जन्मदिन उसका था लेकिन सबसे कीमती उपहार मुझे मिला था - चाहत हिंदी स्टोरी

सात बजे है दीया को तैयार होकर निकलने में अभी बीस मिनट और लगेंगे। मैं उसकी एक-एक आदत से परीचित हूं इसलिए मुझे कुछ अन्तर नहीं पड़ता, मैं तैयार होकर बीस पच्चीस मिनट अपने आफिस का काम कर लेता हूं। आज तो उसने कुछ ज्यादा ही समय लगा दिया, दरवाजा खोलते हुए तेज़ क़दमों से बाहर आते हुए बोली," सारी शिव, आज कुछ अधिक समय लग गया, क्या करती बालों का एक नया स्टाइल बनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बना ही नहीं, हमेशा की तरह खुले छोड़ने पड़े। " उसके बाल रेशम के धागे की तरह सिल्की है, कोई क्लिप या रबरबैंड उनमें टिकता ही नहीं। पता नहीं क्यों इतना परेशान रहती बालों के स्टाइल को लेकर। मुझे तो वह हर अन्दाज में मोहक लगती है मैं मन्त्र मुग्ध सा उसे देख रहा था। काले गाउन में वह बहुत हसीन लग रही थी।


बिना मेरी तरफ देखे वह एक हाथ में पर्स लिए दूसरे हाथ से झुककर अपनी सैन्डल का स्टे्प पैर में चढ़ाती हुई आगे बढ़ रही थी। जब दूसरी सैन्डल का स्टे्प चढ़ाने लगी तो उसका सन्तुलन बिगड़ सा गया वहीं टेबल का सहारा लिया तो पर्स उस पर छोड़ दिया। मुझे हंसी आती है उसकी इन हरकतों पर, मैं जितना गम्भीर और अनुशासन प्रिय हूं वह उतनी ही वाचाल और लापरवाह। एक हाथ में उसका पर्स और गाड़ी की चाबी तथा दूसरे से घर का दरवाजा बंद करते हुए मैं गाड़ी के पास पहुंचा। आधे रास्ते में उसे याद आएगा," ओह शिव , मैं अपना पर्स घर में ही भूल गई। दस मिनट लगेंगे गाड़ी वापस ले लो। " मैं ने पर्स उसकी तरफ बढ़ाया तो लेते हुए बोली," ओह माई गॉड, शिव मैं कितनी भुल्लकड़ हूं। " और मुस्कुरा के गाड़ी में जाकर बैठ गई।

अब गाड़ी के चलते ही वह आंख बंद करके सिर टिका कर एक झपकीे लेगी  बस मुझे उसकी यही आदत अच्छी नहीं लगती लेकिन ठीक है मैं हल्की आवाज में संगीत लगा कर गाड़ी चलाते हुए बीच बीच में उसको निहार लेता हूं। उसको इस तरह देखकर मेरी आंखें तृप्त हो जाती है।
कहने को वह मेरी बीवी है।

दीया अन्कुर की छोटी बहन है और अन्कुर से मेरी दोस्ती कालेज में हुई थी जब हम दोनों ने बी काम में दाखिला लिया था। वह हंस मुख और होशियार बंदा था। हम दोनों की इतनी जमने लगी की हम कक्षा में साथ बैठने लगे और एक दूसरे का पढ़ाई में सहयोग लेने देने लगे। एक दिन गलती से मेरी पुस्तक उसके साथ चली गई अगले दिन टेस्ट था। मेरे पास उसका पता था , मैं सीधे उसके घर चला गया। घंटी दबाई भी लेकिन कोई नहीं आया, दरवाजा खुला था सन्कोच तो हो रहा था। फिर भी अन्दचर चला गया जहां से आवाजे आ रही थी
 उसी दिशा में बढ़ गया।

दिवान पर अंकुर लेटा था और उसके ऊपर सोलह सत्रह साल की लड़की मुक्के बरसा रही थी। अंकुर हंसे जा रहा था और अपना बचाव कर रहा था। तभी रसोई से एक औरत आंचल से हाथ पोंछते हुए उन दोनों की तरफ बढ़ी। " दीया यह क्या पागलपन है ,कितनी बार कहा है बड़ी हो गई हो,इस तरह की हरकत करती हुई अच्छी नहीं लगती हो, लालाजी ने देख लिया तो तूफ़ान खड़ा कर देंगे " वे अंकुर की मां होंगी, उन्होंने दीया की बांह पकड़ कर दीवान से नीचे उतारा।

गोरी चिट्टी दिया का मुंह गुस्से से लाल हो रहा था। फिर आंटी ने अंकुर को डांटा" इस तरह बच्चों की तरह लड़ते हुए शर्म नहीं आती,मत खाया कर उसकी चाकलेट,पता नहीं उसको तंग करने में क्या मज़ा आता है।

