हो गई थी एक हफ्ते में ,वह स्वयं धूल से भर गई थी। तभी घंटी की आवाज़ आई, वह झुंझलाती हुई खोलने गई ' कोई काम आराम से नहीं करने देते' । सामने अंशु और वह हेंडसम बन्दा खड़े थे। अंशु दरवाजा खुलते ही अंदर भागा " मैं दादी को बता कर आता हूं।" वह बन्दा :" यह चाबी आंटी को देदेना ,एक टेबल आने वाली है ,बस दरवाजा खोलना है ,रख वे लोग देंगे। और अगर तुम्हारे पास नौ बजे से पहले का समय हो तो इस सामने वाले फ्लेट की सफाई भी कर दिया करो।" अब दिव्या का दिल और दिमाग क्या अंग अंग गुस्से से फड़कने लगा। किसी से बात करने से पहले पता  तो कर लेना चाहिए सामने वाला कौन है। दिव्या ने उसे ऐसे घूर कर देखा अभी उसकी आंखों से ज्वाला बरसेगी और वह बन्दा ध्वस्त हो जाएगा।

इतने में अंशु आया दौड़ता हुआ " चलो न पापा जल्दी करो ।" और हाथ खींचते हुए उस बन्दे को ले गया।
पापा शब्द सुनकर दिव्या की देह शिथिल पड़ गई ,तो यह अंशु के पिता रोहित गोयल है । सुबह ही नेम प्लेट पर नाम पढ़ा था ,यह तो शादी शुदा है और इसका एक बच्चा भी है । अब तो इसको ब्लैक लिस्ट में डालना ही पड़ेगा, इसके बारे में सोचना भी पाप है। वह खामोश सी नहाने चली गई , शीशे में जब अपना चेहरा देखा तो लगा रोहित की कोई गलती नहीं थी ।

समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था , दिव्या का अंशु से शनिवार और रविवार को मिलना हो जाता था ।उसी ने बताया वह अब स्कूल  से सीधे पांच छः घंटे के लिए डे बोर्डिंग में जाने लगा है , वहां टीचर उसका गृहकार्य कराते हैं और खानें का भी ध्यान रखते हैं। शाम को उनकी बस उसको सोसायटी के गेट पर छोड़ जाती है ।एक दिन शाम को जब दिव्या आफिस से लौट रही थी तब उसने देखा अंशु की गेट के पास किसी लडके से लड़ाई हो रही थी।उस लड़के ने अंशु को जोर से धक्का दिया और भाग गया। दिव्या ने इशारे से अंशु को बुलाया और गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए उसे बैठने के लिए कहा ।वह बिल्कुल खामोश रहा , दिव्या समझ गई वह अपनी रुलाई रोक रहा था। फ्लेट आते ही वह उतर गया और दिव्या गाड़ी खड़ी करने आगे चली गई। जब वह फ्लेट पर पहुंची तो देखा अंशु के हाथ कांप रहे थे , चाबी उससे अभी तक लगी नहीं थी। उसने अंशु से चाबी ली , दरवाजा खोला और अंशु के साथ अंदर आ गई।

अंशु :" दी आप जाओ मैं ठीक हूं।"

दिव्या :" पहले तुम्हारे घाव साफ कर दूं फिर दवाई लगा देती हूं।"

दिव्या ने बाथरूम में रखे दवाइयों के डिब्बे में से आवश्यक समान निकाला ,उसका घाव साफ कर दवाई लगा दी। फिर प्यार से उसे अपनी गोदी में खींचते हुए बोली :" तुम बहुत बहादुर हो , लेकिन एक दोस्त दूसरे दोस्त के सामने अगर रोता है तो इसमें कोई  शर्म नहीं है।"

बस अंशु का तो आंसुओं का बांध टूट गया ,वह दिव्या के कंधे से लग कर फफक-फफक कर बहुत देर तक रोता रहा। रोते-रोते उसके मुंह से एक दो बार मम्मी शब्द भी निकला।

