इकरारनामा तो मैंने फाड़ दिया अब तुम कानूनन मेरी पत्नी हो

सोनम की समझ में नहीं आता था कि मां ने क्या सोचकर इस सांड से शादी की थी। सारा दिन घर में  पड़ा खाता और पीता रहता है , कुछ काम नहीं करता। अपने पिता को याद करके आज भी पलकें भीग जाती है उसकी, कितने भले इंसान थे, कितना प्यार करते थे। बड़े से अस्पताल मे अकाउंटेंट का काम करते थे,एक बार सीढ़ियों से ऐसे फिसले कि फिर कभी नहीं उठ पाए। यशोदा को पति की मृत्यु के बाद वही काम मिल गया। तेरह साल की थी सोनम ,जब पिता का साथ छूट गया लगा सुरक्षा कवच ही छिन गया। बिना पुरुष संरक्षण के मुहल्ले में रहना दूभर हो गया था, कोई भी पुरुष मुंह उठाए आ जाता मदद करने के नाम पर। पिता ने एक एक पाईं जोड़ कर मकान बनाया था छोड़कर कहां जाते।


पति की मृत्यु के बाद यशोदा यौवन की ओर कदम बढ़ाती पुत्री की सुरक्षा को लेकर बहुत घबरा गई थी।सस्ती जमीन के लालच में पति ने जिस मुहल्ले में मकान बनाया था वह शराबी जुआरी और आवारा लोगों से भरा पड़ा था।कईं बार सोचा मकान बेच कर कहीं और मकान लें ले लेकिन इतने कम पैसों में दूसरा मकान मिलना नामुमकिन था। किराए का लेगी तो आधे से ज्यादा तनख्वाह किराया देने में ही निकल जाएगी , सोनम की पढ़ाई की भी चिंता थी। उत्तम सेल्समैन था अक्सर दवाईयां बेचने अस्पताल आता रहता था।वह नीली शर्ट काली पैन्ट और टाई वाई लगा कर बड़ा स्मार्ट लगता था।सब से बड़ी शालीनता से बोलता था , चुटकुले सुना कर सबको हंसाता रहता था। यशोदा को औरों से अधिक तवज्जो देता था। चार साल हो गए थे पति की मृत्यु के , बहुत अकेलापन महसूस करने लगी थी। उत्तम उसके छोटे मोटे काम कर देता था उसका ख्याल रखता था , उसकी तारीफ करता था,बस धीरे धीरे वह उसकी तरफ आकर्षित होने लगी। कभी उसे घर ले जाती तो सोनम से भी बड़े अपनेपन से मिलता। उत्तम ने जब शादी की इच्छा प्रकट की तो वह मना नहीं कर पायी । उत्तम किराये के मकान में रहता था,उसका कोई नाते  रिश्तेदार नहीं था इसलिए शादी के बाद यशोदा के घर में ही आकर रहने लगा|

छः महीने में ही उसका असली चेहरा सामने आ गया।वह अव्वल दर्जे का आलसी था, धीरे धीरे उसने काम पर जाना बंद कर दिया। यशोदा की तनख्वाह में से आधी से अधिक वह पीने पिलाने में बर्बाद कर देता था। यशोदा चाहती थी सोनम अच्छे कालेज में पढ़ें , जिससे उसको अच्छी नौकरी मिले । उसने सोनम का नामी कालेज में दाखिला करवा दिया था भले ही उसकी फीस कुछ अधिक थी ।उसको उत्तम पर बहुत गुस्सा आता था जब वह पैसे छीन लेता था, उसने उत्तम को घर से निकालने की भी कोशिश की लेकिन अब वह यशोदा को ही पीट देता था।

सोनम ने ट्यूशन देने शुरू कर दिये, कुछ खर्चे अपने वह इस तरह निकाल लेती थी| यशोदा को बस यह तसल्ली थी कि उत्तम सोनम को कुछ नहीं कहता था, नाही उसके ट्यूशन के पैसे पर हाथ मारता था । उसके डर से मुहल्ले के आवारा लड़के भी सोनम के आसपास नहीं फटकते थे।

सोनम के स्नातक होने में छः महीने शेष रह गए थे, और उसे अब उत्तम की नज़र में फर्क लगने लगा था।उसे लगता उत्तम की आंखें उसका पीछा कर रही हैं, उसकी देह को नापतोल रहीं हैं।सबकी निगाहों से बचने के लिए वह ढीले-ढाले सलवार कमीज़ दुपट्टे के साथ ही पहनती थी। कालेज में सबने शुरू में बहुत मज़ाक बनाया लेकिन उसने अपना पहनावा नहीं बदला तो सबने उससे इस बारे में बोलना छोड़ दिया ।उसे डर था कहीं फेशनेबल कपड़ों के कारण मुहल्ले के छिछोरे लड़के उसके साथ ऐसी वेसी हरकत न करें।

कालेज में सोनम की दो सहेलियां बनीं थीं रीया और दीपिका। दोनों उसकी यथासंभव आर्थिक मदद कर देती थी और उसके घर की परिस्थितियों को समझते हुए उसका बहुत ध्यान रखती थी। सोनम ने उन्हें अपने सौतेले पिता की करतूतों के बारे में बताया था और यह भी की वह अपनी मां को उसके चुंगल से छुड़ाना चाहती हैं।

दीपिका ने सोनम को पिछले महीने ही अपने मामा से मिलवाया था,उनका दूर एक छोटे-से हिल स्टेशन पर पब्लिक स्कूल था। उसकी परेशानी को समझते हुए उन्होंने सहायता का आश्वासन दिया था, स्नातक की डिग्री प्राप्त कर वह उनके स्कूल में अध्यापिका के पद पर पढ़ाने के लिए आजाएं। वहां पढ़ाते हुए वह अपना बीएड की डिग्री हासिल करें। वहां स्कूल के कैंपस में वह सुरक्षित भी रहेगी और आगे पढ़कर अपना कैरियर भी बना लेंगी।

