जब तूने कुछ ग़लत किया ही नहीं तो क्यों परेशान हो रही हैं..

ईशा आफिस में अपनी टेबल पर बैठी काम कर रही थी तभी उसकी नज़र सामने से आते अपने मंगेतर समर पर पड़ी। उसके मन में विचार आया,' हे भगवान इस समय नहीं , अभी इससे बात करने का बिल्कुल मन नहीं हैं।ऐसे टहलता हुआ आ रहा है मानो कम्पनी बाग में घूम रहा हो, कोई बाग न सही बाप का आफिस तो है । राज है इसका , बाकी सब झुकें पड़े हैं अपनी-अपनी टेबल पर पसीना बहाने में।'


समर ,ईशा की टेबल के सामने पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए बोला," कैसी लग रही है मेरी शर्ट, कल खरीद कर लाया था।सोच रहा हूं बालों का ट्रीटमेंट ले लेता हूं ये जो आगे के थोड़े से बाल उड़ गए हैं आ जाएंगे तो और अधिक स्मार्ट लगने लगूंगा।"

ईशा काम करते करते," हां , जैसा आप ठीक समझें।"

समर : " यार अगले महीने मम्मी का जन्मदिन है उसके लिए कुछ नया सोचना है। इस बार हम दोनों मिलकर कुछ  सरप्राइज देते हैं उनको बहुत खुश होंगी।"

ईशा टालते हुए : " आज तो बहुत काम है कल डिस्कस करते हैं।"

समर उदास होते हुए : " आप के पास समय ही नहीं होता मेरे लिए डैड से कहता हूं आप को कम काम दिया करें।"

ईशा : " नहीं नहीं ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है , मुझे काम करना अच्छा लगता है ।बस इस समय आप जाइए मुझे बहुत जल्दी है।"

समर का मुंह लटक गया उसे चिंता हुई कहीं ईशा नाराज़ न हो जाए उसकी मां को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। ईशा को समझ नहीं आता कि न जाने क्यों वह समर के साथ इतनी बेरुखी से बात कर जाती है।वह बिचारा आप आप करता नहीं थकता और वह उससे दस मिनट आराम से नहीं बोल सकती।समर से बात कर के उसका सिर भारी हो जाता है ,या तो वह अपनी तारीफ करता रहेगा या मां को खुश करने की तरकीबें सोचता रहेगा। ईशा को लगने लगा था समर से सगाई के लिए हां करने में उसने कुछ ज्यादा ही जल्दी कर दीं। क्या करती, मां ने कुछ सोचने समझने का मौका नहीं दिया | रिश्ता आतें ही  अपनी तरफ से तुरंत हां कर दी, उनका पैसा देखकर बस प्रभावित हो गई।

ईशा सामान्य शक्ल सूरत की एक साधारण सी लड़की थी, परन्तु दिमाग बहुत तेज। सीए की पढ़ाई करते करते उसने समर के डैड की फर्म में प्रेक्टिकल ज्ञान बढ़ाने के लिए काम करना शुरू कर दिया था। शहर की सबसे बड़ी फर्म थी और समर का खानदान रईसों में आता था।समर के पिता की नजरों में ईशा ने शीघ्र ही स्थान बना लिया। तीन ग्रुप तो उसने बहुत जल्दी उत्तिर्ण कर लिए थे प्रथम प्रयास में ही।समर ने बी काम किसी तरह  उत्तिर्ण की थी सी ए पास करने की तो वह सपने में भी नहीं सोच सकता था। इसलिए उसके पिता को लगा अगर सीए बहू आ गई तो फर्म का काम यथावत उसके नाम पर चलता रहेगा।वे तुरंत रिश्ता लेकर ईशा के घर पहुंच गए।

लंच ब्रेक हो गया था , ईशा ने आधे दिन की छुट्टी ले ली थी। उसकी बड़ी बहन निशा  का फोन आया था कि ढाई बजे उसका बेटा बिट्टू स्कूल से जब आएगा तो ईशा उसका ध्यान रखने के लिए उसके घर चली जाए। निशा किसी स्कूल में अध्यापिका थी जहां आपातकालीन बैठक बुलाई गई थी जिसके कारण उसे पांच बज जाएंगे स्कूल में । उसका पति प्रमोद आफिस के काम से दूसरे शहर गया हुआ था, अगले दिन आएगा नहीं तो वह संभाल लेता।