वह और भी बहुत कुछ कहती लेकिन तभी तीनों का ध्यान मुझ पर चला गया। अंकुर ," अबे यार तू कब आया। " कहते हुए मुझे खींच कर अपने कमरे में ले गया। हम वहां दस पंद्रह मिनट इधर उधर की बातें करते रहे फिर मैं उठ खड़ा हुआ। कमरे से बाहर आया तो आंटी बोली " बेटा कुछ खाने को लाऊं। " मैंने मना किया, तभी वहां से कॅर्डलैस फोन पर बात करती हुई दीया निकली। हंस हंस कर ऐसे बात कर रही थी मानो अभी पंद्रह मिनट पहले कुछ हुआ ही नहीं। अंकुर ने जाते हुए उसकी चोटी खींच दी लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

मेरे लिए यह अनुभव कुछ नया था। घर में इकलौता होने कारण भाई बहन की यह चुहलबाज़ी मेरे लिए नई बात थी। मेरे घर में तो शांति पसरी रहती थी,डैड कमाने में लगे रहते और मॅम खर्च करने में। नौकर चाकर थे मुझे कोई परेशानी नहीं थी लेकिन इतने बड़े घर में सारा दिन अकेला रहता था। अब मेरा मन बार बार अंकुर के घर जाने को करता था। जब अगले दिन टेस्ट होता और हमें गम्भीरता से पढ़ना होता हम मेरे घर आ जाते,वह रात को भी कभी कभी रुक जाता। मैं किसी न किसी बहाने अंकुर के घर चला ही जाता,उन दोनों की छीना झपटी देखने में मुझे बहुत आनन्द आता, कभी कभी मैं भी शामिल हो जाता। मैं कभी विदेशी चाकलेट ले जाता तो वे दोनों बच्चों की तरह लड़ते खानें के लिए।

दोनों भाई बहन अपनी शिक्षा को लेकर बहुत गंभीर थे। अंकुर को लगता अगर वह पढ़ा लिखा नहीं तो उसे अपने दादा जी की कपड़े की दुकान पर बैठना पड़ेगा। उसके दादाजी की मेन मार्केट में बहुत बड़ी कपड़े की दुकान थी। आसपास वालें सब उन्हें लालाजी कहते थे, तो घर में भी सब के लिए लालाजी ही थे। अपने धर्म को लेकर बहुत कट्टर थे और उसूलों के पक्के। घर में उनकी इच्छा के विरुद्ध एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था।

अब स्वास्थ्य के गिरावट के कारण दुकान कम जाते हैं लेकिन चलती उन्हीं की है। दुकान अब अंकुर के पापा सम्भालते हैं जिन्हें वे दोनों बाबा कहते हैं। अंकुर अपनी पहचान स्वयं बनाना चाहता था इसलिए पढ़ लिख कर नौकरी करना चाहता था। दीया इसलिए पढाई को लेकर गंभीर थी कि लालाजी ने कह रखा था कि अगर बारहवीं के बाद किसी अच्छे कालेज में दाखिला नहीं हुआ तो वे उसकी शादी करवा देंगे। वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, उसका सपना आर्किटेक्ट बनने का था। उसने विज्ञान विषय ले रखें थे, और रात दिन ट्यूशन कोचिंग और पढ़ाई में व्यस्त रहती थी। लेकिन जब भी उसके पास समय होता वह हमारे साथ हंसी मज़ाक करती , मस्ती करती और कभी कभी घूमने भी चली जाती। मेरी कोई खास महत्वकांक्षा नहीं था बस स्नातक की डिग्री हासिल करनी थी। डैड बहुत बड़े बिल्डर थे कई कम्पनियों के मालिक थे जिन्हें मुझे ही सम्हालना था। लेकिन अंकुर के साथ रहकर मेरी भी रुचि पढ़ाई में बढ़ने लगी।

धीरे धीरे मुझे दीया की तरफ़ खिंचाव महसूस होने लगा। घर में उससे सबको किसी न किसी बात को लेकर परेशानी होती। उसको कहीं बाहर जाना हो तो सारा घर सिर पर उठा लेती कोई उसको कुछ पकड़ा रहा होता, कोई उसका कुछ ढूंढ रहा होता फिर भी अन्त में वह कुछ न कुछ भूल जाती। जरुरी वस्तु होती तो पीछे पीछे जाना भी पड़ता था पकड़वाने जैसे परीक्षा के समय एक बार एडमिशन कार्ड ही भूल गई। मैं अगर वहां होता तो मुझे अपनी मोटर साइकिल पर उसे चींजे देकर आने में कोई परेशानी नहीं होती। मुझे उसके आसपास रहना उसका काम करना अच्छा लगता। लेकिन आंटी बहुत टेंशन में आ जाती कहती," इस लड़की की लापरवाही और उतावलापन किसी दिन मेरी जान लेकर रहेगा। "

