मुझे माफ़ कर दो, आगे से ऐसा नहीं होगा मैं बहुत शर्मिन्दा हूं

पिता की जिम्मेदारियों को निभाते हुए नितिन की जिंदगी के तीस बसन्त बीत चुके थे। जब वह कालेज में था तभी पिता जी ने बिस्तर पकड़ लिया था।


किसी तरह बिमारी और उसकी पढ़ाई का खर्च जमापूंजी में से निकाल कर चलाया। जैसे ही नितिन की नौकरी लगी, पिता जी ने आंखें मूंद ली, मां, दो छोटी बहनें और एक छोटे भाई की जिम्मेदारियां उसके सुपुर्द कर के। उसने दोनों बहनों को पढ़ा लिखा कर उचित वर देख कर विवाह कर दिया।छोटे भाई विवेक की भी पढ़ाई पूरी हो गई थी लेकिन नौकरी लगी हैदराबाद। नितिन मेरठ में अपने दादा द्बारा बनाए गए मकान में अपनी मां सरला के साथ रह रहा था।सरला चाहती थी विवेक दिल्ली में नौकरी ढूंढले और घर खर्चे में हाथ बटाएं, बहनों के तीज त्यौहार में बराबर का योगदान दे और बहनों की शादी में लिए कर्ज चुकाने में नितिन की मदद करें। लेकिन विवेक ने साफ इंकार कर दिया, उसके हिसाब से अब बहनों का लेन-देन बंद करके दोनों भाइयों को अपने भविष्य के लिए धन संचित कर अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए। उसने नितिन को भी यह बात समझाने की कोशिश की लेकिन उसने हंस कर टाल दी। फिर मां से लड़-झगड़कर हैदराबाद चला गया। पिछले महीने उसने फोन पर बताया की अपने आफिस में साथ काम करने वाली एक गैर बिरादरी की लड़की से शादी कर ली है। सरला को बहुत झटका लगा , पुत्र ऐसे हाथ से निकल जाएगा उसने सोचा भी नहीं था।

उसे यह भी बुरा लगा , बड़े भाई के कुंआरे होते हुए छोटे भाई ने शादी कर ली। इसलिए उसने निर्णय लिया कि नितिन की शादी अब जल्दी होनी चाहिए। नितिन की नौकरी बुरी नहीं थी लेकिन दोनों बहनों की शादी में कर्ज़ काफी चढ़ गया था। कोई सम्पन्न परिवार अपनी लड़की देने को तैयार नहीं था, नितिन की आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी।

सरला की मन्दिर में कुसुम से अक्सर भेंट हो जाती थी, एक बार उसने अपनी बहन की लड़की के सन्दर्भ में बात की थी। उसने विनीत भाव से कहा था आठ साल पहले बहन बहनोई की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी और वह चाहती थी कि सरला बिन मां बाप की बच्ची पर रहम खाकर उसे नितिन के लिए पसंद कर ले।तब सरला को बहुत गुस्सा आया था कुसुम पर उसने क्या अनाथालय खोल रखा है जो बिना दान दहेज़ के लड़की ब्याह लाए।

लेकिन जब से विवेक ने बताया कि उसने विवाह कर लिया है सरला के मन में असुरक्षा की भावना घर कर गई थी। कहीं नितिन भी अपनी पसंद की किसी एसी लड़की से शादी कर बैठा और उसने जीना मुश्किल कर दिया तो वह कहां जाएगी।छोटे बेटे से तो अब कोई उम्मीद नहीं रही। सरला के दिमाग़ में आया जल्दी से जल्दी उस अनाथ लड़की से नितिन की शादी कर दी जाए ,जब मायके का कोई सहारा नहीं होगा तो चुप चाप उसके कदमों में पड़ी रहेगी। उधर लड़कियों ने भी हां में हां मिलाई ,उनका घर में आना जाना बना रहेगा और हिसाब मां के हाथ में रहेगा तो लेना भी पहले की तरह चलता रहेगा।