ईशा जब निशा के फ्लेट पहुंची तो उसने देखा डेढ़ बजे हैं ।या तो निशा के फ्लेट के ऊपर विवेक रहता है उससे मिल लें या बहन‌ के घर में ही बिट्टू के आने तक आराम कर ले। विवेक से उसकी दोस्ती स्कूल के दिनों से है फिर जब भी निशा के घर आती तो उससे अवश्य मिलती। दोनों घंटों बातें करते समय का पता ही नहीं चलता। ईशा को हैरानी होती कि समर से दस मिनट बात करने के लिए समझ नहीं आता क्या बोलूं क्या न बोलूं। इतना दिमाग पर जोर डालना पड़ता है कि सिर में दर्द हो जाता है , शादी के बाद तो उसे पक्का लगने लगा है कि वह माइग्रेन की मरीज़ हो जाएगी। विवेक से बात करने का मन तो कर रहा था लेकिन कल ही उसने बताया था आजकल बहुत व्यस्त हैं उसे परेशान करने से क्या फायदा।

तीन चार महीनों पहले ईशा ने बातों बातों में विवेक से पूछा था : " बता तो तू कैसी लड़की से शादी करेगा?"

विवेक  : " कैसी से क्या मतलब ,मिस इंडिया या मिस यूनिवर्स जो पट जाएगी उसी से शादी कर लूंगा।"

ईशा : " रहने दें तुझ जैसे बंदर से शादी करने से अच्छा वे कुंवारी मरना पसंद करेंगी, सीरीयस ली बता।"

विवेक : " भविष्य में मैं जब भी शादी करूंगा तुझ जैसी ,तुझ जैसी क्या तुझ से ही शादी कर लूंगा अगर तू मेरा इंतजार करेगी।"

ईशा : " चल पागल कुछ भी बोलता है।"

विवेक : " क्यों इसमें बुराई भी क्या है ,हम दोनों का बौद्धिक और मानसिक स्तर एक जैसा , घण्टों बात कर के भी बोर नहीं होते। शुरू से हमारा आर्थिक स्थिति भी एक जैसी है जितना भी होगा हम आराम से काम चला लेंगे। दोनों इतना तो कमा ही लेंगे की जरूरतें और कुछ शौक पूरे करके कुछ बचत भी कर ले। दिखने में भी हम दोनों एक जैसे सामान्य स्तर के हैं एक-दूसरे पर कभी शक भी नहीं करेंगे। फिर हम अच्छे दोस्त हैं , विवाह की नींव दोस्ती हो तो विश्वास और प्रेम भी जुड़ जाते है और क्या चाहिए रिश्ते की खुशहाली के लिए।"

ईशा :" यार तू तो बहुत बड़ा फिलोस्फर बन गया है बड़ी ऊंची ऊंची बात करता है। लेकिन तुझे देख कर न तो मेरे दिल में कोई घण्टी बजती है न तेरे टच करने से कोई लहर उठती है।"

विवेक  :" अरे बेवकूफ वो तो हम दोनों एक दूसरे को दोस्त की नजरों से देखते हैं इसलिए ऐसा कुछ महसूस नहीं होता ।जिस दिन विवाह के रिश्ते में बंधने के बारे में सोचेंगे तो वैसी फीलिंग भी आ जाएगी। और मैं वादा कर सकता हूं कि मैं तेरा हर स्थिति में साथ दूंगा और बराबर की इज्ज़त दूंगा।"

ईशा :" तू क्या प्रस्ताव रख रहा है मेरे सामने।"

विवेक : " मैं अवश्य रखता लेकिन अभी मुझे अपना लक्ष्य प्राप्त करना है। पढ़ाई पूरी करके मुझे नौकरी ढूंढनी है और जब तक ऐसी नौकरी नहीं मिल जाती कि मैं अपने परिवार का खर्चा उठा सकूं तब तक मैं विवाह की सोच भी नहीं सकता। मैं तुझ से कोई वादा नहीं कर सकता , मुझे नहीं पता कितना समय लगेगा। तू लड़की है तेरे घर वालों को तेरे लिए जल्दी होगी इसलिए मैं तुझे इंतजार कर ने के लिए कहकर तुझे किसी परेशानी में नहीं डालना चाहता।"