सोनम अगले छः महीने बहुत सावधानी पूर्वक बिताना चाहती थी। उसने यशोदा को भी इस बारे में कुछ नहीं बताया था कहीं उत्तम को भनक नहीं लग जाए। लेकिन कुछ दिनों से उत्तम का व्यवहार अजीब लग रहा था,न जाने कैसे कैसे लोगों को घर ला रहा था। सोनम को चाय नाश्ता लाने को कहता, उसे उन आगुंतकों की नजर ठीक नहीं लगती। मां को बता कर परेशान नहीं करना चाहती थी, मां वैसे भी रात तक थकी हारी आती थी।वह स्वयं सतर्क हो गई थी और उत्तम की बातें सुनने का प्रयास करती।

एक दिन ट्यूशन से उसको जल्दी आना पड़ा एक बच्चा बिमार हो गया था। वह चुप चाप घर आकर सो गई, उत्तम कहीं नजर नहीं आ रहा था। थोड़ी देर बाद उत्तम की आवाज से उसकी नींद खुल गई वह फोन पर बात कर रहा था।वह किसी से कह रहा था ," देख भाई पांच लाख का सौदा हो गया है, उससे ज्यादा देना है तो बता वरना बनवारी इसे पांचवें दिन ले जाएगा। अबे साले ऐसी गोरी चमड़ी और अनछुई लौंडिया तुझे कहां मिलेगी पहले खुद मज़े लूटियो फिर धंधा करवा लियो । मैं तो एक दो साल और रुकता लेकिन उधारी इतनी चढ़ गई है,साले पीछे पड़ गए हैं।एक बार में ही सब चुकता हो जाएगा, और जरुरत पड़ी तो यह मकान भी है।"

सोनम के प्राण सूख गए सुनकर लेकिन उसने हिम्मत से काम लिया। उत्तम को बिल्कुल नहीं पता चलने दिया की वह अन्दर कमरे में है और उसने सब सुन लिया है। वह चुप चाप पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गई और रोज़ के समय से घर में प्रवेश किया। उसके पास चार पांच दिन है उसे कुछ जल्दी सोचना होगा । मां को बताएगी तो वो आवेश में आकर उत्तम से लडने पहुंच जाएगी और उत्तम सतर्क हो जाएगा। रात भर उलझन में रही कैसे अपने आप को बचाए।अब तो एक ही उपाय समझ आ रहा था, दीपिका के मामाजी से बात करके आजकल में ही उनके स्कूल के कैंपस में मां के साथ रहने चली जाए।

सोनम अगले दिन जल्दी से तैयार होकर कालेज के लिए निकल पड़ी ,उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था कि कहीं दीपिका के मामाजी ने छः महीने पहले उसे कैंपस में जगह देने से मना कर दिया तो वह कहां जाएगी।इन विचारों से उसके दिमाग में इतना खौफ पैदा हो गया था कि वह लगभग भागती हुई अपनी कक्षा की ओर जा रही थी। भागते-भागते वह इतनी ज़ोर से एक इंसानी दीवार से टकरायी की उसका सिर घूम गया। चक्कर के कारण उसकी आंखें बंद होरही थी तभी दो हाथों ने उसे थाम लिया।जब कुछ पल बाद संभल कर उसने आंखें खोली तो सामने खड़ा था कालेज का सबसे घंमडी और बिगड़ैल लड़का पुरषोत्तम वर्मा उर्फ पुरु। कालेज में कोई ऐसा बंदा या बंदी नहीं था जो पुरु को न जानता हो |

कालेज का ट्रस्टी पुरू के पिता थे इसलिए प्रधानाचार्य से लेकर चपरासी तक उसके आगे पीछे घूमते थे। छात्र छात्राएं उसे घेरे रहते उसके पैसे और रुतबे का लाभ उठाना चाहते थे। उसके दो ही शौक थे बास्केटबॉल खेलना और महंगी बाइक व गाडियों में कालेज आना।

सोनम ने उसके बारे में बहुत सुना हुआ था एक तो वह कालेज की बास्केटबॉल टीम का कप्तान था और उसके कारण टीम ने कईं मैच जीते थे। दूसरा रीया और दीपिका दोनों उसके नाम को लेकर आहें भरती रहती थी । लेकिन ढ़ाई साल में सोनम का उससे कभी आमना-सामना नहीं हुआ ।वह स्नाकोत्तर का छात्र था और उसका यह अंतिम वर्ष था।

" सारी,सारी" कहते हुए सोनम जल्दी से आगे बढ़ने लगी , उसे लेक्चर शुरू होने से पहले दीपिका से बात करनी थी। उसके हाथ में पेन था जो गिर गया था ,उसने उसे उठाने की चेष्टा भी नहीं की। लेकिन पुरू ने पेन उठाते हुए उसे आवाज दी," तुम्हारा पेन गिर गया है।" और कोई होता तो वह नजरअंदाज कर के निकल जाती लेकिन पुरू के साथ ऐसा करना मतलब एक और मुसीबत मोल लेना। उसने घबरा कर पीछे देखा तो पुरू हाथ में पेन लिए खड़ा था कुछ पल के लिए दोनों की आंखें टकराईं, पुरू ने पूछा " तुम्हारा नाम क्या है।" " सोनम" कहते हुए वह लगभग भागती हुई अपनी कक्षा की ओर बढ़ गयी।

पुरू को दो बातें अजीब लगी,आजतक किसी लड़की ने उसे नजरअंदाज नहीं किया और उस लड़की की आंखों में उसने ऐसा खौंफ देखा जो उसनेे पहले भी किसी की आंखों में देखा था।उसको वह लड़की पहेली सी लगी जिसे उसने पहले कभी देखा नहीं था।