अगले दिन ही सरला ने कुसुम से बात कर के नितिन और दोनों बेटी दामाद के साथ लड़की देखने का कार्यक्रम बना लिया। पंखुरी मां बाप की मृत्यु के बाद चाचा चाची के साथ रहती थी।उनके लिए वह बोझ थी, एक मुंह बढ़ गया था खिलाने के लिए। मौसी के मन में स्नेह था लेकिन मौसा को फूटी आंख नहीं सुहाती थी। यौवन की दहलीज पर खड़ी थी, कोमलता, मासूमियत और सुन्दरता पुराने घीसे कपड़ों में से भी झांक रही थी।

मां और बहनों को तो उसकी दयनीय स्थिति लुभा रही थी लेकिन नितिन का पुरुष उसके रूप के आकर्षण में बंध गया था। चुंकि दोनों पक्षों के हाथ तंग थे इसलिए निश्चित हुआ पन्द्रह दिन बाद मन्दिर में सादे समारोह में शादी करके , आसपास वालों को बुलाकर प्रीतिभोज का आयोजन कर देंगे। पांच जोड़ी कपड़े चाची ने और पांच छः जोड़ी कपड़े सरला ने पंखुरी के बनवा दिये।

पंखुरी को पता भी नहीं चला और उसकी शादी हो गई।मां बापू के जाने के बाद से बिल्कुल अकेली हो गई थी। चाची काम तो सारा करवाती थी, उनके बच्चों को भी नौकरानी की आदत हो गई थी लेकिन प्यार के दो शब्द नहीं थे किसी के पास उसके लिए। विदाई के समय एक कोने में ले जाकर साफ साफ बोल दिया चाची ने," अब इस घर से कोई उम्मीद मत रखना, जितना कर सकते थे कर दिया ।कभी दो टसुए बहा कर चाचा को काबू में करना चाहो तो यह हम होने नहीं देंगे।" एक मौसी ही थी जिसकी आंखों में अपने लिए स्नेह देखा था पंखुरी ने। लेकिन वह भी मौसाजी की वजह से कुछ नहीं कर पातीं थी।जब मौसा जी दो चार दिन के लिए बाहर जाते तो मौसी उसे अपने घर ले जाती, कुछ कपड़े वगैरह दिलवा देती, उसके पसन्द का खाना बनाकर खिलाती। लेकिन उसके बाद बहुत बवाल मचता ।उधर मौसा चीखता ,' मेरा सारा घर लुटा दो अनाथों पर' इधर चाची चीखती ' अरे इतना प्रेम टपकता है  तो हमेशा के लिए क्यों नहीं रख लेते।' इन्हीं छोटी छोटी मुलाकातों में मौसी ने एक सपने का बीज बो दिया था पंखुरी के मन में।वह कहती ," तू चिंता मत कर यह तेरी परीक्षा है ,बस तेरी शादी हो जाए फिर देखिओ तेरा अपना घर अपना परिवार होगा। सुन्दर सा राजकुमार आएगा गाजे-बाजे के साथ।" भोलेपन में पंखुरी इस सपने को दिल में पालती रही और उलाहना, अकेलापन सब सहती रही।

जब नितिन से उसका रिश्ता पक्का हुआ तो वह बहुत खुश थी ,मां दो बड़ी बहनें और शायद एक देवर भी था इस परिवार में। नितिन भले ही दस साल बड़ा था उससे लेकिन उसे वह अपना सा लगा। उसे विश्वास हो गया कि नितिन प्रेम साथ और सन्रक्षण सब डाल देगा उसकी झोली में। बिना ढोल नगाड़ों की शादी से उसे कुछ मायूसी सी महसूस हुई लेकिन हर स्थिति से हंस कर उबरने की उसे आदत हो गई थी।समान तो न के बराबर लाई थी पर छोटे छोटे सपने और अरमानों की गठरी ज़रूर रख लाई थी सिर पर।

नितिन जिम्मेदारियों में ऐसा उलझा रहा था कि अपनी जरूरतें भूल गया था। जब पंखुरी को देखा तो उसकी इच्छाएं जाग गई।कईं बार उसको लगता उसकी अहमियत एक पैसा कमाने वाली मशीन से अधिक नहीं है।सब उसके सामने अपनी फेहरिस्त लेकर खड़े रहते ,वह कैसा है उसकी क्या इच्छा है ,इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।वह प्रसन्न था कि कोई उसकी आवश्यकताएं समझने वाली उसकी जिंदगी में आ रही है।
शादी के दो दिन बाद नैनीताल का कार्यक्रम बना लिया था उसने।