दीया जब बोलना शुरु करती तो चुप नहीं होती। वह अंकुर और मेरे पीछे पीछे घूमती रहती अपनी सहेलियों और स्कूल की बातें बताने के लिए। थोड़ी देर बाद अंकुर चिल्ला कर बोलता ," दीया बहुत होगया,अब अगर एक शब्द भी बोला तो तेरे मुंह में कपड़ा ठूंस दूंगा। " वह फिर भी बोलती रहती " बस एक बात और बतानी है ...। " आखिर में वह उसे कमरे से बाहर धकेल देता, मेरा तो उसका मासूम चेहरा देखकर दिल बैठ जाता,मेरा बस चले तो मैं उसे बाहों में भर कर घंटों उसकी बातें सुनता रहूं। मुझे उसकी आवाज उसकी बातें इतनी प्यारी लगती।

जब वह हंसती तो खिलखिला कर इतने जोर से हंसती कि लालाजी अपने कमरे से बाहर आ जाते ," बहू कितनी बार कहा है लौंडिया को हंसने बोलने की तमीज सिखा दो, चुड़ैल की तरह इतने जोर से  हंसती है, ससुराल में नाक कटा कर रहेगी। " बुड्ढा सठिया गया है हंस ने से भी कभी किसी कि नाक कटती है भला,कान में रूई ठूंस कर क्यों नहीं बैठता। मुझे तो उसकी हंसी झरने की तरह मीठी लगती , एक दम तरोताजा कर देती।
मुझे दीया को देखते रहना बहुत अच्छा लगता था। एक दिन कालेज में दीपक अंकुर से उसके घर आने की बात कर रहा था तो अंकुर ने उसे टाल दिया। हम तीनों एम बीए की दाखिले की परीक्षा की तैयारी साथ में कर रहे थे। ,मैंने कारण पूछा, उसे दीपक से क्या परेशानी है। अंकुर बोला," लालाजी ने दीपक को दीया को ताड़ते हुए देख लिया होगा, गुस्से में कह रहे थे अगर दीपक घर आया तो पैर तोड़ देंगे। " मैं तो पसीने पसीने हो गया,पैर तुड़वाने के डर से नहीं अंकुर के घर न जाने के डर से। वह मेरे जीवन का मकसद बनती जा रही थी,दो तीन  दिन उसे न देखूं उसकी आवाज न सुनु तो लगता प्राण सूखने लगे हैं। मैंने निश्चय किया मैं उसे जब भी देखूंगा, बात करूंगा बहुत सावधान रहूंगा।

उसकी बारहवीं की परीक्षा समाप्त हो गई थी,वह आज कल खाली थी। मुझे जन्मदिन पर नई गाड़ी मिली थी, सोचा तीनों कहीं घूमने जाएंगे। लेकिन अंकुर के घर का दृश्य ही कुछ और था, दीया रस्सी कूद रही थी। अंकुर उसके सामने खाने पीने का सामान लेकर बैठा उसे चिढा रहा था। वह गुस्सा हो रही थी," भाई अब और फालतू बोले तो यहीं से डंडा सिर पर दे मारुंगी। " वह हंसते हुए बोला," अब समझ में आया कोई काम कर रहा हो तो उसके कान के पास भिनभिन करो तो कितना गुस्सा आता है। " आंटी बोली" अंकुर मत कर बच्ची को तंग ,सुबह से कुछ नहीं खाया है इसने। "

अंकुर:"वही तो कह रहा हूं इसको यह पतले होने का भूत कहां से सवार हो गया है,इन लड़कियों के दिमाग़ का कुछ पता नहीं चलता है। " वह कमरे में चला गया मैं भी उसके पीछे-पीछे चलते हुए बोला" दुबला क्यों होना है अच्छी तो लगती है। "

अंकुर:" वही तो मैं उसको समझा रहा था, कह रही है अब कालेज जाऊंगी, वहां बायफ्रेंड बनाऊंगी, अच्छा फिगर तो होना ही चाहिए। "

मुझे तो कहीं से मोटी नहीं लगती, लेकिन अंकुर की बात सुनकर जान हलक में आ गयी। अब यह बायफ्रेंड का फितुर कहां से आ गया। लेकिन दाखिले के वक़्त लालाजी अड़ गए दीया केवल लड़कियों वाले कालेज में जाएगी। सच्ची उस दिन तो बुड्ढे के पैर चूमने का मन कर रहा था।

दीया ने कालेज जाना शुरू कर दिया था और उसके पहनने ओढ़ने में बदलाव आने शुरू हो गए थे। वजन तो उसने थोड़ा बहुत कम कर लिया था, पहले वह जींस टॉप या कुर्तियां पहनती थी लेकिन अब वह स्कर्ट और शोर्ट्स भी पहनने लगी थी। बाल भी उसने अलग अंदाज में कटा लिए थे। पहले वह सुन्दर लगती थी अब तो और भी आकर्षक और हाट लगने लगी थी।