सोनम ने कक्षा में पहुंचते ही दीपिका को ढूंढा लेकिन वह दिखीं नहीं । रिया ने बताया दीपिका के मामाजी को हार्ट अटैक आया है और वह अपने परिवार के साथ उनके पास गईं हैं। उसने एक हफ्ते की छुट्टी ली है,अब ऐसे में उन से मदद की उम्मीद कैसे कर सकतीं हैं। अब सोनम को लगा यह द्वार उस के लिए बंद होगया है , ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए वह किधर जाएं उसकी समझ नहीं आ रहा था | अब तो बस एक ही उपाय था। रात को मां से बात करके अगले दिन अपने काम का बहाना बनाकर निकले और कहीं जाकर छुप जाएं।बड़े ही अनमने मन से वह घर पहुंची और बिना कुछ खाए पीए अपने कमरे में जाकर लेट गई।पता नहीं कितनी देर वह लेटी रही कि अचानक बाहर से बहुत चीखने चिल्लाने की आवाजें आई।वह बाहर भागी तो देखा उत्तम गिड़गिड़ा रहा था " मुझे छोड़ दो , रहम करो, मैं तुम्हारी पाईं पाईं लौटा दूंगा।" तीन गुंडे उत्तम पर लात घूंसे बरसा रहे थे और वह कराह रहा था। वैसे तो सोनम को उत्तम से नफ़रत होने लगी थी लेकिन वह किसी को पिटता नहीं  देख सकती थी। उसने आगे बढ़कर एक गुंडे का हाथ पकड़ लिया और चिल्लाने लगी" छोड़ दो उन्हें,यह क्या कर रहे हो?"

अब तीनों का ध्यान सोनम की तरफ था और उत्तम पागलों की तरह चिल्ला रहा था ," तू अन्दर जा, तू अन्दर जा।"

एक गुंडा बोला," क्यों बे साले, यह कौन है?"

उत्तम " माई बाप इसको हाथ नहीं लगाना,बेटी है मेरी।"

गुंडा ," साले जब पीता है तब नहीं सोचा था कहां से पैसे भरेगा। इस लोंडीया  को उठा लो , जब पैसे हो साले आकर ले जाना।"

उत्तम के पेट में एक लात मारी और सोनम  को उसकी आंखों के सामने से उठा कर ले गए।

सोनम को कुछ समझ नहीं आ रहा था यह सब क्या हो रहा है।कहां तो वह उत्तम और उसके पापी इरादों से बचना चाह रही थी और कहां वह इन गुंडों के चुंगल में फंस गई। उसने बहुत हाथ पैर मारे अपने आप को छुड़ाने के लिए लेकिन तीन हट्टे कट्टे पहलवानों के आगे उसकी एक न चली। घर के बाहर खड़ी गाड़ी में उसके हाथ बांध कर और मुंह पर टेप लगा कर बैठा दिया। अंधेरा गहराने लगा था आसपास कोई नज़र नहीं आ रहा था। रात को मां आएगी तो उसको भी न जाने उसके गायब होने की क्या कहनी सुनाकर बहला देगा उत्तम।

सोनम का अब डर के मारे बुरा हाल था और वह रोए जा रही थी।न जाने कितनी देर बाद गाड़ी शहर के बाहर सुनसान रास्ते से होते हुए एक बहुत बड़े से लोहे के दरवाजे के आगे आकार रुक गई । चौकीदार ने गाड़ी में झांका और दरवाजा खोल दिया। गाड़ी एक आलीशान बंगले के सामने से गुजरती हुई पीछे की तरफ बने एक दो कमरे के छोटे से मकान के सामने जाकर रूक गई।उसको खींच कर एक गुंडे ने गाड़ी से उतारा और घर में ले गया।वह बोला," जब तक तेरा बाप भैया जी के पैसे नहीं लौटा देता तू यहीं रहेगी , भागने की कोशिश मत करना, चारों तरफ सख्त पहरा है।"

थोड़ी देर बाद उसे क़दमों की आहट सुनाई दी , फिर ताला खोलकर चार लोग अंदर आए । तीन तो पहले वाले ही गुंडे थे चौथा लम्बा चौड़ा, सांवला सा आदमी था जिसने कुर्ता पायजामा पहन रखा था।वह बहुत गुस्से में था ,एक गुंडे के सिर पर चपत मारते हुए बोला," गधे कितनी बार कहा है इन पचड़ों में औरतें और बच्चों को मत घसीटा कर ।" फिर वह सोनम की ओर देखते हुए बोला " तुम आराम करो कल तुम्हारे सकुशल पहचानने का इंतजाम करवाते हैं।" इतने में एक और बंदा भागते हुए कमरे में आया और हांफते हुए बोला" क्या बात है यहां क्या हो रहा है।" कुर्ता धारी उसे धकेलते हुए बोला," कुछ नहीं बचुआ , तुम बाहर चलो। तुम इन लफडो से दूर ही रहो ।"आगंतुक गुस्से में बोला " जब तुम इस सब  को लफड़ा मानते हो तो खुद दूर क्यों नहीं रहते हो इस तरह के काम से, बापू।" कुर्ता धारी की कोशिश के बावजूद आगंतुक ने अंदर झांक ही लिया और सोनम को देखते ही बोला " तुम ।" सोनम भी उसको देख कर भौंचक्की रह गई, और मन ही मन सोचने लगी ," पुरु यहां क्या कर रहा है।"

कुर्ता धारी ने आश्चर्य से पूछा," तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो?"

पुरू," नहीं जानते नहीं हैं, एक बार कालेज में देखा था। लेकिन यह सब क्या है ,यह यहां क्या कर रही है?" कुर्ता धारी अपने आदमियों की तरह देखते हुए बोला," इन सालों की बेवकूफी है कल इसे सही सलामत इसके घर पहुंचा देंगे।"

पुरु अभी भी गुस्से में था," कोई आवश्यकता नहीं है कोई इस कमरे में नहीं आएगा अब ।कल मैं छोड़ कर आऊंगा इसे।"

फिर सब कमरे से बाहर चले गए। सोनम को समझते देर नहीं लगी कि कुर्ता धारी पुरु के पिता बशेशर वर्मा है।इनकी शराब की दुकान होगी और उत्तम वहां से लेकर पीता होगा। उधारी ज्यादा हो गई होगी इसलिए ये लोग तकाजा कर रहे होंगे।अब अगर वह कल घर गई तो उत्तम उसे तुरंत बनवारी के हाथ बेच देगा ।