पंखुरी को जब पता चला नैनीताल जाना है तो वह खुशी से झूम उठी। उसे याद नहीं वह कभी दुसरे शहर घूमने गई हो तो वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि वहां क्या होगा। नैनीताल में दो दिन उसने जो देखा जो महसूस किया वह उसके लिए सपने जैसा था। नितिन ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी उसे घुमाने फिराने में खाने पिलाने में और प्यार उड़ेलने में। पंखुरी को यकीन हो गया मौसी सही कहती थी शादी के बाद उसके सब दुःख दर्द धुल जाएंगे।घर लौटी तो भविष्य को लेकर इतनी आशावान थी कि उसमें एक नया उत्साह और उमंग थी।
इधर सरला अपने भविष्य को लेकर भयभीत थी। नितिन की नजरें जिस तरह पंखुरी का पीछा करती ,यह देख उसका  कलेजा मुंह को आ रहा था। दो दिन लड़कियों ने भी कान भरे," मां सम्भल कर रहना भाई पर नजर रखना, कहीं ऐसा ना हो भाभी का जादू ऐसा चले तुम्हारा ही टिकट कट जाए। कहां जाओग,उन दोनों में ज्यादा मत बनने देना |

नितिन आफिस गया तो दोस्तों ने घेर लिया,बधाई दी, पार्टी की फरमाइश की और हंसी मज़ाक कर उसे छेड़ते रहे।बाद में बचपन के दोस्त भी मिलने आए जिनकी शादी को चार पांच साल हो गए थे।वे अपने अनुभव और सलाह नितिन पर उड़ेलने को बैचेन थे। सचिन को शिकायत थी पत्नी की कभी भी न खत्म होने वाली फरमाइशों से। उसकी सलाह दी," यार शुरू से ही बजट के हिसाब से लिफ्ट दो वरना सिरदर्द बन जाती है यह इच्छाएं ।" विवेक को लगा," यार ज्यादा लिफ्ट मत देना शुरू से ही काबू में रखना वरना मेरी वाली की तरह सिर पर नाचेंगी। शुरू में कुछ जवानी का उन्माद और कुछ नई नवेली का लाड़ चाव, ज्यादा ही हां में हां मिला दी ।अब भुगत रहा हूं , इतनी चौड़ी होकर रहती है अपने ही घर में घबराहट सी होने लगी है।" ये ज्ञान वर्धक बातें सुनकर नितिन को लगा दोस्तों ने समय पर चेतावनी दे दी ,वह शुरू से ही सावधान रहेगा।

घर पहुंचा तो पहले मां से मिलने उसके कमरे में गया। सरला पैर पकड़ कर बैठी थी, बोली" बहुत दर्द रहने लगा है पैरों में, तेरी लुगाई तो बच्चा ही है,घर के काम में बिल्कुल अनाड़ी।उसको सारा दिन काम सिखाते सिखाते ही हाथ पैर ढ़ीले हो गए।" नितिन बहुत देर तक सरला के पैर दबाता रहा,जब सरला ने कहा चल खाना खा ले तभी उठा। कमरे में गया कपड़े बदलने तो पंखुरी का चेहरा गुलाब सा खिल उठा।वह भी उससे बहुत देर तक हंसता बोलता रहा फिर दोनों खाना खाने के लिए कमरें से बाहर आ गए।

सरला खाना परोस कर बैठी थी। पंखुरी रोटी सेंकने लगी ,सास और पति को बड़े चाव से गरम गरम रोटी खिलाने में उसे बड़ी तृप्ति मिल रही थी। लेकिन सरला बड़बड़ाने लगी," आजकल की लड़कियों को और कुछ आए न आए मर्दों को पटाना बहुत अच्छे से आता है। कैसे कूद कूद कर काम करके दिखा रही है।" नितिन को मां की बातें अच्छी नहीं लगी लेकिन लगा मां थक गई है इसलिए चिड़चिड़ापन महसूस कर रही है। पंखुरी को प्यार से समझाएगा मां का अधिक ध्यान रखें।