मुझे उसे देख कर भी अनदेखा करना पड़ता था। मुझे यह भी टेंशन रहता था कहीं उसका सचमुच में कोई बायफ्रेंड न बन जाए। मेरे प्रति उसके मन में क्या भाव थे यह मैं बिल्कुल नहीं समझ पा रहा था
समय बीत रहा था वह पढ़ने में काफी व्यस्त रहती। मेरा और अंकुर का एम बीए में दाखिला हो गया था लेकिन हमें पढ़ने के लिए बैंगलोर जाना पड़ेगा। कहीं न कहीं दीया से दूर जाने का मन नहीं था लेकिन दो साल अभी दीया की पढ़ाई के भी बचे थे। उससे पहले इन बातों का कोई औचित्य नहीं था। डैड चाहते थे कि मैं आगे न पढ़कर उनकी कंपनी सम्भाल लूं लेकिन मैंने निर्णय लिया कि मैं आगे पढूंगा। दीया के प्यार के साथ मुझे उसकी आंखों में अपने लिए इज्जत भी देखने की चाहत थी।

बैंगलोर में दो साल मेरा बिल्कुल मन नहीं लगा। जाते ही अंकुर की रुचि से दोस्ती हो गई, वो हमारे साथ ही पढ़ती थी। बहुत शीघ्रता से उसने रुचि को अपनी गर्लफ्रेंड का दर्जा दे दिया।

अब बस वह पढ़ाई करता था या रुचि के साथ समय बिताता था। दीया के बारे में मुझे कुछ पता नहीं चलता था। मैं कभी  उसके घर फोन करता तो आंटी फोन उठाती , इधर उधर की बातें करती और फोन रख देती। एक से एक लड़कियां मेरे साथ फ्लर्ट करने की कोशिश करतीं,मेरा पैसा और व्यक्तित्व दोनों उन्हें खिंचता। उनसे पीछा छुड़ाना मेरे लिए मुश्किल हो जाता लेकिन मैं दीया की यादों से भी बेवफाई नहीं कर सकता था। फिर मेरे पास हृदय था भी कहां वह तो दीया के पास रह गया था और उसने मुझे अपना दिया नहीं था। बेमन से इधर उधर भटकता रहता। कंई बार शंकाएं भी घेर लेती दीया ने कभी अपनी भावनाएं व्यक्त तो की नहीं , मैं भी कभी खुलकर सामने नहीं आया। कहीं ऐसा न हो वह मुझे केवल अच्छा दोस्त मानती हो या बड़े भाई का दोस्त, कुछ कुछ भाई जैसा और मैं हवा में सपनों के महल खड़ा कर रहा हूं उसके साथ भविष्य के। दिमाग बहुत परेशान रहता छुट्टियों में गया तब भी दीया से मिलना नहीं हुआ, कालेज की तरफ से कहीं बाहर गई हुई थी। अंकुर रुचि के कारण कहीं जाना नही चाहता था बैंगलोर में ही छुट्टियां बिताना चाहता था। जिन्दगी बहुत बोझिल लगने लगी थी। कालेज के बाद जिम में या फुटबॉल खेलने में समय बिताता। जैसे तैसे समय कटता जा रहा था जब बिल्कुल एक महीना रह गया तो मेरे अरमान जागने लगें। अब मेरा मन प्रफुल्लित रहता और नई आशाएं जन्म लेने लगीं। मैंने निश्चय कर लिया था कि जाते ही दीया के सामने अपना दिल खोलकर रख दूंगा। अगर उसके दिल में मेरे लिए कुछ भावनाऐं नहीं होगी तो जगाऊंगा। बस अब और इंतज़ार नहीं करूंगा। सोचा एक दो बार अंकुर से बात करुं लेकिन न जाने क्यों वह आज कल नजरें नहीं मिलाता, कटा कटा सा रहता।

आज हम बैंगलोर से जा रहें थे, मैं सामान लदवा रहा था टैक्सी में। रुचि होस्टल ही आ गई थी बाय करने के लिए, मुझे इतनी प्रसन्नता हो रही थी बस लग रहा था जल्दी से जल्दी निकले, लेकिन अंकुर और रुचि बहुत उदास थे। अंकुर उसे कुछ समझा रहा था कि अचानक मेरे कान खड़े हो गए। वह रुचि से कह रहा था ," अगले महीने दीया की शादी है उसके बाद मैं अपनी शादी की बात करुंगा तब तक कोई नौकरी भी मिल जाएगी। तुम उदास मत हो हम फोन पर रोज बात करेंगे। " मैं आश्चर्य से उसको देखते हुए बोला," दीया की शादी, तु क्या कह रहा है। " वह सकपका गया बोला ," तू गाड़ी में बैठ सब बताता हूं। " रुचि स्थिति बिगडती देख जल्दी से अलविदा कह कर चली गई।