उसे लगा अब इस शहर में कोई उसे शरण दे सकता है तो केवल पुरू , उत्तम उससे भिड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता । उसे पुरु से इस बारे में बात करनी होगी लेकिन पुरु सहायता करेगा कैसे । चौबीस घंटे अपने गुंडे तो छोड़ेगा नहीं उसकी निगरानी करने  के लिए।समझ नहीं आ रहा था मदद मांगे तो किस तरह।

उधर पुरु भी सोच में डूबा हुआ था कि कैसा बाप है सोनम का जिसे पीने की पड़ी है,बेटी की चिंता नहीं उसे छुड़ाने भी नहीं आया । उसने कमरे की खिड़की से बाहर झांका तो थोड़ी दूर पर ही वह कमरा था ज़हां सोनम को रखा गया था ।उस कमरे की बत्ती जली हुई थी और सोनम परेशान सी कमरे में चहलकदमी कर रही थी।पुरु को समझ नहीं आ रहा था जब अगले दिन उसे सकुशल घर पहुंचाने की बात हो गई है तो वह इतनी क्यों परेशान हो रही है। सोनम पलटी तो उसकी निगाह बाहर पुरु की खिड़की की तरफ गई , वहां पुरु को खड़ा देख उसने सिर नीचे किया और कुछ पल बाद ही उसके कमरे की रोशनी बंद हो गई।

सोनम की चिंता के कारण रात भर नींद नहीं आई । उसे लग रहा था उसका शरीर बेजान हो गया है। सुबह हो गई थी अब एक एक पल सालों जैसा लग रहा था। इस दौरान कोई नाश्ता रख गया था लेकिन वह इतनी सहमी हुई थी कि उसने नाश्ते की तरफ देखा भी नहीं ।

आगे क्या होगा,यही सोच सोच कर उसका दिमाग बौरा गया था। वह पसीना पसीना हो रही थी और जब पुरु दरवाजा खोलकर अंदर आया तो वह बूरी तरह हांफ रही थी। वह इस तरह डरी हुई थी मानो कोई चिड़िया किसी जानवर के पंजे में जकड़ी हुई हो।पुरु को उसकी इस हालत पर अचंभा हुआ वह बोला ," इतनी परेशानी की क्या बात है ,बोला तो है घर छोड़ दूंगा।" पुरु की आवाज सुनकर वह ऐसे चौंकी जैसे किसी और ही दुनिया में थी , एकदम से हड़बड़ा कर बोली," पुरु मुझसे शादी कर लो।"  पुरु को लगा उसने शायद गलत सुना वह क्या कह रही है। लेकिन वह बिना रुके बोलती जा रही थी," पुरु इधर आप मुझे घर छोड़कर आएंगे उधर मेरा सौतेला बाप मुझे बेच देगा अपना कर्ज़ चुकाने के लिए।आप बस मुझे छः महीने अपने घर में शरण दे दो मैं पढ़ाई पूरी करके कोई नौकरी ढूंढ लूंगी। नौकरी नहीं मिली तो भी रहने का कुछ न कुछ इंतजाम कर लूंगी। इसके बाद आप को कभी नजर नहीं आऊंगी न परेशान करूंगी ।आप चाहें तो किसी वकील से इकरारनामा बनवा लें , जिस पर मैं दस्तखत कर दूंगी कि मेरा आप पर या आप की किसी भी वस्तु पर कोई अधिकार नहीं है । प्लीज़ मुझे उस नरकिय जिंदगी से बचा लो ,एक बार उस गंदगी में फंस गई तो कभी नहीं निकल पाऊंगी। मैं जिंदगी भर कर्तज्ञ रहूंगी।"

सोनम के स्वर में याचना थी और आंखों में भय। उसे वह समय याद आया जब डाक्टर ने मां को केंसर से पीड़ित बताया था। वह और बापू सकते में आ गए थे लेकिन मां की घबराहट उनके चेहरे पर झलक रही थी। डाक्टर ने कह दिया था कि उनके पास अधिक समय नहीं है, बापू और उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर कितना दुखी हुईं थीं वे। जैसे जैसे देह कमजोर होने लगी थी उनकी आंखों में बेबसी और खौफ बसता जा रहा था।वे अपनी खुशहाल जीवन और उन दोनों को छोड़कर नहीं जाना चाहतीं थीं।एक दिन बापू और उसका हाथ पकड़ कर बहुत रोई थी, वह भी फूट-फूट कर रोया था।उस दिन नियती के आगे अपने आप को बहुत लाचार पाया था उसने। उसके बाद दस पंद्रह दिन जिन्दा रही होगी मां ,वह और बापू मां के पास ही रहते थे लेकिन चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे उनको बचाने के लिए।उन दोनों की आंखों के सामने मां धीरे धीरे मौत के मुंह में समां गयी और वे लाचार खड़े रह गए। उसे लगा सोनम की सहायता कर के शायद वह मां की आत्मा को शांति प्रदान करने में कुछ सफल होगा।

पुरु अपने ही विचारों में खोया हुआ था, जब उसकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला तो सोनम कि अश्रु धारा बहने लगी। पुरु के लिए यह प्रस्ताव बहुत अप्रत्याशित था ,वह एकदम से नहीं समझ पा रहा था कि वह क्या करे।वह उसकी सहायता करना चाहता था लेकिन इस तरह उसे अजीब लग रहा था |

सोनम को उम्मीद थी कि शायद पुरु बात मान लेगा , लेकिन अब वह हारे हुए इंसान की तरह सिर झुकाए रो रही थी। पुरु के मुंह से एकदम निकल गया ," ठीक है मुझे मंजूर है।" सोनम आंखें पोंछते हुए बोली," मैं आपसे कुछ नहीं मांगुंगी नहीं आपके जीवन में कुछ दखलअंदाजी करूंगी।"

पुरु ," हां हां ठीक है, मैं कॉन्ट्रैक्ट बनवा लूँगा। लेकिन इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताना न बापू को न किसी और को।"