दिव्या का मन बड़ा दुखी हुआ, कैसी मां है पता नहीं कहां चली गई इतने छोटे बच्चे को छोड़ कर। थोड़ी देर बाद अंशु को चुप कराने के उद्देश्य से बोली :" छोड़ न कब तक रोएगा , तुझे पता है न कौन है वह लड़का , मैं कल उसे अच्छी डांट लगाऊंगी। फिर भी नहीं माना तो उसकी शिकायत उसके मम्मी-पापा से करेंगे।"

अंशु :" नहीं दी मैं उसको डांट नहीं पडवाना चाहता हूं, मैं साहिल से दोस्ती करना चाहता हूं।वह भी मेरी तरह अकेला है , जैसे मेरी मम्मी भगवान के पास चली गई वैसे उसके पापा। मेरे एक दोस्त ने बताया था सब बच्चे उसकी हंसी उड़ाते हैं क्योंकि उसके पास महंगे वाले बैट बाल और फुटबॉल नहीं होते हैं। मैं तो उससे दोस्ती करने आगे बढ़ा था लेकिन उसने पता नहीं क्या समझ कर मुझे मारा और धक्का दिया।"

इतने छोटे बच्चे की बात सुनकर दिव्या का कलेजा धक रह गया। अंशु की मां अब इस दुनिया में नहीं है और वह अपनी उम्र के हिसाब से बहुत मैच्योर हो गया है।

दिव्या :" ठीक है हम कल कुछ चाकलेट लेकर चलेंगे साहिल के घर दोस्ती करने।"

रोहित जब घर आया तो अंशु को आराम से टीवी के सामने बैठा देख कर वह उसे प्यार करने लगा लेकिन पैरों पर खरोंच देखकर घबरा गया। अंशु ने बताया कि वह रास्ते में गिर गया था और दिव्या ने दवा लगा दी थी। रोहित का मन दिव्या के प्रति कृतज्ञता से भर गया। उसने कईं बार दिव्या को सीढ़ियां उतरते चढ़ते देखा था, दिखने में तो सीधी सरल ,भली सी लड़की लगी थी लेकिन एक दो बार सामने पड़ी तो मुंह बिचकाकर अनदेखा कर दिया। उसकी समझ नहीं आया कि उसकी क्या दुश्मनी है उससे जबकि अंशु उसकी तारीफ करता नहीं थकता। रोहित की समझ में यह तो आ गया था कि उससे उस दिन दिव्या को पहचानने में गलती हो गई थी लेकिन इसके लिए इतना मुंह फुलाने वाली कोई बात नहीं थी। उसे वह कुछ नकचढी सी लगी। लेकिन अंशु का वह इतना ध्यान रखती है और उसके इतने काम करती है कि उसने सोचा किसी दिन मिल कर उससे माफी मांगकर धन्यवाद दे देना चाहिए।

अगले दिन आफिस से लौटते समय दिव्या ने कुछ चाकलेट खरीद ली और अंशु के साथ साहिल के घर गई। साहिल दोनों को देख कर घबरा गया और अंदर कमरे की ओर जाने लगा। तभी उसकी मम्मी रसोई से बाहर आई और इन दोनों को देख कर बोली " लगता है फिर साहिल ने कोई शैतानी की है।"

दिव्या :" नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, अंशु नया आया है इस सोसायटी में तो इसका कोई दोस्त नहीं है इसलिए साहिल से दोस्ती करना चाहता है।" साहिल का चेहरा खिल उठा, उसने आगे बढ़कर अंशु से हाथ मिलाया और दोनों मिलकर चाकलेट खाने लगे। उसकी मम्मी दिव्या को बैठाती हुए बोली :" इसका कोई दोस्त नहीं है इसलिए बहुत चिड़चिड़ा रहता है।अब अंशु से दोस्ती हो जाएगी तो यह भी बाहर खेलने जाएगा ।" और न जाने अपनी कितनी परेशानियां उसने दिव्या से  डिसकस कर ली ‌। दिव्या के पास उनका कोई हल तो नहीं था लेकिन साहिल की मम्मी का मन हल्का हो गया।