रास्ते में अंकुर ने जो बताया उससे तो मेरे होश उड़ गए। लालाजी ने अपने दोस्त के बेटे अरविंद से दीया की शादी एक महीने पहले पक्की कर दी। अब अगले महीने शादी की तारीख निकली है। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था ऐसे कैसे हो सकता है मेरे सब्र का यह फल मिला मुझे। भगवान ने मुझे सब कुछ दिया था बल्कि आवश्यकता से अधिक ही दिया था लेकिन जिस की तमन्ना मैं सालों से कर रहा था वहीं देने में हाथ खींच लिए। मुझे अंकुर पर भी गुस्सा आ रहा था दीया की सगाई हो गई और उसने मुझे बताना भी आवश्यक नहीं समझा।

अंकुर धीरे से बोला ," देख यार मैं दीया के प्रति तेरी फीलिंग जानता हूं इसलिए नहीं बताया। तू परीक्षा बीच में छोड़कर उसके पास भाग जाता। दीया के मन में तेरे लिए कोई फीलिंग नहीं है वह केवल तुझे एक अच्छा दोस्त मानती है। और अगर उसके मन में कुछ भावनाऐं होती भी तो लालाजी यह रिश्ता कभी नहीं होने देते, हमारी अलग अलग जाती के कारण। " मैं बिफर पड़ा," तो भी मुझे प्रयास करने का मौक़ा तो मिलना चाहिए था , अपने मन की बात एक बार तो दीया को कहता। "

अंकुर :" उससे क्या होता, लालाजी तेरा हमारे घर से सम्बंध खत्म करवा देते। मैं अपना दोस्त खों देता और दीया के मन में तेरी बातें सुनकर भावना जागृत हो जाती ,वह तुझसे शादी कर लेती तो मैं अपनी बहन से भी हाथ धो बैठता " पता नहीं शायद ठीक कह रहा हो लेकिन मेरी तो जिंदगी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई।
घर पहुंचा तो माम और डैड मुझे देख कर बहुत खुश हुएं, लेकिन वे डैड के दोस्त के बेटे की शादी में गोवा जारहे थे। घर में मैं अकेला था, मैंने नौकर चाकरों को भी छुट्टी दे दी। दो दिन तक मैं बस पीता रहा,यह सोचकर की इतना मदहोश हो जाऊं कि जब आंख बंद करुं तो दीया नज़र नहीं आए। लेकिन उल्टा असर हुआ,अब तो खुली आंखों से भी चारों तरफ दीया ही दीया नज़र आ रही थी। समझ गया पीने पिलाने से कुछ नहीं होगा, जिंदगी का सम्पूर्ण होशोहवास में सामना करना पड़ेगा इस तरह छुप कर समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। बहुत देर तक उल्टी होती रही,नहा धोकर तरोताजा हुआ अपने लिए कुछ खाने का इंतजाम किया ,कमरा साफ़ किया, फिर सो गया उठा तो ठीक लग रहा था, सोचा जिंदगी में जो भी लिखा हो उसक सामना डट कर करना पड़ेगा। दीया के सामने अपना दिल खोलकर रख दूंगा, अगर उसने इंकार कर दिया तो अपनी किस्मत मान कर स्वीकार कर लूंगा। अगर उसने थोड़ी सी भी दिलचस्पी दिखाई तो सबसे लड़ जाऊंगा उसे अपनाने के लिए। तैयार होकर एक नए आत्मविश्वास के साथ उसके घर की ओर चल दिया।

अंकुर के घर पहुंचा तो लगा मेहमान आए हुए हैं। अंदर गया तो देखा दीया सोफे पर किसी लंगूर के साथ बैठी है। अरविंद ही होगा,उसका हाथ पकड़े बैठा था और कान में कुछ कह रहा था। वह हंस रही थी। मन तो कर रहा था उस साले का मुंह तोड दूं। लेकिन दीया को खुश देखकर लगा किसी ने शरीर में से प्राण ही खींच लिए हो। एक तरफा प्यार की टीस क्या होती है आज समझ आया। थोड़ी देर सबसे मिल कर , दीया को बधाई देकर चुप चाप घर आ गया। अब रोने धोने से कोई लाभ नहीं, दीया खुश हैं यह क्या कम बड़ी बात है। एक बार फिर अपने आप को लुटा हुआ सा महसूस कर रहा था। अब जीवन में समझौता करना ही पड़ेगा। अगले दिन से मैं डैड के आफिस जाने लगा और अपने आप को काम में झोंक दिया।