इस वार्तालाप के एक महीने के बाद ही ईशा का रिश्ता समर से पक्का हो गया था।

निशा के घर में घुसते ही उसने पानी पीया, इतनी गरमी  लग रही थी , बैचेनी सी हो रही थी। कपड़े भी काट रहे थे, कपड़ों से ध्यान आया उसने आज समर के घर से आया सलवार कमीज़ पहन रखा था। जबरदस्त सलमेसितारो  का काम था  इस कारण बहुत भारी लग रहा था।आज आफिस में एक नये विभाग का उद्घाटन था ,सासू मां का फोन आया था कि नीले रंग का जो सबसे महंगा और काम वाला सूट है वहीं पहन कर आएं। सुबह से उसके चिड़चिड़ेपन का कारण यह सूट भी थे ,उसको आदत नहीं थी इस तरह के कपड़े पहनने की ।वह तो जींस टॉप पहन कर खुश थी फिर चाहे उससे कितना भी काम करवालो। उसने निशा के धुले हुए वस्त्रों में से एक नाईटी निकाल कर पहन ली। पांच हजार के इस सूट से अधिक पांच सौ की नाईटी में आराम मिल रहा था। उसके दिमाग को एक बात और कचोट रही थी कि आखिर समर से शादी कर के उसे क्या मिलेगा ,भारी भारी कपड़े और आभूषणों के अलावा ।जिनका उसे शौक भी नहीं है वह तो इन्हें पहन कर प्रताड़ित ही होती है। वह तो मेहनत करके इमानदारी से ऐसा मुकाम हासिल करना चाहती है जहां उसके दिल को तसल्ली मिलें   कि  उसने अपने जीवन में कुछ सार्थक किया ।

दिमाग में बहुत उधेड़बुन चल रही थी  , ईशा लेटने के लिए बिट्टू के कमरे में गई। यह क्या ,कितना फैला रखा है कमरा ,कब साफ करके लेटने का समय नहीं है ,वह निशा के कमरे में जाकर लेट गई।

उधर प्रमोद का काम एक दिन पहले समाप्त हो गया , टिकट सब की अगले दिन की थी। सबने शहर घूमने का कार्यक्रम बनाया और रात को पीने पिलाने का । प्रमोद एक हफ्ते से बाहर था तो उसे निशा और बिट्टू की याद आ रही थी । काम की मजबूरी में तो रुकता भी लेकिन अब रुकने का उसका बिल्कुल मन नहीं था ।एक टिकट का किसी तरह बंदोबस्त करके वह निकल पड़ा । उसने निशा को फोन नहीं किया , सरप्राइज देने के उद्देश्य से।
वह दो बजे के करीब अपने घर के बाहर खड़ा था , उसने सोचा निशा के आने में अभी समय है कुछ देर लेट लिया जाए।गर्मी बहुत थी वह लाबी के वाशबेसिन में मुंह हाथ धोकर शर्ट उतार कर शयनकक्ष की ओर बढ़ा। वहां निशा को नाईटी में लेटा देखकर उसके अरमान जाग गए वह प्रसन्नता से झूमता पलंग पर चढ़ गया। ईशा करवट लेकर लेटी थी प्रमोद की तरफ उसकी पीठ थी । प्रमोद ने ईशा के कंधे पर पड़े बालों को हटाते हुए वहां चूमा और कमर में हाथ डालते हुए उसे अपनी ओर खींचा।

निशा के स्कूल में जो मीटिंग बुलाई गई थी वह प्रिंसिपल महोदया की तबीयत खराब होने के कारण रद्द करनी पड़ी । निशा को बहुत गुस्सा आया बेकार ईशा की आधे दिन की छुट्टी करवा दी । वह घर जल्दी से रिक्शा करके पहुंची जिससे ईशा आफिस जाकर अपनी छुट्टी रद्द कर दे । समर को लगा पता नहीं ईशा इतनी उखड़ी हुई सी क्यों थी उसे मनाने की कोशिश करनी चाहिए ,वह पक्का अपनी बहन के घर गई होगी। जैसे ही निशा ने अपने घर का दरवाजा खोलने के लिए चाभी लगाई समर वहां पहुंच गया। उसी समय ऊपर के फ्लेट में रहने वाला विवेक भी सीढ़ियां उतर कर कुछ खाने के लिए बाहर जा रहा था। विवेक ने जब निशा को देखा तो नमस्ते करने के लिए रुका तभी अंदर से एक जोर की चीख सुनाई दी। दरवाजा खुल गया था तीनों घबरा कर अंदर की ओर भागे जहां से आवाज आई  थी। पलंग पर ईशा नाईटी में  हक्की-बक्की अपने जीजा को देख रही थी और प्रमोद यह समझते ही की यह ईशा है निशा नहीं सकपकाया सा जमीन की ओर देख रहा था। और तीनों आगंतुक मूक दर्शक बने इन दोनों को देख रहें थे।