रात को नितिन ने जब यह बात पंखुरी से कही तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । उसने तो माँ का बहुत ध्यान रखा था , कोई काम भी नहीं करने दिया था। लेकिन वह कुछ नहीं बोली, उसको लगा वह और कोशिश करेगी माँ को खुश करने की । आखिर उसकी तमन्ना थी माँ के आन्चल तले छोटा सा स्थान पाने की । वह सारा दिन सरला के आगे-पीछे घूमती , घर के काम निपटाती। आए दिन ननदें भी आती रहती , वह उनकी और उनके बच्चों की भी फरमाइशे पूरी करती रहती, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। रोज़ शाम को सरला नितिन के आते ही उससे शिकायती लहजे में पंखुरी की गलतियां गिनाने लगती। घर के काम-काज में पंखुरी निपुण थी, आखिर चाची के यहां सारा घर उसने ही सम्भाल रखा था। फिर भी छोटी से छोटी बात सरला नमक-मिर्च लगाकर बताती। पंखुरी को आश्चर्य तब होता जब उसने जो गलती नहीं की वह भी उसके खाते में जमा हो जाती। शिफॉन की साड़ी थोड़ी सी जल गई थी, माना यह उसकी भूल थी लेकिन नल तो उसने नहीं तोड़ा था, वो तो ननद के बेटे ने तोड़ा था । यही उसके साथ पहले भी होता था, शैतानी और तोड़-फोड़ चाची के बच्चे करते थे लेकिन मार उसको पड़ती थी, कहने को भाई-बहन थे।

एक दिन नितिन बहुत थका हुआ था, सिर में भी काफी दर्द था माँ की बातें सुनकर उसे बहुत गुस्सा आया पंखुरी पर," एक महीना होने को आ रहा है अभी तक कोई  काम ठीक से नहीं कर सकती।" वह उस पर ऐसा चिल्लाया की पंखुरी सहम गई । आँखो में आंसू लिए वह नितिन को देखे जा रही थी और उसे अपने सपने चकनाचूर होते दिख रहे थे। रात को जब नितिन ने उसे बाहों में लेने की कोशिश की तो मन की खिन्नता तन में भी समा गई, वह बुत बनी पड़ी रही। नितिन झल्ला कर दूसरी तरफ मुंह करके सो गया।

अगले दिन खाना बनाकर पंखुरी दीया बाती करने चली गई।पूजा घर में माचिस खत्म हो गई थी,जब वह रसोई में ले ने गई तो देखा सरला बनी हुई सब्जी में नमक डाल रहीं थीं। पंखुरी समझ गई सास बहू की खाई पाटकर मां बेटी का रिश्ता बनना नामुमकिन है आज उसे लगा उसने जो अपने घर का सपना संजोया था वह सब्जी में उठ रही भांप की तरह धुआं बनकर उड़ रहा है। अपने आप को ही धिक्कार ने लगी क्यों इतनी खुश हो गई की स्वयं की ही नजर लग गई।  मन कर रहा था आज नितिन को बताएं मां उसके साथ कैसा व्यवहार करतीं हैं, लेकिन नितिन भी अब पराया लगने लगा था।वह स्वयं क्यों नहीं देख पाता घर में क्या हो रहा है , क्यों उसको समझने की उसके मन की बात जानने की कोशिश नहीं कर सकता है? पंखुरी को लगता मां की शिकायत करके वह मां बेटे के बीच में दरार डालने का कारण नहीं बन सकतीं।

एक बार मां पिताजी  की बहुत याद आ रही थी तब उसने दुखी होकर मौसी से पूछा था उसके मां पिताजी उसको इतनी जल्दी छोड़ कर क्यों चले गए। उसके बड़े होने तक का इंतजार भी नहीं किया। " मौसी ने सीने से लगाते हुए कहा था," हो सकता है लाडो पिछले जन्म में तेरे कारण कोई मां अपने बच्चे से अलग हुई हो, इसलिए इस जन्म में ऊपर वाले ने तेरी मां तुझसे इतनी जल्दी छीन ली है।" यह बात पंखुरी के दिमाग़ में बैठ गई थी।इस जन्म में वह एसी कोई भी गलती नहीं करेंगी, अगले जन्म में उसे अपने माता-पिता का साथ ता उम्र चाहिए था ।