लौटे तो बहुत देर हो गई थी , रोहित दरवाजे पर खड़ा इंतजार कर रहा था। दिव्या को लगा अब वह दोनों पर चिल्लाएंगे इतनी देर करने के लिए। लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया , वह बड़ी नम्रता से बोला :" आप जो अंशु के लिए इतना करती है उसका ध्यान रखती है , मैं उसका आभारी हूं।उस दिन जो गलतफहमी के कारण मैं आपको पहचान नहीं सका उसके लिए माफी चाहता हूं।"

दिव्या तो बस उसके इतना बोलते ही पिघल गईं।उसका दिल प्रफुल्लित हो गया " देखा मैं तो पहले से ही जानता था कितना नेक और सलीके दार बन्दा है । उसकी आंखों में देखो कितने प्यार से माफी मांग रहा है ‌।"
दिमाग :" रहने दो अपने बच्चे की मदद करने के लिए आभारी होंने का नाटक कर रहा है। ज्यादा बात करने की आवश्यकता नहीं है।"

दिल :" चाहे कुछ भी हो जाए उसे ब्लैक लिस्ट से तो हटाना पड़ेगा।"

रोहित सोच रहा था अजीब लड़की है कैसे बुत बनी खड़ी है पता नहीं कुछ सुना भी की नहीं। उसने दिव्या का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपना गले को खखारा । दिव्या एकदम चौंकती हुईं बोली ," हां हां कोई बात नहीं , मैं और अंशु दोस्त हैं इसलिए आभार वाली कोई बात नहीं है। चलिए आज से हम भी एक दूसरे से परिचित हो गए ।" कहकर दिव्या ने अपना हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया । रोहित ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थाम लिया। दिव्या को लगा जैसे एक गर्माहट सारे शरीर में फ़ैल गई है और रोहित को भी इस स्पर्श से सुकून का अहसास हुआ।समय जैसे थम गया हो , दोनों का मन नहीं हुआ एक दूसरे का हाथ छोड़ने का । अंशु ने रोहित का दूसरा हाथ हिलाते हुए कहा " चलों न पापा अंदर चलते हैं।"

दिव्या का दिल तो जैसे उस एक पल को पकड़ कर बैठ गया और दिमाग एकदम खामोश। दो तीन दिन सपने की तरह कहां बीत गए पता ही नहीं चला। शनिवार की सुबह अंशु आ धमका , " दी मैं और पापा एक फिल्म देखने जा रहें हैं ,आप भी चलो हमारे साथ।" दिव्या चौंक गईं :" नहीं नहीं ऐसा कैसे हो सकता है।"

तभी रोहित आ गया ," क्यों नहीं हो सकता ,अब हम परिचित है एक फिल्म तो साथ देख ही सकते हैं। वैसे भी आप अंशु के लिए इतना कुछ करतीं रहती है , फिल्म एक बहाना है धन्यवाद करने का।"

सावित्री भी पीछे पड़ गई," जा दिव्या , हमारे कारण तू कहीं आती जाती नहीं ,जा बेटा बहुत समय से तूने कोई फिल्म देखी भी नहीं है।"

दिव्या को बहुत आनंद आया, फिल्म तो अच्छी थी ही , अंशु और रोहित की कंपनी और भी मजेदार थी । फिल्म के बाद खाना खाते हुए इधर उधर की बातें और हंसी मज़ाक से माहोल बहुत सुखद लग रहा था। दिव्या को रोहित के प्रति आकर्षण महसूस हो रहा था ‌ दिल कुछ मीठे-मीठे सपने बुनना चाह रहा था लेकिन दिमाग ने सतर्कता बरतते हुए अभी इजाजत नहीं दी। उधर रोहित को भी लगा दिव्या के साथ समय का पता ही नहीं चला कैसे बीत गया। अंशु दिव्या के साथ कितनी सहजता के साथ रहता है , ऐसे में दिव्या के साथ भविष्य कितना आनंदित हो सकता है।