पुरु ने जब अपनी शादी करने की मंशा जाहिर की तो बशेशर को लगा उनके उपर किसी ने तोप का गोला दाग दिया हो।पुरु के अलावा अब इस संसार में उनका कोई नहीं था।उसका मुख देखकर जीते थे लेकिन पत्नी के देहांत के बाद न जाने क्यों पुरु खामोश सा हो गया था। गुमसुम सा रहता था घर में बहुत कम समय बिताता था।वे बात करने की कोशिश करते वह हां हूं में जवाब देकर इधर उधर हो जाता। उनकी एक दो कंपनियों को वह संभालता था लेकिन उसे उनकी शराब की दुकानें पसंद नहीं थी। उन्होंने निश्चय कर लिया था उन दुकानों को बंद करके किसी और कारोबार में पैसा लगा देंगे। लेकिन पुरु आगे बढ़ कर बोले तो वह क्या चाहता है ।

आज आगे बढ़ कर उसने जो बोला उससे वे सकते में आ गए।बड़े अरमान थे पुरु के विवाह को लेकर , सोचते थे अपनी भवानी जैसी बहू लाएंगे पुरु की। भवानी की तरह उसकी पायल की छम-छम और चूड़ियों की खनक से घर में संगीत लहरी गूंजेगी।

अगले दिन मंदिर में बशेशर उनकी बहन बहनोई और लड़की के माता-पिता के सामने पुरु ने सात फेरे ले लिए।बशेशर को विश्वास नहीं हो रहा था कहां तो वह सपने देख रहे थे आधे से ज्यादा शहर को पुरु की शादी की दावत देंगे और कहां किसी को कानों कान खबर भी नहीं हुई उनके घर बहू आ गयी।उनकी मजबूरी थी पुरु के आगे झुकना और उसकी हर बात मानना गरम खून था कुछ कर बैठा या घर छोड़ कर चला गया तो वे तो जीते जी मर जाएंगे।

उधर यशोदा भी असमंजस में थी उसकी इतनी समझदार लड़की ने अचानक शादी का निर्णय कैसे ले लिया। इससे पहले तो उसने कभी  जिक्र भी नहीं किया कि वह किसी को चाहती है। सारी रात गायब रही और अब कहती है वह अगले दिन शादी कर रही है। उधर उत्तम को काटो तो खून नहीं जैसी स्थिति,एक तो उसका एटीएम कार्ड चला गया ऊपर से पुरु ने धमकाया था कि अगर यशोदा और सोनम का बाल भी बांका हुआ तो उसका क्या हश्र होगा वह सोच भी नहीं सकता भले ही उनकी परेशानी का कारण वह न भी हो।

शादी के बाद कुछ भी नहीं बदला अगले दिन से पुरू ने कालेज जाना प्रारंभ कर दिया और अब सोनम भी साथ जाती । सोनम जरुर कालेज में सब के आकर्षण का केंद्र बन गई थी। पहले तो किसी को विश्वास नहीं हुआ कि सोनम जैसी सीधी सरल लड़की से पुरु जैसे रईस और स्मार्ट लड़के ने शादी कैसे कर ली। शादी के बाद भी सोनम के पहनने ओढ़ने में कुछ बदलाव नहीं आया था । फिर भी वह पुरु की पत्नी थी तो सब उसकी नज़रों में चढ़ना तो चाहते ही थे |

भवानी के जाने के बाद से बशेशर को दिन का खाना खाने घर आने में बहुत बोरियत होती थी। लेकिन जब उन्हें हार्ट अटैक पड़ा था तब भवानी ने कसम दी थी कि वे नियम से दिन में गर्म ताजा खाना सलाद के साथ  घर आकर खाएंगे।पुरु तो कालेज के बाद न जाने कहां चला जाता था और अब सोनम को छोड़ने आता है पर बाहर से  ही चला जाता है। सोनम अब उनके साथ लंच करती थी।पायल और चुड़ियों की खनखनाहट तो नहीं लेकिन सोनम की हंसी की खिलखिलाहट और हल्की फुल्की बातें जरुर घर में सुनाई देने लगी। जल्दी ही उन्हें समझ आ गया कि लड़की बहुत भली और मासूम है। रात के खाने में भी वह उनका साथ देती और उनका ध्यान गया कि खाने में उनकी सेहत के हिसाब से अब पौष्टिक और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जाने लगें थे। सोनम कि बातों से उन्हें कालेज और पुरु के बारे में बहुत सी जानकारी मिलने लगी थी ।वह बड़े उत्साहित होकर बताती जब पुरु कोई मैच जीत जाता।

बशेशर को पुरु के खाने की बहुत चिन्ता रहती थी ।पुरु देर सवेर लौटता मन होता खाता वरना आलस में बिना खाए ही सो जाता। लेकिन जब से सोनम घर में आईं हैं पुरू कितनी भी देर से आएं वह खाना अवश्य गर्म करके खिला देती।

घर में शहर के बड़े बड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। बशेशर को लगा सोनम के कपड़े बहुत साधारण हैं। एक दिन वो बोले ," बिटिया अपने लिए कुछ नए कपड़े बनवा लो, लगना तो चाहिए नई बहू घर में आयी है। सोनम को भी लगने लगा था स्टेटस के हिसाब से कपड़े न हो तो कुछ अजीब स्थिति हो जाती है। बशेशर ने मोटी रकम का चेक काट कर दे दिया। अगले दिन उसने पुरू को कहा कि वह उसे उसकी मां के यहां छोड़ दें। उत्तम अब डर के कारण शराफत से रहने लगा था ,बशेशर ने उसकी उधारी माफ कर दी थी । यशोदा को पैसों के लिए धमकाता तो नहीं था लेकिन इधर उधर रखें दिख जाएं और मौका मिल जाए तो चूकता भी नहीं था। यशोदा ने बेटी के लिए छुट्टी ले ली थी।