उसने निर्णय लिया जैसे अब तक शादी से पहले वह  मूक बनी सब सहन कर रही थी अब आगे भी ऐसे ही करेंगी। सपने और अरमान  उसने दिल से निकाल कर बाहर अंधेरे में फेंक दिए और वहां फैली उदासी को उसने अपने दिलोंदिमाग में बसा लिया।

जिंदगी अब निर्बाध तरीके से आगे बढ़ रही थी।वह चुप चाप सारा दिन काम करती रहती, मां शिकायत करती , नितिन उस पर झल्लाता,वह सिर नीचे किए सुनती और माफी मांगती , आगे से यह गलती नहीं होगी इसका आश्वासन देकर चुप चाप दूसरे काम में लग जाती।न उसे खाने की सुध रहती न सोने की। चार महीने हो गए थे शादी को लेकिन किसी का अब उसकी तरफ ध्यान नहीं जाता।

मंदिर की तरफ से बस तीर्थ यात्रा पर जा रही थी, सरला का भी बहुत समय से मन था उन तीर्थों पर जाने का। चार दिन की तो बात थी उसने अपना नाम लिखवा दिया।

शाम को सरला को बस में बैठा कर आया तो काफी देर हो गई।आते ही उसने कहा ," खाना परोस दो बहुत भूख लगी है।" सब्जियां उसके पसन्द की बनी थी,पहला कौर मुंह में डालते ही जैसे आन्नद और तृप्ति का अहसास उसकी जिव्हा पर विराज गया हो। उसने प्रसन्नचित होकर कहा," आज खाना बहुत स्वादिष्ट बना है , तुम भी लगा लाओ साथ बैठ कर खाएंगे।" पंखुरी धीरे से बोली," नहीं आप खाओ,हम रसोई साफ कर के खा लेंगे "
नितिन :" नहीं रसोई बाद में साफ करना , पहले रोटी सेंक लो साथ में खाएंगे।"

पंखुरी रोटी सेंक कर अपना खाना लगा कर लाई तब तक नितिन ने आधा खाना खा लिया था।उसने पंखुरी की थाली में देखा ज़रा सी सब्जी डाली हुई थी, उसने खाते खाते पूछा," सब्जियां इतनी स्वादिष्ट बनी है , इतनी सी क्यों ली है , क्या ख़त्म हो गई है।"

पंखुरी:" नहीं हम इससे अधिक नहीं खां पाएंगे।"

उसने आश्चर्य से पंखुरी की ओर देखा तो नजरें जैसे अटक गई उसके चेहरे पर।

लगा महीनों बाद देख रहा था बिल्कुल मुरझा गई , आंखों के नीचे काले घेरे , होंठों पर खेलती हंसी गायब थी। चेहरा पर उदासी थी ,शरीर कमजोर लग रहा था, साड़ी भी पुरानी घीसी हुई कईं जगह छेद हो रहें थे।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही पंखुरी है गुलाब की तरह खिली रहने वाली जिसे वह ब्याह कर लाया था।उसका दिल भारी हो गया,कितने सपनों और वादों के साथ लाया था लेकिन उस मासूम लड़की का ध्यान नहीं रख पाया।वह अभी भी शून्य में ताक रहा था  और पंखुरी कब खाना खाकर बर्तन मांजने चली गई उसे पता भी नहीं चला।वह चुप चाप  लेटा हुआ था , पिछले चार महीने चलचित्र की तरह उसके दिमाग में घूम रहे थे। रोज़ खाने में कभी नमक अधिक तो कभी मिर्च, लेकिन आज इतना स्वादिष्ट खाना।