आज दीया की शादी है, अंकुर के कईं बार फोन आए, शादी में जरूर आना है। मन तो नहीं कर रहा था और जाता भी नहीं लेकिन आखिरी बार दीया को देखने का अरमान जाग गया। दुल्हन की तरह सज़ा था शामियाना ,लगता है लालाजी ने जिंदगी भर की जमां पुंजी लगा दी है साज-सज्जा में , कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन मेरे हृदय को भाले की तरह चुभ रही थी ये रोशनी, लग रहा था मेरी हंसी उड़ाते हुए जगमगा रही है। जब दीया को आते देखा तो होश उड़ गए , जानता था दुल्हन के लिबास में सुन्दर लगेगी, लेकिन इतनी सुन्दर जैसे किसी और ज़हां की हो। काश यह वरमाला मेरे गले में डालने के लिए वह आगे बढ़ रही होती, सच इस के लिए मैं कुछ भी कुर्बान कर देता। वह नजरें झुकाए मन्च की ओर बढ़ रही थी और मैं अपनी जगह पर बुत बना खड़ा था। उसके मंच के पास पहुंचते ही जब लंगूर ने हाथ बढ़ाया उसको सहारा देकर मंच पर चढ़ाने के लिए तब मुझे होश आया। अब आगे देखने का मुझ में साहस नहीं था। मैं पलट कर बाहर जाने के लिए मुड़ा तो देखा एक लड़की तेज़ क़दमों से भीड़ को चीरते हुए मंच की ओर भागी जा रही थी। उत्सुकता वश सब लोग उसके पीछे पीछे चल रहें थे। मंच पर पहुंच कर वह सीधे अरविंद के पास पहुंच गयी और उस पर धोखा धडीं का आरोप लगाने लगी। लालाजी धोती सम्हालते हुए और अरविंद के पापा पैसों का बैग सम्हालते हुए वहां पहुंच गए। वह लड़की उन दोनों को कुछ फोटो दिखाने लगी। अरविंद का चेहरा पीला पड़ गया था और वह लड़की के आरोपों का खण्डन कर रहा था, उसके पापा भी उसकी हां में हां मिला रहे थे।

लेकिन लालाजी की आंखें गुस्से से लाल हो गई थी,शरीर थरथरा रहा था। उन्होंने तुरंत शादी रुकवाने का फैसला सुना दिया। पन्द्रह मिनट में ही सारे बराती और इधर उधर के मेहमान जा चुके थे। लालाजी एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह सोफे पर धम्म से बैठ गए। अंकुर के बाबा और मम्मी ने तो रोना ही शुरू कर दिया। दीया को वहीं किसी ने सहारा देकर एक कुर्सी पर बैठा दिया। अंकुर का परिवार और कुछ करीबी रिश्तेदार ही रह गए थे। ।

तभी कहीं से आवाज आई ," अगर आप मुझे इस लायक समझें तो मैं दीया से शादी करने के  लिए तैयार हूं। " लाला जी मेरे पैरों में पगड़ी लेकर बैठें थे और बोल रहे थे ," बेटा मैं तुम्हारा यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा, तुमने हमारी लाज रख ली। " तब समझ आया यह वाक्य मैंने ही बोला था। लालाजी मेरे मॅम डैड से बात करना चाहते थे लेकिन वे दोनों विदेश गए हुए थे, अगले दिन आने वाले थे। लालाजी एक दिन रुकने को भी तैयार थे लेकिन मैं जानता था मॅम कभी इजाजत नहीं देंगी। उन्होंने एक बड़े उद्योगपति की लड़की मेरे लिए देख रखी थी जो दो कम्पनियों की मालकिन थी। वे कभी अंकुर के परिवार से मिली भी नहीं थी नाही पसंद करती थी। उनकी नज़र में ये लोग गंवार , मध्यम वर्गीय परिवार था। इसलिए मैं इस मुहुर्त में ही शादी करना चाहता था अपनी मंजिल के इतने पास आकर मैं उसे खोना नहीं चाहता था। शादी हो गई लेकिन मैं अभी दीया को विदा नहीं करा सकता था। अगले दिन मैं एयरपोर्ट पर मॅम डैड को लेने गया। मॅम सुनकर बहुत गुस्सा हो गई, गुस्सा तो डैड को भी आया लेकिन वे स्थिति की गंभीरता को समझते थे। संयम खोए बिना उन्होंने सुझाव दिया मैं दीया के साथ हमारा एक और मकान है उसमें रहना शुरू कर दूं। मुझे भी यह सुझाव सही लगा क्योंकि डैड का काम नानवेज और शराब के बिना नहीं चलता और दीया इन दोनों चीजों के कारण असहज महसूस कर सकती थी।

अगले दिन मैं दीया को विदा कराके उस मकान में ही रहने चला गया। डूप्लेक्स टाईप के इस मकान में दो शयनकक्ष ऊपर की मंजिल पर थे और रसोई डाईंगरुम लॅबी और गेस्ट रूम ग्राउंड फ्लोर पर थे। घर बहुत सुंदर और आरामदायक था। चाहता तो मैं यही था कि हम दोनों एक ही कमरे में रहे लेकिन मुझे लगा दीया को शायद थोड़ा समय चाहिए सम्हलने के लिए। फिर मुझे अपने आप पर भरोसा नहीं था मैं कुछ ऐसा न कर दूं कि उसका दिल जीतने की जगह मैं उसकी नफरत का पात्र बन जाऊं। वह उदास लग रही थी ,पहला प्यार भुलाना बहुत मुश्किल है। मैं ने सोच लिया था कि उसका इतना ध्यान रखुंगा ,उसको इतना प्यार दूंगा कि वह उस लंगूर को भूल जाएगी।