सबसे पहले विवेक को होश आया वह कुछ अस्पष्ट सा कहता हुआ बाहर चला गया। प्रमोद झटके से उठ कर शयनकक्ष के बाहर चला गया अपनी शर्ट पहनने जो बाहर पड़ी थी। ईशा तुरंत बाथरूम में घुस गई अपने कपड़े बदलने के लिए। निशा और समर ठगे से ऐसे खड़े रह गए जैसे उनका सब कुछ लुट गया हो।

जैसे ही ईशा बाथरूम से बाहर आई समर उसकी तरफ़ लपका । लेकिन ईशा ' हम बाद में बात करेंगे' कहकर लगभग भागती हुई निशा के घर से बाहर निकल गई।इस समय उसे रोना और क्रोध दोनों महसूस हो रहे थे।उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा ‌ था फिर भी अपनी स्कूटी तक पहुंचीं और आंसू पोंछ कर निकल गई।इस समय वह बिल्कुल शांत जगह पर अकेले  बैठना चाहती थी अपने अंदर उठते भावों को शांत करने के लिए। थोड़ी दूर पर एक पुस्तकालय था जिसकी वह सदस्य थी ,वह अंदर चली गई। पुस्तकालय में बहुत कम लोग बैठे थे वह चुपचाप एक पुस्तक लेकर दूर एक कोने में बैठ गई। अपने सिर को अपने दोनों हाथों पर टिकाकर बहुत देर तक सुबकती रही जब तक मन शांत न हो गया। फिर अपने आप को संभाला , गहरी सांसें भरी और अपने आप को तैयार किया लोगों का सामना करने के लिए। कुर्सी से उठ कर जैसे ही पलटी सामने विवेक बैठा दिखा। ईशा ने आश्चर्य से पूछा " तू यहां क्या कर रहा है?"

विवेक : " तब से तेरे पीछे बैठा था , लगा दोस्त की आवश्यकता पड़ी तो हाजिर हो जाऊंगा। वैसे तो तू पहलवान है तूझे किसी की क्या आवश्यकता।"

ईशा हल्की सी मुस्कान के साथ :" तू भी न बस । पता नहीं कैसे इतनी अजीब सी स्थिति....

विवेक :" तुझे सफाई देने की आवश्यकता नहीं है ।मैं तुझे  और प्रमोद भाई को बहुत अच्छे से जानता हूं ,जो दिख रहा था वह सच हो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता हूं। चल कुछ खाने चलते हैं सुबह से कुछ नहीं खाया।"
विवेक के विश्वास पर ईशा की आंखें एक बार फिर भीग गई। पुस्तकालय से निकल कर दोनों करीब ही एक रेस्टोरेंट था वहां जाकर बैठ गये । कुछ खाने का सामान मंगाया और बिना एक शब्द बोले  खाते रहे।

चलने को खड़े हुए तो ईशा के फोन पर समर का फोन आया। ईशा के हेलो बोलते ही वह अधीरता से बोला :" आप कहां हो ,मैं कब से आपका इंतजार कर रहा हूं।आप जल्दी आइए मैं आपको आपके घर के बाहर खड़ा मिलूंगा।" उसकी बात सुनकर ईशा के चेहरे पर चिंता की रेखाएं उभर आई।

विवेक :" ईशा अपने आप पर भरोसा रख ,जब तूने कुछ ग़लत किया ही नहीं तो क्यों परेशान हो रही हैं। अपनी बात को निडर होकर एक बार समझा अगर सामने वाला नहीं समझता तो उसके बारे में सोचना बंद कर दें।"

ईशा को लगा विवेक सही कह रहा है वह क्यों सब को बार-बार सफाई दे ।उसको जानने वालो को यह मालूम होना चाहिए कि वह ऐसी ओछी हरकत कर ही नहीं सकती। एक आत्मविश्वास के साथ वह अपनी स्कूटी पर सवार होकर अपने घर की ओर चल दीं। समर घर के बाहर अपनी गाड़ी से टिक कर खड़ा था ,वह बहुत बैचेन लग रहा था।