सोनम का मन तो बहुत करता था फैशन के हिसाब से कपड़े पहने बन ठनकर रहें लेकिन मन मार कर रेहना पड़ता था।उस दिन उसने जी भर कर खरीददारी की, एक से बढ़कर एक कपड़े , चप्पल और पर्स खरीदें। पार्लर जाकर बाल भी कटवाएं।न जाने क्यों उसका मन चाहता था पुरु की नजरें उस पर टिकी रहे , पुरु की आंखों में उसके  लिए चाहत हो।पुरु उसके साथ दोस्तों वाला व्यवहार करता था,बस इधर उधर की बातें कर लेता था।वह उसके करीब रहने के लिए बैचेन रहती,रात में भी अपने कमरे की खिड़की से झांकती रहती बाहर जब तक पुरू नहीं आ जाता। गलती से भी पुरु का हाथ उसे कहीं छू जाता तो सारे शरीर में लहर सी दौड़ जाती। ऊपर की मंजिल में कईं कमरे थे ,बशेशर तो ऊपर आते नहीं थे लेकिन उन्हें पता चल गया था दोनों अलग-अलग कमरों में रहते हैं।

अगले दिन पुरु ने सरसरी निगाह डालते हुए कहा ," अच्छी लग रही हो।" सोनम का मन बुझ गया । वह चाहती थी पुरु उसे देर तक निहारे , उसकी आंखों में प्रशंसा हो उस के हाथ अपने आप उठ कर उसके बालों को उसके चेहरे पर पीछे कर दें। कालेज में जरूर उसका पहनावा और स्टाइल चर्चा का विषय बन गया था।

एक दिन अचानक पुरु ने एलान कर दिया कि वह पहाड़ों पर अपने दोस्तों के साथ ट्रेकिंग के लिए जा रहा है। सोनम को चिंता हुई कि तीन चार दिन बिना पुरु को देखें कैसे रहेंगी। अब उसे एहसास होने लगा वह पुरु से मुहब्बत करने लगी है तभी तो तीन दिन का अलगाव उसे बैचेन कर रहा है।पुरु इन सब बातों से बेखबर है और वह उसको पागलों की तरह चाहने लगीं है।जब इकरारनामे की अवधि पूर्ण होगी और उसे पुरु से अलग होना पड़ेगा तब वह कैसे जीवित रहेगी यह सोचकर उसका दिल बैठा जा रहा था।पुरु ने उसको बताया था वह पहले भी कई बार ट्रेकिंग पर गया है और प्रकृति को इतने करीब से देखने का मजा ही कुछ और है।

सोनम का कुछ करने का मन नहीं कर रहा था, तीन चार दिन कैसे बीतेंगे।पुरु को फोन किया तो पहली बार तो उसने बताया कि वे लोग खाना खाने के लिए रुकने वालें है। दो ढाई घंटे बाद मिलाया तो वह झुंझला कर बोला," यार तुझे क्या हो गया है असली बीवी की तरह क्यों बिहेव कर रही है।" पढ़ाई में भी मन नहीं लग रहा था, बैचेनी सी हो रही थी। उसने निश्चय किया कि पुरु के बारे में और नहीं सोचना चाहिए और टीवी ही देख लेना चाहिए। लेकिन समाचार लगाते ही उसके होश उड़ गए ,पुरु जिस तरफ गया था वहां बहुत बारिश हो गई थी, जिसके कारण लेण्डसलाईड और फिसलन हो गई थी।

वह इतना डर गई थी उसने तुरंत पुरु को मोबाइल पर फोन किया।उसका फोन कार्यक्षेत्र में न होने की सूचना दे रहा था।

उसने बशेशर को फोन मिलाकर बताया तो सुनकर बोले," परेशान मत हो बिटिया, हम अभी पता करते हैं।" बशेशर ने कहां कहां फोन नहीं किया पुरु की स्थिति जानने के लिए।एक डेढ़ घंटे हो गए थे,अब तो वे ऐसे पस्त हो गये थे लगा शरीर में जान ही नहीं बची  है । बड़ी मुश्किल से कैम्प के प्रबंधक से बात हुई ,सिग्नल इतने कमजोर थे कि बस इतना ही समझ आया कि आगे के रास्ते बंद है और बच्चे वापस लौट रहे हैं।

बशेशर घर आ गए थे, और जब तक पुरु आ नहीं गया बशेशर और सोनम बैचेन हाल में चहलकदमी करते रहे। आज सोनम ने अपनी आंखों से देखा पिता के हृदय में कितना कूट कूट कर प्रेम भरा था

जैसे ही पुरू आया सोनम दौड़ कर उसके पास गईं, उसके कंधे पकड़ कर फिर उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उससे पूछ रही थी ,"आप ठीक है न , कहीं लगी तो नहीं आपको? आपके सब दोस्त सही सलामत है न?" वह धीरे से बुदबुदाता हुआ, 'हां मैं ठीक हूं,' फिर पिता की ओर एक बार देखा और अपने कमरे में चला गया। सोनम हक्की-बक्की रह गई,पुरु एक बार तो पिता के गले लग जाता। चिंता के मारे बीस साल उम्र बढ़ गई थी बेचारों की, आधा अधुरा खाना खाया, तब से परेशान बार बार दरवाजे के पास जाकर खड़े हो जाते।एक बूढ़े पिता पर, जिसका एक पुत्र के अलावा इस दुनिया में कोई नहीं था जब उस पुत्र की जान ख़तरे में हो तो क्या बीती होगी यह शायद पुरु नहीं समझा। ऐसा नहीं था पुरु को पिता की फ़िक्र नहीं थी या उनसे प्रेम नहीं था बस मां के जाने के बाद बर्फ़ की चादर ऐसी बिछ गई दोनों के बीच,अपना प्रेम कैसे इजहार करें यहीं भूल गए दोनों। सोनम को लगा नियती ने उसे यहां स्वयं की सुरक्षा के लिए ही नहीं भेजा बल्कि दोनों बाप-बेटे के बीच की दूरियां भी दूर करने के इरादे से भेजा है।