आते जाते दोनों का एक दूसरे से सामान हो जाता और दोनों खड़े खड़े ही दस पंद्रह मिनट बातें कर लेते। बातें करके दोनों को बहुत अच्छा लगता ,अब तो एक दो दिन नहीं मिलते तो बैचेनी सी महसूस होती। एक दिन शनिवार को दिव्या सुबह टहलने के लिए नीचे उतरी तो अंशु को पार्क में बेंच पर गुमसुम बैठा देखा ।न जाने अब इसके दिमाग में क्या पक रहा है सोचते हुए वह उसके निकट बैठ गई। प्यार से उसके बालों को सहलाते हुए वह बोली :" कुछ परेशानी है क्या?"

बड़ों की तरह ठंडी आह भरते हुए अंशु बोला :" मेरे नाना नानी आएं हैं ,वे मेरी मासी को मेरी नई  मम्मी बनाना चाहते हैं ‌"

सुनकर दिव्या का दिल बैठ गया फिर भी संभलते हुए बोली :" तो इसमें बुराई क्या है  , तुम अभी इतने छोटे हो तुम्हें देखभाल के लिए मम्मी की आवश्यकता तो है ही।"

अंशु :" मुझे तान्या मासी अच्छी नहीं लगती है।वे बस पापा से बात करती है, मुझे बार बार अंदर जाने को कहती हैं। पापा भी उनसे हंस कर बातें करते हैं ,तब मैं बहुत अकेला हो जाता हूं ,मेरा रोने का मन करता है।"

अंशु की आवाज बहुत धीरे होती जा रही थी उसकी बात सुनने के दिव्या को अपना कान उसके मुंह के पास ले जाना पड़ा। धीरे से उसके सिर को अपने कंधे पर टिकाते हुए दिव्या ने कहा " तुम क्या चाहते हो तुम्हारे पापा दुसरी शादी न करें? वे भी तो कितना अकेला फील करते होंगे , उन्हें भी कोई दोस्त चाहिए अपनी बात शेयर करने के लिए।"

अंशु :" दी आप क्यों नहीं मेरी मम्मी बन जाती। कितना अच्छा रहेगा दादा दादी भी हमारे साथ रहेंगे ,हमारा कितना बड़ा परिवार हो जाएगा।जब भी कहीं से आओ घर में कोई न कोई अवश्य मिलेगा । कईं बार घर आता हूं बिल्कुल अंधेरा होता है ,लाईट खोलते हुए भी डर लगता है। फिर थका हुआ अकेला एक जगह बैठ जाता हूं ,कईं बार मन भी नहीं करता घर आने का ।"

दिव्या उसकी बात समझ रही थी , फिर भी बच्चें से क्या बोले और रोहित के मन में क्या है क्या मालूम। अब अगर तान्या रोहित को पसन्द है ,वह उसके साथ हंस हंस कर बातें करता है तो वहीं उसकी जीवनसाथी बनेंगी।
दिव्या :" वो तो ठीक है बेटा पर तुम्हारे पापा को भी तो अपनी पसंद का दोस्त बनाने का चांस मिलना चाहिए। वे जिस किसी को तुम्हारी मम्मी बनाएंगे तुम्हें उनके साथ रहते-रहते अच्छा लगने लगेगा। धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा।"

कहकर दिव्या उठी और टहलने चली गई। जब आईं थीं तो मौसम कितना सुहावना लग रहा था , इतनी उत्साहित थी दिन भर क्या करना है कहां जाना है, अब दिल बोझिल हो रहा था। कुछ अच्छा नहीं लग रहा था ,एक चक्कर पार्क का लगाकर घर वापस आ गई और अपने कमरे में जाकर लेट गई। उधर रोहित खिड़की से बाहर झांक रहा था दिव्या दिख जाएं तो कुछ बात कर लें। बिना उद्देश्य के उसके घर जाना या फोन करने में उसे कुछ संकोच हो रहा था। उसके सास-ससुर का दबाव तान्या को लेकर बढ़ता जा रहा था। तान्या उसकी पत्नी मोना की चचेरी बहन है । अंशु के जन्म के बाद से मोना बहुत बीमार रहने लगी थी तब उसके सास-ससुर ने सहारा दिया था अंशु की परवरिश में और मोना की बीमारी में। रोहित को मोना की परेशानी कभी समझ नहीं आईं ,वह शादी के बाद से बहुत उदासीन सी रहती थी , बहुत कम बोलती ,दूर दूर रहती।