पंखुरी एक शब्द बोले बिना सारा दिन काम करती और कुछ मांग नहीं करती। लेकिन मां कहती वह जुबान लड़ाती है , कामचोरी करती है ।मां ऐसी तो कभी नहीं थी पहले तो उसने कभी झूठ नहीं बोला , हमेशा ममता लुटाती थी, अचानक पंखुरी के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है? वह स्वयं भी तो जिम्मेदार है घर में क्या चल रहा है इस ओर ध्यान नहीं देने के लिए।वह इतना विचारों में खोया हुआ था उसे पता ही नहीं चला कब पंखुरी उसके बगल में आकर सो गई। सोते हुए वह और भी कमजोर और मुरझाईं हुई लग रही थी। अगले दिन वह आफिस जाने से पहले अपने दोस्त सचिन से मिलने गया।

सचिन आफिस के लिए निकल ही रहा था , उसकी पत्नी उसे बाहर तक छोड़ने आई थी, दोनों बहुत खुश लग रहें थे। नितिन को देखकर वह रुक गया और उससे बातें करने लगा।

नितिन:" क्या बात है आज जल्दी आफिस जाने के लिए निकल पड़ा है।"

सचिन:" आज करवाचौथ है , जल्दी घर आना है । श्रीमती जी ने समान की लिस्ट पकड़ा दी है,वह भी लाना है। एक तौहफा भी सोच रहा हूं लाऊंगा उसके लिए।"

नितिन हंसते हुए:" अच्छा आज तो बहुत प्यार आ रहा है भाभी जी पर।"

सचिन शर्माते हुए:" प्यार तो हमेशा ही आता है, फिर आज तो व्रत रखेंगी मेरी लम्बी उम्र का, इतना तो करना ही पड़ेगा। आ किसी दिन भाभी जी को लेकर , गप्पे मारेंगे, मज़ा आएगा।"

भारी कदमों से नितिन आफिस की तरफ बढ़ गया।उसे भी पंखुरी के लिए कोई तोहफा लेना चाहिए ,नई साड़ी ठीक रहेगी। काम में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था, पंखुरी की उदास आंखें ध्यान में आ रही थी।लंच के समय देवयानी को सामने से गुजरते देखा तो बोल पड़ा," मैडम, एक साड़ी पसंद करवा देंगी, पत्नी के लिए लेनी है। साड़ी कभी ली नहीं है तो अंदाजा नहीं है बिल्कुल ।"

देवयानी हंसते हुए बोली:" हां हां चलो , नीचे बाजार में बड़ी सुंदर साड़ियां बिक रही हैं।"

नितिन के आफिस के नीचे ही अच्छा खासा मार्केट था,वह देवयानी के साथ साड़ी की दुकान में चला गया देवयानी आफिस में कईं सालों से काम कर रही थी, चार पांच साल पहले ही उसके पति की हार्टअटैक से मृत्यु हो गई थी।

देवयानी पूछ रही थी:" कैसी साड़ियां पसंद करती हैं आपकी पत्नी कुछ तो अंदाजा होगा "

उसका भावहीन चेहरा देखकर वह बोली:" लगता है अभी अपनी पत्नी की पसंद नापसंद को समझ नहीं पाऐ हो । चार महीने तो बहुत होते हैं किसी को जानने के लिए,अगर दिल से कोशिश करो तो।"

नितिन ने झेंपते हुए कहा,"हाँ सही कह रही हैं आप।"

लाल रंग की खूबसूरत साड़ी पर हाथ रखते हुए देवयानी बोली ," यह साड़ी बहुत सुंदर है, उन्हें अवश्य अच्छी लगेगी। वैसे भी पति तोहफे में कुछ भी दे अच्छा ही लगता है। तोहफा तो एक तरीका होता है प्रेम प्रदर्शन का, महत्वपूर्ण तो भाव होते हैं। सब जगह लेन-देन चलता है तो रिश्तों में क्यों नहीं, खासतौर से पति-पत्नी के रिश्ते में। जितना प्रेम दोगे उतना मिलेगा। जानते हो मेरे पति आशीश ने मुझे इतना प्रेम दिया बीस-बाईस सालों में कि आज भी उनको याद करती हूँ तो स्नेह से भीग जाती हूँ।"