बशेशर की आंखों में पानी था ,वे सिर झुकाए अपने कमरे की ओर चल दिये । सोनम जल्दी से उनके सामने पहुंची और गले लगते हुए बोली," बाबूजी पुरु सही सलामत आ गए यही बहुत है हमारे लिए।" एक बार को तो बशेशर सकपका गए लेकिन फिर सोनम के गले लग कर फफक-फफक कर रोने लगे ," एक बार बापू कहकर गले लग जाता सारा संताप मिट जाता।" फिर सम्हलते हुए कहा," पूछ लियो बिटिया कुछ खाएगा तो खाना खिला दियो।"

सोनम कमरे में आई तो देखा पुरु कपड़े बदल कर लेटने की तैयारी कर रहा था, बहुत परेशान और खोया खोया सा लग रहा था।

सोनम ," कुछ खाने को लाऊं ।"

पुरु ," नहीं भूख नहीं है , रास्ते में थोड़ा बहुत खा लिया था।"

सोनम ," बाल बाल बच गए, यहां तो बाबूजी और मेरी जान ही निकल गई थी,जब टीवी में सुना वहां के हालात के बारे में।अगर थकान नहीं लग रही तो बताईए न वहां क्या हुआ था।"

पुरु ने अब तक सोनम की आंखों में कृतज्ञता का भाव देखा था लेकिन जिस तरह वह चिंतित थी और भाग कर उसके पास आई थी उसे कुछ अपने पन का अहसास हो रहा था। वैसे भी उसे कईं बार लगा जब सोनम को लगता वह नहीं देख रहा है तो वह उसे एकटक निहारती है। सोनम के कहने पर उसने अपना वहां का अनुभव सुनाना शुरू किया तो वह अंदर तक कांप गया।कितने विशाल और भयानक लग रहे थे वे पहाड़ और मनुष्य कितने बौने और असहाय। पुरु को लग रहा था वहां का वर्णन करते हुए वह वापस उन लम्हों को जी रहा है अगर नहीं बताता तो अंतर्मन में दबी उन डरावनी स्मृतियों में दब कर मर जाता। सोनम पुरु की बातें सुनते-सुनते कब पलंग पर उसके बगल में उसका हाथ पकड़ कर बैठ गई दोनों को ही इसका अहसास नहीं हुआ। सोनम को सब बताकर पुरु को बहुत हल्का महसूस हो रहा था,और सोनम से बात करते-करते वह उसके सीने पर सिर रखकर नींद की आगोश में समा गया। प्रकृति का इतना कठोर रुप देखकर स्त्री की कोमलता ने उसे सुकून से भर दिया था।

सोनम रातभर पुरु को बाहों में थामें लेटी रही, उसकी नींद में कोई बाधा नहीं आने दी। वह इन पलों को ,पुरु की यादों को अपने मन मस्तिष्क में भर लेना चाहती थी आखिर आगे की जिंदगी पुरु से विदा हो कर इन लम्हों के सहारे ही तो काटेगी। पुरु उठा तो उसे लगा बरसों बाद ऐसी गहरी नींद सोया है।

पहले दिन की थकान और बारिश में भीगने का परिणाम स्वरूप पुरु को बुखार हो गया। सोनम उसके पास बैठी उसे फल छील कर खिला रही थी। मौका देख कर बोली," कल बाबूजी की चिंता के कारण बहुत बुरी हालत हो गई थी, मैं डर गई थी कहीं उनकी तबीयत न खराब हो जाए।वे आपसे बहुत स्नेह करते हैं और एक आप हैं उनके पास भी नहीं जाते , उनसे बात भी नहीं करते। मां के जाने के बाद तो आपको उनका और भी ध्यान रखना चाहिए था , उनको और अधिक प्यार करना चाहिए। आखिर आप के अलावा उनका है ही कौन, वे कितना अकेलापन महसूस करते हैं, आप कल्पना भी नहीं कर सकते।"

पुरु :" मां के जाने के बाद मैं किसी के भी इतना करीब नहीं आना चाहता उनके जाने के बाद मुझे दुबारा वह दुःख सहना पड़े।"

सोनम :" यही तो गलती कर रहे हैं आप, उनके जाने के बाद आप और अधिक दुखी होंगे कि जीते जी आपने अपने आप को उनके सानिध्य से दूर रखा, उनके स्नेह से वंचित रखा।तब इतनी देर हो गई होगी कि आप चाह कर भी ये पल वापस नहीं प्राप्त कर सकेंगे।एक और ग्लानि आपका जीना दुभर कर देगी कि आपने उन्हें बिल्कुल अकेला छोड़ दिया , मां की मजबूरी थी वो चली गई लेकिन आप तो उनके पास होते हुए भी उनसे दूर रहते हो। मां की आत्मा को भी कष्ट होता होगा आप दोनों को इस तरह अलग थलग जीते देखकर , मतलब वे आप दोनों के बीच सेतु थी , अब वे नहीं है तो आप दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं है।"

बोलते-बोलते सोनम की आंखों में आंसू आ गए,पुरु की आंखें गीली हो गई।वह बोला," मैं ने इस तरह से कभी सोचा ही नहीं , मैं केवल अपने आप को बचाता रहा। अब तो मेरी यह भी समझ में नहीं आता मैं उनसे क्या बात करूं और कैसे करूं।"

सोनम :"पुरु वे आपके पिता है उनके पास बैठना शुरू करो खामोशी ही बातें बन जाएंगी।"

निचली मंजिल पर बशेशर परेशान से घूम रहे थे। सोनम को देखते ही बोले ," कैसा है पुरू ।"

सोनम :" ठीक है, ठंड लग गई है, एक दो दिन आराम करेंगे ठीक हो जाएंगे।आप ऊपर चलों पुरु को देख भी लेना , थोड़ी देर पास बैठोगे तो उन्हें अच्छा लगेगा।"

बशेशर :" पता नहीं बिटिया उसे मेरा कमरे में आना शायद अच्छा नहीं लगेगा।"