रोहित ने मोना के मन की बात जानने की बहुत कोशिश की लेकिन उसने कभी बताया नहीं बस रोने लग जाती। रोहित ने अच्छे पति का धर्म निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी , लेकिन अंशु के जन्म के बाद वह डिप्रेशन में चली गई। अब तो वह बहुत कम खाती-पीती बस चुपचाप पड़ी रहती, अंशु से कुछ लगाव रखती थी। रोहित कहां-कहां नहीं ले गया इलाज के लिए , कोई फायदा नहीं हुआ। आखिर एक दिन उसने आत्महत्या कर ली और उसकी जिंदगी से चली गई। उसके स्वयं के माता-पिता तो रहे नहीं थे इसलिए सास ससुर को बड़ा मानकर बहुत इज्जत करता था। वे भी अपने और दो बच्चों के पास कम शुरू से ही रोहित के पास अधिक रहते थे जबकि उनका घर भी पास में ही था ।मोना की मृत्यु के कुछ समय पश्चात ससुर जी  अपने छोटे भाई की बेटी तान्या को रोहित के घर लाने लगे।

एक दिन उसे बातों बातों में पता चला कि मोना शादी के पहले से ही डिप्रेशन की शिकार थी और दवाई लेती थी।वह किसी लडके को स्कूल के समय से चाहती थी लेकिन उसकी शादी जबरदस्ती रोहित से कर दी । उसने अपने माता-पिता को न तो क्षमा किया   न रोहित को अपनाया । यह सब जानने के बाद रोहित का अपने सास ससुर से मन उखड़ गया, यह बात पहले बता देते तो वह शायद स्थिती को संभाल लेता ,इस तरह इतने लोग परेशान नहीं होते। उनसे कुछ नहीं बोला लेकिन अपना तबादला कम्पनी के दूसरे शहर में स्थित आफिस में करवाया और इस शहर में आ गया।

उसके सास-ससुर यहां भी आ गए और इस बार तान्या से विवाह करने के लिए बहुत दबाव डाल रहे हैं।वह पहले भी इस प्रस्ताव को टालता रहा था उसे लगता तन्या में अभी बचपना है ।वह अंशु की उचित देखभाल नहीं कर पाएगी और शादी को लेकर उसके जो अरमान है वह उन्हें पूरा करने में असमर्थ रहेगा। शादी के बाद उसे कोई सुख नहीं मिल था और अब वह ऐसा समझदार  जीवन साथी चाहता था जो उसकी परेशानियों को समझते हुए उसका जीवन आसान बना दे।

दिव्या में उसे यह बात नज़र आती है इसलिए वह सुबह से उसके दिल की बात जानने की कोशिश कर रहा था। लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी कहीं शादी शुदा एक बच्चे के बाप से शादी की बात सुनकर वह भड़क न जाए।उसे निर्णय जल्दी लेना होगा ,शाम को तान्या अपने माता-पिता के साथ आने वाली है । आज अंशु पड़ोस में नहीं जा रहा अपने कमरे में अनमना सा पड़ा है। शाम को रोहित को दरवाजे के पास कुछ हलचल लगी तो उसने दरवाजा खोला , तान्या आने वाली होगी। सामने एक नौजवान दिव्या के घर की घंटी दबा रहा था और तभी दिव्या ने दरवाजा खोल दिया। रोहित की आंखें खुली की खुली रह गई, दिव्या पारम्परिक साड़ी में सजी-धजी बहुत सुंदर लग रही थी।वह नौजवान उसको देखते ही बोला :" चल जल्दी कर सब नीचे तेरा इंतज़ार कर रहे हैं, गहनों की चलती-फिरती दुकान लग रही है।"