मैं ने दीया को प्रोत्साहित किया कि वह मेरे आफिस में ही काम करना शुरू कर दें। शीघ्र ही हमारी एक दिनचर्या स्थापित हो गई। हम साथ ही आफिस निकल जाते और साथ ही वापिस आते। मैं अक्सर उसके साथ घूमने का कार्यक्रम बनाता , उसके या अपने दोस्तों को बुलाकर हम मस्ती करते। मेरे मॅम और डैड भी कभी कभी आते उन्हें दीया अच्छी लगने लगी थी। अंकुर हमारी शादी के अगले दिन ही बैंगलोर चला गया था ,उसको वहां नौकरी मिल गई थी। मैं दीया के साथ पहले जैसे ही बातें करता हंसी मज़ाक करता , उसकी छोटी से छोटी जरुरतों का और खुशी का पूरा ध्यान रखता। मुझे तो सबसे बड़ा सुकून यह था कि वह सारा दिन मेरी नज़रों के सामने रहती थी ,रात को जब वह अपने कमरे में जाती तो मुझे अख़र जाता। रात काटनी मुश्किल हो जाती , मैं कल्पना करता रहता वह क्या कर रही होगी, क्या पहन कर लेटी होगी। इतने पास होते हुए भी इतनी दूर बीच में मनहूस दीवार।

मैं रोज रात को कल्पना करता जब वह मेरे पास पलंग पर लेटी होगी तब मैं कैसे देर तक उसका आंखों से दीदार करुंगा, फिर होंठों से उसकी आंखों , गालों को चूमता हुआ उसके होंठों तक जाऊंगा। और भी न जाने क्या क्या करुंगा , सोचते हुए ही सोजाता। अब वह सामान्य होती जा रही थी , मेरे साथ मजाक करती और अपने मन की बात भी मुझे बताने लगी थी।

एक दिन रात को उसके ज़ोर से चीखने की आवाज आई, मैं भागा उसके कमरे की ओर। वह पलंग पर खड़ी उछल रही थी , मेरे पूछने पर उसने बताया कमरे में छिपकली आ गई है। मैंने ढूंढा लेकिन मुझे तो कहीं दिखाई नहीं दी ,उसकी घबराहट देखकर मैंने उसे अपने कमरे में सोने के लिए बुला लिया।

वह आकर चुपचाप मेरे पास पलंग पर लेट गई। उसने गहरे नीले रंग की लेस वाली नाईटी पहन रखी थी , जिसमें उसकी संगमरमरी देह गज़ब लग रही थी। आज मेरी चाहत इतने करीब थी लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी आगे बढ़ कर हाथ लगाने की। समाज ने तो यह अधिकार दे दिया था लेकिन बिना उसकी अनुमति के, उसकी इच्छा जाने मैं यह पाप नहीं कर सकता था। मैं पसीना पसीना हो रहा था , मेरे हाथ मेरे दिमाग की सुनना नहीं चाहते थे फिर भी मैं करवट बदल कर दुसरी तरफ मुंह करके सोने का नाटक करने लगा। वह भी संकुचित सा महसूस करती चुप चाप लेटी रही।

बस बहुत हो गया , दो दिन बाद उसका जन्मदिन था। मैंने निश्चय किया ,इस बार पूरी तैयारी कर के उससे मैं अपनी मुहब्बत का इजहार कर दूंगा। मैंने उसके लिए एक बहुत सुन्दर पोषाक ख़रीदीं एक हीरे की अंगूठी ,एक बड़ा सा गुलदस्ता और ढेर सारी चोकलेट। एक बड़े होटल में डिनर के लिए लें जाऊंगा, वहां हम दोनों अकेले होंगे, मैं उसको बताऊंगा मैं उससे कितनी मुहब्बत करता हूं और कब से करता हूं।

आज उसका जन्मदिन था और वह सुबह से मेरे मुंह की तरफ देखे जा रही थी, लेकिन मैं अनजान बना अपना काम करता रहा। रात को तोहफे देते हुए ही मैं उसे जन्मदिन की शुभकामनाएं दूंगा। शाम को आफिस से लौटे तो दरवाजे पर ही रामू ने बताया, भाभी जी से मिलने कोई सज्जन आए हैं ,अपना नाम अरविंद बता रहे हैं। हे भगवान! तू कितना मजाक करेगा मेरे साथ , मैं आज सचमुच हार गया था , कितनी मुश्किल से मैं ने दीया को सब भुलाने में सहायता की थी और यह लंगूर फिर आ गया। यह तो मैं समझ गया था कि वह अब दीया से माफी मांगेगा फिर उसका साथ चाहेगा। दीया  अंदर बैठक में चली गई और मैं वहीं लाबी में पड़े सोफे पर बैठ गया रामू पूछने आया कि मेहमान के लिए चाय पानी लाना है क्या। मैं ने उसे घर जाने के लिए कह दिया। मुझे लग रहा था मेरा शरीर बेजान होता जा रहा है