ईशा को देखते ही वह उछल कर उसके पास आया और बिना रुके बोलना शुरु कर दिया।

" आप कहां थी अब तक,कब से इंतजार कर रहा हूं। आपकी बहन अपने बेटे के साथ यहां अपने मायके आ गई और रोते-रोते वहां जो देखा सब आपकी मम्मी को बता दिया, यह भी नहीं देखा कि मेरी मम्मी वहां बैठी है। मेरी मम्मी को यह सब पता नहीं चलता तो अच्छा रहता।" ईशा को मौन खड़ा देखा तो वह आगे बोलने लगा।

" देखिए मेरी मम्मी थोड़े पुराने ख्यालों की है , वे इन बातों को समझ नहीं पाएंगी।वो कुछ उल्टा सीधा बोले तो आप चुप चाप सुन लेना बुरा मत मानना। मेरी बात अलग है आधुनिक विचारों का हूं इस तरह की बातों को नज़रंदाज़ कर सकता हूं । किसी के प्रति आकर्षण महसूस करना स्वभाविक है , वैसे भी मुझे लगता है आपका अपने जीजा जी से लगाव कुछ अधिक है। खैर मैं इन बातों को ग़लत नहीं मानता।, शादी के बाद भी हम अपने पसंदीदा दोस्तों के साथ सम्बंध रख सकते हैं।"

ईशा आश्चर्य से समर की ओर देखते हुए बोली:" यह आप क्या कह रहे हैं। मेरी बात सुनें बिना ही अपने निर्णय ले लिया मैं ग़लत हूं। और अगर आपको लगता है कि मैं इतनी बदचलन हूं कि अपने जीजा जी से मेरे सम्बंध है तो आप मुझ से शादी क्यों कर रहे हो ?"

गर्मी में खड़े खड़े समर का सब्र का बांध टूटता जा रहा था।वह झल्ला कर बोला :" देखो तुम्हारे चरित्र से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम्हें क्यां लगता है तुम जैसी दो टके की लड़की के प्यार या सौंदर्य में पड़कर तुमसे शादी कर रहा हूं। अरे मुझे तो शादी तुम्हारी डिग्री के कारण करनी पड़ रही है।"

ईशा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया :" अरे दो टके का तू होगा ,बाप के पैसे पर गुलछर्रे उड़ा रहा है और आगे भी बीवी की कमाई पर जिंदगी काटना चाहता है।"

अब समय की आंखें लाल हो गई, उसने ईशा के कंधों को दोनों हाथों से ज़ोर से पकड़ कर दबाते हुए कहा :" अहसान मान इतने रईस खानदान में शादी हो रही है , पहनने ओढ़ने की अक्ल नहीं है। इतने महंगे कपड़े और अंगुठी तो सपने में भी नहीं देखी होंगी।"

ईशा से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था, उसने अंगुठी निकाल कर समर के हाथ में दे दी। फिर बोली:" ले रख लें अपनी अंगुठी, ढूंढ लियो कोई ऐसी लड़की जो तुझे पालने के लिए तैयार हो ।"

समर और ईशा के झगडे की आवाजें सुनकर निशा उसकी मम्मी और समर की मम्मी बाहर आ गए। ईशा के पापा इन सब बातों से बेखबर अपने आफिस में  काम कर रहे थे। अपनी मां को देख समर को अहसास हुआ स्थिती गलत दिशा में बढ़ रही है।वह एकदम पलटते हुए बोला :" नहीं नहीं ईशा , आपको गलतफहमी हो गई है, मैं तो मज़ाक कर रहा था।" समर की मम्मी अनीता ने जब ईशा का तमतमाया हुआ चेहरा देखा तो बोली :"  क्या बात है बेटा कोई गलतफहमी हो गई है तो अंदर बैठ कर सुलझा लेते हैं।"

ईशा :" नहीं आंटी जी गलतफहमी दूर हो गई है। मेरे जैसी दो टके की लड़की आपके परिवार के लिए बिल्कुल ठीक नहीं रहेगी इसलिए मैं ने यह अंगूठी समर को वापस कर दी।"