दिव्या :" एक लगाऊंगी , तारीफ तो ढंग से कर दिया कर।" वह नौजवान नीचे भाग गया और दिव्या की नजरें रोहित से टकराईं तो वह मुस्कुराते हुए बोली :" मेरी एक सहेली की शादी है सब मिलकर वहीं जा रहें हैं।" रोहित ने हां में सर हिला दिया उसके दिल में टीस उठ रही थी। कहीं दिव्या  उस नौजवान से प्रेम तो नहीं करतीं।
दिव्या समारोह में जाने के लिए सजी तो बहुत थी लेकिन मन प्रसन्न नहीं था। सीढ़ियां उतरी तो देखा उससे तीन चार साल छोटी एक खुबसूरत लड़की ऊपर जा रही थी।

पीछे चल रहे बुजुर्ग दंपति में से औरत ने आवाज़ दी," तान्या ध्यान से बेटा इतनी हील्स वाली चप्पलें पहन रखी है कहीं पैर मुड़ न जाए।" दिव्या ने ध्यान से देखा ,तो यह तान्या है ,स्कर्ट टॉप हाई हील्स खुले सिल्की बाल ,बेहद हसीन।भला तान्या को छोड़कर रोहित उसकी तरफ क्यों देखेगा, वैसे भी इस समय उसे लग रहा था तान्या के सामने वह अम्मा लग रही है। चुप चाप दोस्तो के साथ गाड़ी में जाकर बैठ गई।

शादी के समारोह में उसे ज़रा सा भी आनंद नहीं आ रहा था , बार-बार तान्या का चेहरा आंखों के सामने घूम रहा था। उधर रोहित ने  तान्या और उसके माता-पिता का स्वागत किया और सब बैठ कर बातें करने लगे। थोड़ी देर बाद चारों बुजुर्ग अंशु को लेकर दूसरे कमरे में चलें गये, रोहित और तान्या अकेले में बात कर  सकें। रोहित तान्या से पहले भी कई बार मिल चुका था इसलिए उसके पास बात करने के लिए कुछ नहीं था ।उसका मन भटक रहा था , दिव्या का रुप उसके दिलो-दिमाग पर छाया था।

लेकिन तान्या जब से शादी की बात चली थी बहुत उत्साहित थी। वह ऐसे बात कर रही थी मानो शादी पक्की हो गई थी।

तान्या :" रोहित जी शादी के बाद हम पन्द्रह दिन के लिए विदेश चलेंगे। इस समय मौसम भी बहुत सुहाना होता है वहां। "

रोहित :" पन्द्रह दिन तो बहुत होते हैं अंशु कहां रहेगा इतने दिन । इस समय इतनी छुट्टियां लेना मुश्किल है उसके लिए भी और मेरे लिए भी।"

तान्या :" अंशु को ताऊजी और ताईंजी संभाल लेंगे, पहले भी तो ध्यान रखते थे वे उसका । वैसे भी मुझे तो बच्चो की देखभाल करनी आती नहीं ,हम उसे उन्हीं के साथ भेज देंगे।"

रोहित को सुनकर अच्छा नहीं लगा  ,यह विवाह तीन लोगों की जिंदगी बर्बाद कर देगा ।उसे समझ आ गया दिव्या से विवाह हो या न हो लेकिन तान्या से विवाह करना बहुत ग़लत निर्णय होगा । उसने जब अपनी बात सबके सामने कहीं तो वे चारों बहुत क्रोधित हुए और तुरंत पैर पटकते हुए चले गए। तान्या  रोने लगी , लेकिन रोहित को लगा उसने ठीक निर्णय लिया है।

रात के बारह बज गए थे दिव्या आई नहीं थी अभी तक, रोहित बैचेन सा अपनी बालकनी में खड़ा देख रहा था। वह अपने मन को समझा रहा था कि उसे केवल दिव्या की सुरक्षा को लेकर चिंता है वह उसके सकुशल घर में लौटने का इंतजार कर रहा है। जैसे ही नीचे गाड़ी आकर रुकी और उसने देखा दिव्या उतरी ,वह लपक कर अपने घर से बाहर आ गया ‌। वह सीढ़ियां उतर रहा था और दिव्या उसको देखकर आश्चर्य से बोली :" इतनी रात को कहां जा रहे हैं आप?"