सोनम हाथ खींचते हुए बशेशर को ऊपर ले गईं और बोली :" न लगने दो, आप पिता हो पुरु के , आप का हक़ बनता है अपने पुत्र की सेहत के बारे में जानने का।"

बशेशर कमरे में आए तो पुरु बैठ गया, वे सिर पर हाथ रखते हुए बोले :" कैसा है बचुआ।"

पुरु :" अब ठीक हूं।"

वह चलने को हुए तो पुरु बोला," थोड़ी देर बैठो न बापू ।" बशेशर वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गए ।

पुरू :" सोनम बता रही थी आप कल बहुत परेशान हुए मेरे कारण।आप इतनी चिंता करोंगे तो सेहत ख़राब हो जाएगी।"

बशेशर ने एकदम से भाव-विभोर होकर पुरु को सीने  से लगा लिया," बचुआ जान बसती है तुम में हमारी ,सुबह शाम तुम्हें देख लेते हैं बस आंखों को ठंडक पड़ जाती है।" कितने ही पल दोनों बाप-बेटे ऐसे गले लगें रहे। फिर बशेशर थोड़ी देर बैठ कर इधर उधर की बातें करते रहे, उठते हुए पूछा," खाना खाने नीचे आ़ ओगे या यहीं भिजवा दें।"

पुरु :" नहीं बापू अब से रोज़ खाना साथ खाया करेंगे।"

बशेशर कमरे से बाहर आए तो सोनम खड़ी मुस्कुरा रही थी। उसके सर पर हाथ रखते हुए बोले," कमरे में आ तुझे कुछ देना है।" जब सोनम कमरे में आई तो एक सोने का हार देते हुए बोले," यह तेरी सासु मां का है आज तुझे देता हूं, तूने मेरा बेटे से मुझे मिला दिया,इसको आशिर्वाद समझ कर रख लें।" सोनम सकपका गई वह सोच रही थी वह इतना कीमती उपहार कैसे रख सकतीं हैं , जबकि वह कुछ महीनों की मेहमान है इस घर में।
उसने कहा :" बाबूजी इसे आप अपने पास ही रखो संभाल कर ,जब पहनना होगा मैं ले लूंगी।"

बशेशर :" ठीक है अब यह तेरी अमानत है मैं अपने पास रख लेता हूं।"

अब परीक्षा में समय कम रह गया था, सोनम पढ़ाई में व्यस्त रहती थी।पुरु अब घर में ही अधिक समय बिताता था।

सोनम की दीपिका के मामाजी से बात हो गई थी , परीक्षा समाप्त होते ही वह वहां स्कूल में पढ़ाने चली जाएगी। जैसे जैसे समय बित रहा था सोनम की उदासी बढ़ रही थी कैसे रहेंगी वह पुरू के बिना।वह आसपास होता तो उसे देखती रहती जैसे उसकी तस्वीर आंखों के रास्ते दिल में उतार लेना चाहती हो।पुरु को भी अपने जीवन में सोनम की उपस्थिति के महत्व का अहसास होने लगा था। सोनम में उसे एक ऐसा दोस्त नजर आने लगा था जो स्वार्थ हीन था ,जो उसकी प्रसन्नता के बारे में सोचता था और सबसे बड़ी बात उसके कारण उसे अकेला पन नहीं महसूस होता था।उसे लगता था उसे सोनम की आदत हो गई है वह उसके बिना कैसे रहेंगा।उसे अच्छा लगने लगा था जब सोनम उसे छुपकर देखती थी , उसकी जरूरतों का ध्यान रखती थी।जब वह उसे कोई वस्तु हाथ में देती तो उसका हाथ जैसे उसके हाथ में ही ठहर सा जाता।पुरु को तब बड़ा अच्छा लगता एक मदहोशी सी छा जाती। सोनम का दुख सुख उसे प्रभावित करने लगा था आजकल वह उदास दिखती तो उसका मन भी बुझ सा जाता। एक दो बार उसने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने यह कहकर टाल दिया कि चिंता होती है अगर परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हुई तो आगे क्या करेंगी।

आज परीक्षा का आखिरी दिन था सोनम सब दोस्तों से मिलकर अलविदा कहने में लगी थी।पुरु उसका इंतजार कर रहा था जब सोनम आईं तो उसकी आंखों में आंसू थे।वह चुप चाप गाड़ी में बैठी रही लेकिन थोड़ी देर बाद उसे अहसास हुआ कि जिस रास्ते जा रहें हैं वह घर की तरफ नहीं जाता।वह पुरु से पूछती उससे पहले ही उसने गाड़ी एक बहुत बड़ी इमारत के सामने रोक दी।पुरु उसका हाथ पकड़ कर इमारत में दाखिल हो गया, और उसे उस वकील के पास ले गया जिसने विवाह के समय उनका कान्ट्रेक्ट बनाया था। वकील ने बिना कुछ बोले वे कागजात पुरु की तरफ बढ़ा दिया और उसने उन्हें देखे बिना ही फाड़ दिए। फिर सोनम से बोला " यह इकरारनामा तो मैंने फाड़ दिया अब तुम कानूनन मेरी पत्नी हो । चाहो तो भी यह रिश्ता तोड़ नहीं सकती । इसके लिए तुम्हें कोर्ट जाना पड़ेगा मुझ से तलाक लेने के लिए और वह मैं तुम्हें दूंगा नहीं।"

सोनम आश्चर्य से पुरु को देख रही थी जब उसे उसकी बात समझ आईं तो वह लपक कर उसके गले लग गई।रोते हुए बोली, " मैं क्यों कोर्ट जाऊगी आपसे अलग होने के लिए । मैं आपसे इतना प्यार करती हूं कि सम्पूर्ण जीवन आपके साथ बिताना चाहती हूं।" पुरु सांस रोके खड़ा था पता नहीं सोनम की क्या प्रतिक्रिया होगी। गहरी सांस लेते हुए उसने अपनी बाहों में सोनम को भरते हुए कहा," मैं भी अब तुम्हारे बिना नहीं जी सकता।"

लेखक - अज्ञात

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