दस मिनट बाद ही दीया कमरे से बाहर आ गई, उसका चेहरा लाल हो रहा था, शायद शर्मा रही थी। अरविंद ने एक हाथ अपने गाल पर रखा हुआ था, वह बाहर चला गया। अब कुछ कहने सुनने को नहीं रह गया था , मैं मुंह लटकाए बैठा था। दीया मेरे पास आकर बोली," शिव आपको क्या हुआ , तबियत तो ठीक है, चेहरा पीला क्यों पड़ गया?"

मैं :" कुछ नहीं थकान सी है। "

दीया :" पूछोगे नहीं अरविंद क्यों आया था। कह रहा था उसने अपनी गर्लफ्रेंड को छोड़ दिया है , मुझे अपनी गर्लफ्रेंड बनाना चाहता है। कह रहा था अगर मैं शादी तोड़ना नहीं चाहतीं हूं तो भी उसे कोई एतराज़ नहीं है। मैं ने उसको जोर से एक थप्पड़ मारा, शादी को मजाक समझता है। "

तो उसने गाल पर इसलिए हाथ रखा हुआ था , वहां थप्पड़ पड़ा था। मैं झटके से दीया की तरफ़ मुड़ा। अब तक दीया मेरे पास सोफे पर बैठ गई थी।

दीया:" मैं ने उससे साफ कह दिया कि मैं अपने पति से इतना प्यार करती हूं कि उनको सपने में भी धोखा देने की नहीं सोच सकती, और आज से नहीं सालों से करती हूं। "

मैंने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर पूछा " क्या तुम सच कह रही हो?"
मेरी आंखें ख़ुशी से चमक रही थी।

वह झिझकते हुए आंखें झुकाए धीरे से बोली ," और नहीं तो क्या ? पहले तो आप मेरी तरफ देखते भी थे फिर नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। "

मैं:" वह तो लालाजी के कारण , किसी को भी तुम्हें देखते हुए देख लिया बस उसका तुम्हारे घर आना जाना बंद। "

दीया के हाथ अब मेरे सीने पर थे,वह बोली," मुझे लगा आपको मैं मोटी लगती हूं,वजन कम किया , एक से एक ड्रेस पहनी लेकिन कुछ फर्क नहीं पड़ा। सब तरफ से ध्यान हटाकर मैं पढ़ाई में व्यस्त हो गई। "
मैं:" अच्छा तो फिर उस लंगूर से शादी के लिए हां क्यों की?"

दीया:" क्या करती आपकी तरफ से कुछ पहल नहीं हो रही थी। लालाजी ने रट लगा रखी थी पढ़ाई पूरी होते ही शादी करनी है , नौकरी अगर ससुराल वाले कराएंगे तो करना वरना नहीं। मुझे लगने लगा आपके मन में मेरे लिए दोस्ती से अधिक कोई भावना नहीं है। "

मैं:" मैंने कई बार कोशिश की अपने मन की बात बताने की लेकिन हर बार कुछ न कुछ अड़चन आ जाती। अच्छा बताओ शादी के बाद इतनी उदास क्यों रहती थी। "

दीया:" मुझे लगा मेरे परिवार की इज्जत बचाने के लिए आपको कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, अपने अरमानों का गला घोंट दिया। सच बताऊं तो मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि मेरे कारण आपकी जिंदगी खराब हो गई है। लेकिन अब मुझसे दूरी बर्दाश्त नहीं हो रही थी उस दिन छिपकली का झूठा बहाना बना कर आपके पास आईं लेकिन आप फिर भी करीब नहीं आएं। " उसके स्वर में उलहाना था।

मैं अवाक उसकी तरफ देख रहा था, झूठ बोल कर मेरे करीब आने की कोशिश कर रही थी, मुझे हंसी आ रही थी। लेकिन मैं कुछ बोलता , अपनी सफाई देता उसने अपने कांपते होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैं कहना चाह रहा था मुझे भी तो बताने दो उस रात मुझ पर क्या बीती , कितना चाहता हूं मैं तुम्हें, और कुछ नहीं तो जन्म दिन की मुबारकबाद  तो दे ने दो। उसका किस गहराता जा रहा था और मैं होश खोता जा रहा था, मेरी बाहें का घेरा उसके चारों ओर कसता जा रहा था।

मेरी योजनाओं, शुभकामनाओं और तोहफों को इन्तजार करना पड़ेगा। जन्मदिन उसका था लेकिन सबसे कीमती उपहार मुझे मिला था, मेरी जिन्दगी मेरे सपने और मेरी चाहत मेरी मुहब्बत।

लेखक - अज्ञात 

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