शाम तक ऑफिस में समय काटना उसके लिए मुश्किल हो गया था। घर पहुँचा तो चाबी से दरवाज़ा खोलकर वह अंदर दाखिल हुआ। अभी चाँद नहीं दिखा था इसलिए व्रत खोलने में समय था। लेकिन अंदर पहुँच कर उसने देखा पंखुरी खाना खा रही थी, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। लगा हो सकता है इसे ध्यान ही नहीं हो आज करवाचौथ है, माँ यहाँ नहीं हैं तो उसे पता नहीं चला है। वैसे पहला करवाचौथ महत्वपूर्ण होता है माँ ऐसे कैसे जा सकती हैं। खैर उसने पंखुरी से कहा," आज तुमने व्रत नहीं रखा। क्या तुम्हें पता नहीं  था।"

पंखुरी:" पता था , सुबह मासी आई थी उन्होंने भी बताया था , कहा था व्रत रखने से पति की लम्बी आयु होती हैं और सात जन्मों तक उसका साथ मिलता है।"

नितिन को कुछ समझ नहीं आ रहा था , जब इस बारे में इसे पता था तो इसने व्रत क्यों नहीं रखा। सुहागिनें तो इस व्रत को बहुत महत्व देती है,वह भले ही स्वयं इन बातों पर अधिक विश्वास नहीं करता। पंखुरी अभी भी धीरे धीरे सिर नीचे किए खाना खा रही थी।हो सकता है इसे भूख बर्दाश्त नहीं हुई हो इसलिए थोड़ा पहले खा लिया हो। नितिन ने टीवी पर समाचार लगाते हुए कहा, " वैसे दस पंद्रह मिनट में चांद दिख जाता अगर तुम थोड़ा और इंतजार करती।"

पंखुरी उसकी तरफ मासुमियत से देखते से देखते हुए बोली," लेकिन मैं ने व्रत रखा ही नहीं तो चांद से मुझे क्या फर्क पड़ेगा। मैं ने तो भगवान की फोटो के सामने बैठ कर खाया जिससे उन्हें कोई ग़लत फहमी न हो जाए कि मैं ने व्रत रखा है।"

नितिन:" मतलब।"

पंखुरी:" मौसी कह रही थी व्रत रखने से यही पति सात जन्मों तक मिलेगा। मुझे आपके साथ साथ जन्मों तक नहीं रहना। मौसी ने कहा था " पति प्यार करता है, ध्यान रखता है, अपनी पत्नी की सबसे रक्षा करता है और उसके साथ कुछ ग़लत नहीं होने देता है। लेकिन आप तो घर वाले गलत करते हैं तो कुछ नहीं कर पाते,बाहर वालों से क्या सुरक्षा दे सकेंगे।" वह उठ खड़ी हुई अपने झूठे बर्तन रसोई में ले जाने के लिए। नितिन ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया, अपने सामने कुर्सी पर बैठाते हुए बोला, " तुम सही कह रही हो, तुम पर क्या बीत रही है मैं ने ध्यान ही नहीं दिया। मुझे माफ़ कर दो, आगे से ऐसा नहीं होगा। मैं बहुत शर्मिन्दा हूं।" ऐसा कहते हुए उसने साड़ी उसको दी।

नितिन की बातें सुनकर वह उसके सीने से लग कर  फफक-फफक कर रो पड़ी। नितिन धीरे धीरे उसके बालों को सहलाते हुए सोच रहा था,' मां ने जो किया वो ग़लत  था लेकिन उन्होंने ऐसा किया ही क्यों। कहीं-न-कहीं असुरक्षित महसूस कर रही थी,वह उन्हें समझाएगा , उन्हें विश्वास दिलाएगा कि उनका स्थान कोई नहीं ले सकता। पंखुरी को भी इतना प्रेम और अपनत्व देगा की वह अपने मन की बात उसे बताया करेगी। उसकी आगे पढ़ने-लिखने में सहायता करेगा जिससे उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न होगा। वह अपने आपसे वादे पर वादे  किए जा रहा था कैसे अपनी पत्नी के जीवन को खुशियों से भर देगा।

लेखक - अज्ञात

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