अनीता को विश्वास नहीं हुआ , कोई लड़की इतनी बेवकूफ कैसे हो सकती है जो इतनी दौलत ठुकरा दे।वह बोली :" तुम अकड़ किस बात की दिखा रही हो , एक तो रंगे हाथों पकड़ी गई ऊपर से सीना जोरी कर रही हो । आंखों से जो देखा वही सच माना जाता है । हम अनदेखा करने को तैयार हैं लेकिन तुम्हें कोई शर्म लिहाज नहीं है। मैं ने समर के डैड से पहले ही कहा था ऐसे लोग इतनी दौलत देखकर पागल हो जाते हैं लेकिन मेरी सुनते कब है। चल बेटा यहां खड़े होकर और अपमान कराने से कोई लाभ नहीं। सात जन्मों में भी हमारी जैसी हैसियत प्राप्त नहीं कर सकोगी। जब होश में आओ तो आ जाना हम शायद सब भुला दे। "

और वह अपने बेटे का हाथ पकड़ कर दनदनाती हुई चली गई।

ईशा निशा और उनकी मां घर के अंदर चले गए। मां:" मुझे नहीं पता था इतने नीच होंगे ये लोग । मुझे माफ़ कर दे बेटा , जल्दबाजी में रिश्ता पक्का कर दिया।"

निशा रोते हुए बोली," मुझे भी माफ कर दे मेरे कारण तेरा रिश्ता टूट गया। मैं बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती हूं।"

ईशा :" रिश्ता टूटने से तू परेशान मत हो , मुझे ऐसे लोगों से रिश्ता रखना भी नहीं जो बिना पक्ष सुने दूसरे को दोषी मान लेते हो। पैसे का इतना घमंड, समझते क्या है अपने आप को, अपने पुरुषार्थ से जो कमाऊंगी उसे हक से खर्च करूंगी।हां अपने व्यवहार को तुझे बदलना चाहिए ,एक दम हाईपर होकर कुछ भी कहीं भी बोलना शुरु कर देती है। अपने आप पर इतना नियंत्रण तो रख स्थिति समझकर काम करें। जीजा जी से पैसों के कारण लड़ती रहती है , तुम दोनों की जितनी आमदनी हैं वह तुम्हारे परिवार के लिए बहुत है । उसमें खुश रहने की कोशिश क्यों नहीं करती । जीजा जी तुझे इतना चाहते हैं और मेरे लिए वे बड़े भाई के समान है फिर तू ने ऐसी गलत बात सोच भी कैसे ली। दीदी तू जो नहीं है उसके चक्कर में जो है उसका भी आनन्द नहीं ले रही हैं।"

निशा कुछ कहती उसके पहले ही प्रमोद अंदर आ गया।शर्म के कारण वह आंखें नहीं मिला पा रहा था । वह बोला :" मुझे माफ़ कर दो आप सब , मुझे नहीं मालूम अचानक यह सब ऐसे कैसे हो गया।"

ईशा :" नहीं जीजा जी कुछ घटनाओं पर हमारा बस नहीं चलता वे बस घट जाती है। आज के बाद आप इस बारे में न  कुछ बोलोगे न सोचोगे । आप मेरे लिए पहले भी आदरणीय थे और आगे भी ऐसे ही रहोगे।"

निशा: "माफी तो मुझे माँगनी चाहिए, मैंने समझदारी से काम नहीं लिया। उसी समय शांति से स्थिति को संभाल लेती तो इतना रायता नहीं फैलता।" फिर प्रमोद से बोली ," मुझे माफ़ कर दो , अपनी इच्छाओं को नियंत्रित नहीं करती और आप से लड़ती रहती हूं।"

प्रमोद :" कोई बात नहीं अलग-अलग प्रकृति के होने के कारण ऐसी नोंक-झोंक तो चलती रहती है। ईशा अब तुम्हारा क्या इरादा है आगे भविष्य को लेकर।"

ईशा :" अब मैं बिना किसी बंधन के अपने सपनों को उड़ान भरने दूंगी। जब तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती मेहनत करती रहुंगी, मैं भी देखना चाहती हूं मेरा पोटेंशल मुझे कहां तक ले जाएगा।"
मन ही मन सोच रही थी कि तब कहीं मेरी और विवेक की राहें एक  हो गई तो आगे की मंजिल मिल कर तय करेंगे।

लेखक - अज्ञात

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