रोहित :" वह नींद नहीं आ रही थी सोचा टहलने से शायद कुछ बात बन जाए। वैसे आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो।"

दिव्या :" थैंक्स , और आप को सगाई मुबारक हो।"

रोहित आश्चर्य से :" सगाई ,यह क्या कह रही हो तुम।"

दिव्या :" मैंने तान्या को ऊपर जाते देखा था , बड़ी सुंदर लग रही थी। अच्छा मैं चलती हूं देर हो रही है।" उसे लगा वह और कुछ देर खड़ी रही तो रोना शुरू कर देंगी।

रोहित :" दो मिनट मेरी बात सुन लो बस , तान्या से मेरी कोई सगाई नहीं हुई है ‌। मैं तुमसे पूछना चाहता हूं कि अगर तुम्हारी जिंदगी में कोई और नहीं है और तुम को मैं पसंद हूं तो मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं।" रोहित को इतनी आवश्यक बात इस तरह सीढ़ियों पर खड़े होकर,रात के बारह बजे करना कुछ अटपटा सा लग रहा था लेकिन उसने नहीं की तो उसे लग रहा था वह रात भर सो नहीं पाएगा।

रोहित की बात सुनकर दिव्या के दिल और दिमाग सजग हो गए ,बस भिड़ गए दोनों।

दिल :" मैं तो पहले से ही कहता था इसे मुहब्बत हो गई है इसकी आंखों में चाहत साफ दिखाई देती थी।"

दिमाग :" रहने दो झूठ मत बोलो ,दो दिन से बीमारों जैसा हाल बना रखा था ठीक से अपना काम नहीं कर रहे थे सारा शरीर शिथिल हो गया था।"

दिल :" ठीक है अब तो दुगुनी तेजी से काम कर रहा हूं देखा कितनी जोर जोर से धड़क रहा हूं।"

रोहित  ‌घबरा गया,यह दिव्या ऐसी बुत क्यों बन गई , उसकी बात सुनकर उसे सदमा तो नहीं लग गया। वैसे भी पता नहीं इसको बीच बीच में क्या हो जाता है , बोलते बोलते अचानक किसी और ही दुनिया में पहुंच जाती है। उसने दिव्या दिव्या कहकर आवाज लगाई तो जैसे वह होश में आई ‌

रोहित :" तुम परेशान मत हो थक गई होगी।हम कल आराम से इस विषय में बात कर लेंगे।"

दिव्या :" नहीं ऐसी कोई बात नहीं है , मैं भी आपको बहुत पसंद करती हूं।वो तो मुझे विश्वास नहीं हो रहा आप तान्या से शादी नहीं कर रहे।"

रोहित ने दिव्या को अपनी बाहों में खींचते हुए कहा " यह तान्या  तान्या मत करो , बहुत रात हो गई है। आगे की बात हम कल कर लेंगे, कहीं तुम्हारे पापा मम्मी ने आ जाएं तुम्हें ढूंढते हुए।"

दिव्या रोहित के सीने से लगे हुए बोली:" यह तो पता है न दहेज़ में मेरे मम्मी पापा भी आएंगे।" रोहित हंसते हुए :" मुझे इस दहेज से कोई आपत्ती नही है , वैसे दहेज तो मैं भी ला रहा हूं मेरा पुत्र।"

दोनों बेमन से अलग हुए और अपने अपने फ्लेट में चले गए। ‌दिव्या को पता था नींद आएगी नहीं लेकिन चित्त शांत था। आज दिल और दिमाग खामोश थे दोनों में कोई बहस नहीं थी , मन का मीत जो मिल गया था।

लेखक - अज्ञात

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